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शरद पवार की छाया से निकलकर कैसे महाराष्ट्र की राजनीति के दादा बने थे अजित?

अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार की छाया में राजनीति सीखी, लेकिन समय के साथ वे खुद महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में उभर आए. एनसीपी में विभाजन के बाद अधिकांश विधायक उनके साथ खड़े हुए और चुनावों में उन्होंने शरद पवार से बेहतर प्रदर्शन कर अपना राजनीतिक कद साबित किया.

शरद पवार की छाया से निकलकर कैसे महाराष्ट्र की राजनीति के दादा बने थे अजित?
  • अजित पवार ने शरद पवार की छाया में रहकर राजनीति की रणनीति और जनाधार बढ़ाने की कला सीखी थी
  • पिछले दो दशकों में अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी के सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे थे
  • शरद पवार और अजित पवार के बीच एनडीए गठबंधन को लेकर मतभेद पार्टी में खाई बनने का कारण था
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मुंबई:

महाराष्ट्र की राजनीति में अगर किसी नेता ने अपनी पहचान संघर्ष, परिस्थिति और सत्ता की जटिलताओं के बीच गढ़ी, तो वह नाम थे अजित अनंता पवार, जिन्हें आज राज्य की राजनीति में ‘दादा' के नाम से जाना जाता था. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचना उनके लिए आसान यात्रा नहीं रही. यह कहानी है एक ऐसे नेता की, जिसने अपने राजनीतिक गुरु और चाचा शरद पवार की छाया में रहते हुए राजनीति के हर शिल्प को सीखा और फिर एक दिन उसी छाया से निकलकर अलग रास्ता बना दिया.

शरद पवार की पाठशाला से निकले थे अजित 

अजित पवार को राजनीति घर में ही मिली, उन्होंने शरद पवार से सबकुछ सीखा. महाराष्ट्र में राजनीति की रणनीति हो या जनाधार बढ़ाने की कला अजित ने अपने चाचा के साथ रहते हुए हर पहलू को करीब से समझा. लंबे समय तक दोनों की जोड़ी एनसीपी की कमान संभालती रही. पार्टी में कार्यकर्ताओं के बीच मान्यता थी कि अगर शरद पवार पार्टी का चेहरा और दिशा हैं, तो अजित पवार उसकी ऊर्जा और कार्यकुशलता.

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एनसीपी का असली चेहरा बने अजित

पिछले दो दशकों में महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी एनसीपी की बात होती, तो सबसे पहले जिस नेता का चेहरा सामने आता, वह थे अजित पवार. विकास, प्रशासनिक नियंत्रण और तेज़ फैसले इन गुणों ने उन्हें राज्य का सबसे प्रभावशाली नेता बना दिया. विपक्ष में हों या सत्ता में अजित पवार हमेशा केंद्र में रहे. कई बार ऐसा लगा कि वे पार्टी से ऊपर हो गए हैं और कार्यकर्ताओं का झुकाव भी सीधे उन्हीं की ओर होने लगा था.

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एनडीए गठबंधन पर बढ़ता विवाद और रास्ते अलग होने की शुरुआत

समय के साथ शरद पवार और अजित पवार की सोच में फर्क दिखाई देने लगा, खासकर एनडीए के साथ गठबंधन को लेकर. शरद पवार पारंपरिक ‘धर्मनिरपेक्ष' राजनीति की राह पर चलते रहे, जबकि अजित पवार व्यावहारिक सत्ता-साझेदारी वाली राजनीति के अधिक समर्थक दिखने लगे. यही मतभेद पार्टी के भीतर खाई बनने का कारण बने.

आखिरकार वह क्षण भी आया जब अजित पवार ने अपने चाचा से अलग रास्ता चुन लिया. शुरुआत में यह कदम राजनीतिक जोखिम भरा माना गया, लेकिन अजित पवार ने इसे अवसर में बदल दिया.

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शरद पवार की पार्टी में ही उन्हें दे दी मात

राजनीति में जनाधार ही नेता की असली शक्ति होता है, और जब एनसीपी के अंदर शक्ति प्रदर्शन हुआ, तो अधिकतर विधायक अजित पवार के साथ खड़े हो गए. यह वह क्षण था जिसने साबित कर दिया कि पार्टी की असली पकड़ अब उनके पास है.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी उनकी रणनीति सफल रही. शरद पवार के पारंपरिक गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्रों में भी अजित पवार का प्रदर्शन बेहतर रहा और वे ज्यादा सीटें लेकर उभरे. राजनीतिक विश्लेषकों ने साफ लिखा अजित पवार ने अपने प्रदर्शन से दिखा दिया कि अब वे ‘दादा' हैं और पार्टी की असली कमान उनके हाथ में है.

चाचा की छाया से निकलकर खुद की छवि गढ़ना

अलग होने के बाद भी अजित पवार ने अपनी राजनीति को केवल ‘बगावत' की कहानी नहीं बनने दिया. उन्होंने दावा किया कि उनका उद्देश्य राज्य की स्थिरता और विकास है. समय के साथ उन्होंने खुद को एक ‘व्यावहारिक नेता' के रूप में स्थापित किया. जहां भावनाओं से ज्यादा महत्व काम, योजनाओं और राजनीतिक समीकरणों को दिया जाता है.

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