आम आदमी पार्टी (आप) ने 2022 के चुनाव में कई मुफ्त सुविधाओं का वादा कर पंजाब में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. लेकिन अब पार्टी अपने चुनावी वादों को पूरा करने में मुश्किलों का सामना कर रही है. सरकार के पहले साल में केवल कुछ ही बड़े वादे पूरे हुए. वहीं करीब आधे वादों को सरकार के कार्यकाल के आखिरी साल तक टाल दिया गया, जबकि लगभग इतने ही वादे अभी भी पूरे नहीं हुए हैं.
भगवंत मान सरकार के पहले साल में लागू की गई दो योजनाओं से लोगों को वास्तव में फायदा हुआ. हालांकि, इनसे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ा है. ये योजनाएं हैं, हर घर को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा. दिलचस्प बात यह है कि पैसों की कमी के कारण 'आप' सरकार ने अपने पांच बड़े चुनावी वादों को कार्यकाल के अंतिम साल तक के लिए टाल दिया. इनमें 'मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना', जिसके तहत महिलाओं को हर महीने 1000-1500 रुपये देने का वादा है, मेरी रसोई योजना, 10 लाख कामगारों के लिए मुफ्त रजिस्ट्रेशन, पंजाब स्टेट आउटसोर्स्ड पर्सनेल एक्ट, 2026 और मुख्यमंत्री सेहत योजना का विस्तार, जिसमें 10 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर देने की बात है, शामिल है.
पंजाब में 'आप'के कितने वादे अधूरे हैं
'आप' के कई वादे ऐसे हैं जिन्हें अभी भी अधूरा या केवल आंशिक रूप से पूरा माना जा रहा है. कुछ ही हफ्तों या महीनों में पंजाब को नशामुक्त बनाने और नशे के आदी लोगों का तेजी से पुनर्वास करने का वादा पूरा नहीं हुआ. पंजाब में नशे की समस्या अब भी बनी हुई है. 'आप' ने 25 लाख नौकरियां देने का वादा किया था. सरकार का कहना है कि उसने करीब 65 हजार सरकारी नौकरियां दी हैं और 5.5 लाख रोजगार के अवसर पैदा किए हैं. लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह आंकड़ा 25 लाख के वादे से बहुत कम है.
सरकार ने 22 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने और किसानों को कर्जमुक्त करने का भी वादा किया था. यह वादा भी अभी पूरा नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार खत्म करने और महिलाओं को पहले दिन से एक हजार रुपये प्रति माह देने का वादा भी देर से शुरू हुआ. महिलाओं को यह राशि 2026 में मिलनी शुरू हुई. विपक्ष अब उन सालों का पैसा भी मांग रहा है, जब यह योजना लागू नहीं हुई थी.

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कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा जुटाने को लेकर सरकार ने खनन समेत दूसरे स्रोतों से 20 हजार करोड़ रुपये जुटाने जैसे आंकड़े भी दिए थे. लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये केवल कागज पर किए गए हिसाब-किताब थे, वास्तव में सरकारी खजाने में इतनी रकम नहीं आई.
विपक्ष का आम आदमी पार्टी पर हमला
शिरोमणि अकाली दल ने 'आप' सरकार पर मुफ्त योजनाओं और चुनावी गारंटियों के नाम पर पंजाब को लूटने का आरोप लगाया है. अकाली दल के नेता सुखबीर बादल ने कहा,''आप ने चार साल में पंजाब के खजाने को लूटने के अलावा कुछ नहीं किया. उसने चार साल में विज्ञापनों पर साढ़े चार हजार करोड़ खर्च किए. केजरीवाल ने सरकार चलाई और AAP सरकार ने उनके यात्रा खर्च के बिल चुकाए. भगवंत मान की भूमिका सीमित रही. विकास का हिस्सा सिर्फ कागजों तक सीमित है.''
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने हालिया पंजाब यात्रा के दौरान मान सरकार पर हमला बोला. उन्होंने 'आप' को 'कट्टर बेईमान पार्टी' बताते हुए आरोप लगाया कि विज्ञापनों के जरिए जनता को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है. मोदी ने कहा कि पंजाब में जो कुछ हो रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है. विज्ञापनों के जरिए सरकार की नाकामियों और जनता के साथ कथित धोखे को छिपाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि जनता की सेवा के लिए ईमानदार नीयत और साफ सोच जरूरी है, लेकिन पंजाब में सत्ता में बैठी पार्टी के पास दोनों नहीं हैं. पीएम मोदी ने पंजाब पर बढ़ते कर्ज का भी मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि राज्य के नाम पर लगातार कर्ज लिया जा रहा है. बजट का बड़ा हिस्सा इस कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाता है, जबकि सरकार चलाने वाले इसी पैसे पर मौज कर रहे हैं.
विपक्ष ने बढ़ते कर्ज पर भी मान सरकार को घेरा
पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी 'आप' पर मुफ्त योजनाओं के नाम पर जनता को धोखा देने और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी ने सत्ता में आने से पहले कहा था कि वह नया कर्ज नहीं लेगी, वही अब केवल एक साल में 50 हजार करोड़ रुपये का कर्ज लेने की योजना बना रही है. बाजवा के मुताबिक पंजाब का कुल कर्ज बढ़कर चार लाख 47 हजार करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. इसका मतलब है कि हर पंजाबी पर करीब 1.04 लाख रुपये का कर्ज होगा. उन्होंने कहा कि 'आप' पंजाब का भविष्य नहीं बना रही, बल्कि भविष्य के नाम पर आज कर्ज ले रही है. आने वाली पीढ़ियों को आज की राजनीतिक घोषणाओं और आर्थिक गैर-जिम्मेदारी की कीमत चुकानी पड़ेगी.

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बाजवा ने 'आप' सरकार की 'शिक्षा क्रांति' पर भी सवाल उठाया. उनका कहना है कि सरकारी आंकड़े ही इस दावे की पोल खोलते हैं. साढ़े चार साल से अधिक समय में पंजाब में केवल दो नए सरकारी स्कूल खोले गए, जबकि सात स्कूल बंद कर दिए गए. स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या भी करीब छह लाख तक पहुंच गई है.
विपक्ष के आरोपों पर भगवंत मान का पलटवार
वहीं मुख्यमंत्री भगवंत मान ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनकी सरकार ने पंजाब की जनता से किए हर चुनावी वादे को पूरा किया है. उन्होंने कहा कि पंजाब विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है.'आप' ने राजनीति में एक नई परंपरा शुरू की है और चार साल में अपने सभी वादे पूरे किए हैं, जबकि दूसरी पार्टियां पांच साल में भी ऐसा नहीं कर पाईं.
मान ने कहा कि सरकार ने अपना पहला चुनावी वादा सिर्फ तीन महीने में पूरा कर दिया था. प्रशासन में पारदर्शिता लाना और युवाओं को रोजगार देना सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है.
उन्होंने इस आरोप को भी खारिज किया कि 'आप' ने लोगों को धोखा देने के लिए अपनी गारंटियों को कार्यकाल के आखिरी साल तक टाल दिया. मान ने कहा है कि विपक्ष के पास अब उनकी सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वह सस्ती राजनीति कर रहा है. उन्होंने दावा किया कि पिछले चार सालों में सरकार ने जनता की भलाई और पंजाब के विकास के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं.
क्या चुनावी साल में मुफ्त योजनाओं का फायदा 'आप' को मिलेगा
चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि चुनावी वादों को आखिरी साल तक टालना सरकार की खाली होती आर्थिक स्थिति की ओर इशारा करता है. लेकिन महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये, मुफ्त बस यात्रा, 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और कैशलेस इलाज जैसी सुविधाएं 'आप' को अपना बड़ा वोट बैंक वापस हासिल करने में मदद कर सकती हैं. पंजाब यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (आईडीसी) के चेयरमैन प्रो. प्रमोद कुमार कहते हैं कि आम मतदाता यह नहीं देखेगा कि कितने वादे टाले गए और कितने अभी बाकी हैं. लोग यह याद रखते हैं कि उन्हें सरकार से क्या मिला. उनके मुताबिक मुफ्त सुविधाएं और आर्थिक मदद वोट बैंक को बनाए रखने का आजमाया हुआ तरीका है. इसलिए इन योजनाओं से पंजाब में सत्तारूढ़ 'आप' को निश्चित रूप से फायदा हो सकता है.
'आप' की चुनावी गारंटियां यह भी दिखाती हैं कि पार्टी उन लोगों तक पहुंच बनाने का दावा कर रही है, जहां पहले की सरकारें नहीं पहुंच पाईं. 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली, नकद और खाद्य सहायता, ठेका कर्मचारियों को नियमित करना और मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजनाओं का मकसद यह दिखाना है कि सरकार का असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे सकता है- बिजली के बिल में, बस की यात्रा में और इलाज में. प्रो. प्रमोद कुमार कहते हैं कि यह छोटी राजनीतिक उपलब्धि नहीं है. पंजाब लंबे समय से किसानों की परेशानी और आर्थिक संकट के बीच फंसा हुआ है. ऐसे में लोगों को हर महीने मिलने वाली आर्थिक राहत बड़े और लंबे समय के सुधारों की तुलना में राजनीतिक रूप से ज्यादा आसानी से समझ आती है.

चुनावी साल में कुछ योजनाएं शुरू करने और मुफ्त और नगद पैसे देने जैसी योजनाओं का फायदा आम आदमी पार्टी को मिल सकता है.
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क्या मुफ्त की योजनाओं से समस्याओं का समाधान होगा
अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोगों को आर्थिक राहत देना और राज्य की असली समस्याओं को ठीक करना दो अलग-अलग बातें हैं. भारी सब्सिडी और बार-बार दी जाने वाली आर्थिक मदद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कहीं पंजाब भविष्य में मिलने वाले राजस्व को आज की राजनीतिक लोकप्रियता के लिए तो खर्च नहीं कर रहा. आईडीसी के निदेशक प्रो. वरिंदर शर्मा कहते हैं कि जब सरकार हर महीने आने वाले खर्चों और बिलों में पैसा लगाने के लिए मजबूर होती है, तो विकास और नई परियोजनाओं पर होने वाला खर्च प्रभावित होता है. उनके मुताबिक अपराध, फिरौती और नशे का कारोबार ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें विपक्ष आसानी से नहीं छोड़ने वाला. किसान संगठन भी लगातार कहते रहे हैं कि फसलों की खरीद और ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा जैसी सुविधाएं सरकार के वादों के मुताबिक नहीं हैं.
कल्याणकारी योजनाएं चुनावी चर्चा का रुख बदल सकती हैं, लेकिन वे इन समस्याओं को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं. सरकारी सेवाओं की कमियां भी चुनाव में मुद्दा बन सकती हैं. मुफ्त योजनाओं से 'आप' को फायदा मिल सकता है, लेकिन सरकारी सेवाओं में कमियां भी उसके लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं. मिसाल के तौर पर आम आदमी क्लीनिक के कर्मचारियों की कम वेतन को लेकर हड़ताल, खाली पड़े जिम, स्कूलों में खराब बुनियादी सुविधाएं, नौकरियां बाहरी लोगों को दिए जाने के आरोप और करीब छह लाख कर्मचारियों के बकाया भुगतान जैसे मुद्दे सरकार के प्रदर्शन को परखने का आधार बन सकते हैं. यही मुफ्त योजनाओं पर आधारित राजनीति का जोखिम भी है.
जब लोगों के खाते में पैसा पहुंचता है या उन्हें कोई मुफ्त सुविधा मिलती है, तो सरकार उन्हें जरूरी लगती है. लेकिन जब कोई क्लीनिक बंद होता है, तो वही व्यक्ति इलाज के लिए भीड़-भाड़ वाले जिला अस्पताल में जाने को मजबूर होता है. 'आप' यह दावा कर सकती है कि कोई भी दूसरी पार्टी मुफ्त बिजली या महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा बंद नहीं करेगी. लेकिन वह यह दावा नहीं कर सकती कि स्वास्थ्य और शिक्षा की उसकी व्यवस्था पूरी तरह सफल हो चुकी है, जबकि उसके अपने कर्मचारी हड़ताल पर जा रहे हैं. चुनावी साल में सरकार की क्षमता केवल योजनाओं की घोषणा से साबित नहीं होती. असली परीक्षा इस बात से होती है कि इन योजनाओं का फायदा लोगों तक लगातार और सही तरीके से पहुंच रहा है या नहीं.
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