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बेटे-भतीजे जो राजनीति में नहीं कर पाए करिश्मा...अभिषेक से आकाश तक लंबी है लिस्ट

भारतीय राजनीति के उन बेटों और भतीजों की कहानी जो अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को ठीक से संभाल नहीं पाए. इसमें ठाकरे परिवार से लेकर चौटाला परिवार तक शामिल है.

बेटे-भतीजे जो राजनीति में नहीं कर पाए करिश्मा...अभिषेक से आकाश तक लंबी है लिस्ट
नई दिल्ली:

भारत या कहें कि दुनिया की राजनीति में परिवारवाद एक सामान्य घटना है. भारत में तो भाई-भतीजावाद एक मुहावरा बन गया है. प्राचीनकाल से चली आ रही यह परंपरा 21वीं सदी में भी जारी है. भारत में क्षेत्रीय दलों की राजनीति और नेतृत्व का आधार ही यह परिवारवाद है. यह कुछ स्तर पर यह राष्ट्रीय पार्टियों में भी पाया जाता है. भारतीय नेताओं ने अपना उत्तराधिकारी बेटे-बेटियों और भतीजों तक को बनाया. कई बार ये बेटे-बेटियां और भतीजे पार्टी को राजनीति में नई ऊंचाई पर ले गए तो कई बार गर्त में. आइए हम कुछ ऐसे ही बेटे-बेटियों और भतीजों के बारे में जानते हैं.

क्या ममता के भतीजे ने डुबोई पार्टी

आइए सबसे पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की. जहां इसी महीने नई सरकार बनी है.बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस को हराकर राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई है. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से बगावत कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. ममता अविवाहित हैं. उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया. पार्टी में अभिषेक का दबदबा बढ़ा है. पार्टी के हर फैसले पर उनकी छाप देखी जाती है. उम्मीदवारों के चयन में भी अभिषेक का दखल रहता है. इस बार का पूरा चुनाव अभियान उन्होंने ही संचालित किया. तृणमूल में अभिषेक की हैसियत नंबर दो की है.  लेकिन तृणमूल कांग्रेस 294 सदस्यों वाली विधानसभा में केवल 80 सीटें ही जीत पाई है. 

अभिषेक दक्षिण 24 परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं. इस लोकसभा सीट में सात विधानसभा सीटें आती हैं. इस बार के चुनाव में इसकी फाल्टा सीट के लिए हुए मतदान को रद्द कर दिया गया. फाल्टा में 21 मई को दुबारा मतदान होगा. लेकिन उससे पहले ही वहां से तृणमूल उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव से पीछे हट गए हैं. इसे तृणमूल के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि खान अभिषेक बनर्जी के सबसे करीबी लोगों में से एक है. खान के इस फैसले को अभिषेक बनर्जी के लिए बड़े झटके और पार्टी पर कमजोर होती उनकी पकड़ के रूप में देखा जा रहा है. तृणमूल की चुनावों में मिली हार के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं. इसे देखते हुए ममता बनर्जी ने कहा है कि वो पार्टी को फिर से खड़ा करेंगी. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वो पार्टी कार्यालयों का खुद ही रंग-रोगन करेंगी. 

इस बार के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

इस बार के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

बेटे और भतीजे की लड़ाई में बिखर गई शिवसेना 

चाचा-भतीजे की सबसे बड़ी लड़ाइयां महाराष्ट्र में हुई हैं. वहां की सबसे मशहूर जोड़ी रही शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे की. राज ठाकरे बाल ठाकरे के छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के पुत्र हैं. उनकी मां कुंदा ठाकरे बाल ठाकरे की पत्नी मीना ठाकरे की सगी बहन हैं. राज ठाकरे ने अपने राजनीतिक करियन की शुरूआत शिवसेना की छात्र ईकाई से शुरू की थी. वो अपने चाचा बाल ठाकरे की ही तरह आक्रामक राजनीति और भाषा शैली के लिए जाने जाते हैं. युवाओं में शिवसेना का विस्तार करने में राज ठाकरे का प्रमुख योगदान माना जाता है. एक समय राज ठाकरे शिवसेना में नंबर दो के नेता माने जाते थे. उन्हें बाल ठाकरे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था. लेकिन जब पार्टी की बागडोर सौंपने का समय आया तो बाल ठाकरे अपने बेटे उद्धव ठाकरे को तरजीह दी. इससे नाराज राज ठाकरे ने नवंबर 2005 में शिवसेना से बगावत कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया. लेकिन वो महाराष्ट्र की राजनीति में कभी सफल नहीं हो पाए.

वहीं पार्टी की कमान संभालने के बाद उद्धव ठाकरे भी कोई कमाल नहीं कर पाए. उद्धव के जमाने में ही शिवसेना का बीजेपी से दशकों पुराना गठबंधन टूट गया. उद्धव ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से गठबंधन कर सरकार बनाई. लेकिन इससे शिवसैनिक असहज हो गए. क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी शिवसेना की स्वाभाविक पार्टनर नहीं थी. इसका परिणाम यह हुआ कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में बगावत हो गई.शिंदे गुट ने बीजेपी से हाथ मिला लिया. इसके बाद चली लड़ाई में उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह से भी हाथ धोना पड़ा.उद्धव की पार्टी विधानसभा चुनाव में कोई कमाल नहीं कर पाई. उसके बाद हुए बृहन्मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव के लिए उद्धव ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से हाथ मिलाया. लेकिन यह गठबंधन भी नाकाम हुआ. दोनों मिलकर केवल 65 सीटें ही जीत पाए. इनमें छह सीटें राज ठाकरे की पार्टी को मिली थीं. इस तरह एक समय महाराष्ट्र में एकक्षत्र राज करने वाली शिवसेना छिन्न-भिन्न हो गई है. 

बाल ठाकरे का परिवार आज महाराष्ट्र की राजनीति में सिमटता जा रहा है.

बाल ठाकरे का परिवार आज महाराष्ट्र की राजनीति में सिमटता जा रहा है.

मायावती के भतीजे आकाश आनंद का घटता-बढ़ता कद 

पंजाब निवासी कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी बनाई थी. बसपा की प्रयोगशाला बना देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश. तीन जून 1995 से पहले उत्तर प्रदेश में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं बना था. बसपा की मायावती ने तीन जून 1995 को प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. बसपा ने बीजेपी के समर्थन से यह सरकार बनाई थी. नौ अक्तूबर 2006 को निधन से कुछ साल पहले तक बसपा पर कांशीराम का नियंत्रण था. उन्होंने मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. कांशीराम के निधन से पहले ही मायावती ने बसपा पर नियंत्रण हासिल कर लिया था. मायावती के इशारे के बिना बसपा में एक पत्ता भी नहीं हिलता है. मायावती चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनीं. आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह कारनामा कोई नेता नहीं कर पाया था. लेकिन 2012 में सत्ता से हटने के बाद से बसपा की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है. बसपा ने 2007 के चुनाव में 2006 सीटें जीत कर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई थी. लेकिन 2024 आते आते वह एक सीट पर सिमट गई है. पार्टी के लगातार खराब प्रदर्शन और अपनी उम्र को देखते हुए मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को 2023 में बसपा का नेशनल कोऑर्डिनेटर और अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. साल 2024 के चुनाव में आकाश आनंद ने आक्रमक रूप से रैलियां की. इसके बाद मायावती ने उन्हें दोनों पदों से हटा दिया. लेकिन जून 2024 में उन्हें दोनों पदों पर फिर से बहाल कर दिया गया. मायावती ने मार्च 2025 में एक बार फिर आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर और उत्तराधिकारी पद से हटा दिया. आकाश आनंद को मायावती ने अप्रैल 2025 में फिर से नेशनल कोऑर्डिनेटर तो बनाया. लेकिन कहा कि उनके जीते जी कोई उनका उत्तराधिकारी नहीं होगा. आकाश आनंद इतने दिनों में कोई कमाल नहीं कर पाए हैं. जबकि उनके ऊपर पार्टी के विस्तार की जिम्मेदारी है. आज हालत यह है कि बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा ही संकट में है.   

बसपा प्रमुख मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद का पार्टी दो बार प्रमोशन और डिमोशन कर चुकी हैं.

बसपा प्रमुख मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद का पार्टी दो बार प्रमोशन और डिमोशन कर चुकी हैं.

भाई-भाई और भतीजे की लड़ाई में टूट गई इनेलो 

राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के चौटाला परिवार का एक समय देश-प्रदेश की राजनीति में बोलबाला था.कई दलों की राजनीति करने के बाद चौधरी देवीलाल ने इंडियन नेशनल लोकदल की स्थापना की थी. वो हरियाणा के मुख्यमंत्री और देश के उपप्रधानमंत्री भी रहे. उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला भी हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे. लेकिन ओमप्रकाश चौटाल के अंतिम समय में इनेलो बिखरने लगी. ओमप्रकाश चौटाला ने अपने जीवनकाल में ही पार्टी की कमान अपने छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला को सौंप दी थी.

चौधरी देवीलाल का इंडियन नेशनल लोकदल आज दो टुकड़ों में बंट चुका है. जिस पार्टी ने हरियाणा में कई बार सरकार बनाई आज विधानसभा में उसके केवल दो विधायक हैं.

चौधरी देवीलाल का इंडियन नेशनल लोकदल आज दो टुकड़ों में बंट चुका है. जिस पार्टी ने हरियाणा में कई बार सरकार बनाई आज विधानसभा में उसके केवल दो विधायक हैं.

इससे आहत होकर उनके बड़े बेटे अजय सिंह चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला ने जननायक जनता पार्टी (जेजेपी)के नाम से अपना अलग दल बना लिया था. जेजेपी को 2019 के चुनाव में 10 सीटों पर जीत मिली. उसने बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई. दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री बने. लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले यह गठबंधन टूट गया. परिणाम यह हुआ कि जेजेपी उस चुनाव में कोई भी सीट नहीं जीत पाई. यहां तक की दुष्यंत चौटाला अपनी सीट उचाना कलां में खुद चुनाव हार गए. वहीं इनेलो केवल दो सीटें ही जीत पाई. हालत यह है कि हरियाणा में कई बार सरकार चलाने वाली इनलो विधानसभा में केवल दो सीटों पर ही सिमटी हुई है. 

लोक दल बेटे नहीं संभाल पाए विरासत

प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह का परिवार आज बिना बैशाखी के राजनीति नहीं कर सकता है.

प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह का परिवार आज बिना बैशाखी के राजनीति नहीं कर सकता है.

लोक दल की स्थापना किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने की थी. आजादी के आंदोलन से निकले चरण सिंह को किसानों का सबसे बड़े नेता माना जाता था. लोकदल को कभी उत्तर भारत की एक बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता था. उत्तर प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, हरियाणा का मुख्यमंत्री और उपप्रधानमंत्री रह चुके देवीलाल भी कभी लोकदल से जुड़े रहे. लेकिन 1987 में चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनके बेटे चौधरी अजित सिंह और पार्टी के दूसरे नेताओं में लोकदल का नेता बनने को लेकर वस्चर्व की लड़ाई शुरू हो गई. मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा. आयोग ने कहा कि अजित सिंह अपने पिता की संपत्ति के तो बारिश हो सकते हैं उनकी पार्टी के नहीं. इसके बाद अजित सिंह ने कई तरह के राजनीतिक प्रयोग करने के बाद 1996 राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया. लेकिन यह पार्टी कभी करिश्मा नहीं कर पाई. वह कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी तो कभी समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर पश्चिम उत्तर प्रदेश में कुछ सीटें जीत लेती है. इस समय इस पार्टी की कमान अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी के हाथ में है. वो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल है.राष्ट्रीय लोकदल केंद्र और उत्तर प्रदेश में साझीदार है. 

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