- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी हार के बाद पार्टी में अंदरूनी कलह और विवाद गहराए हैं
- टीएमसी के कई विधायक नेता प्रतिपक्ष के लिए ऋतब्रत को समर्थन देने की तैयारी में, जिससे पार्टी में टूट का खतरा
- ममता बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित कर दिया है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आ गई है. बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति पर नया विवाद खड़ा होता नजर आ रहा है. सूत्रों के अनुसार, टीएमसी के एक बड़े वर्ग के विधायक अब ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में समर्थन देने की तैयारी में हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. हालांकि, ममता बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निष्काषित कर दिया है. इस बीच सूत्रों की मानें तो ऋतब्रत बनर्जी के खेमे के 50 विधायक ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं.
टीएमसी में 2 खेमे!
कोलकाता में पिछले कुछ दिनों से लगातार बैठकों का दौर जारी है. बताया जा रहा है कि पार्टी के नाराज विधायकों को मनाने और उन्हें ममता बनर्जी के साथ जोड़कर रखने की कोशिशें की जा रही हैं. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि नाराजगी सीधे मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली को लेकर कई विधायक असंतुष्ट हैं. इसी वजह से पार्टी के भीतर दो अलग-अलग खेमों के बनने की चर्चा तेज हो गई है.
...तो छिन सकता है पार्टी का नाम और सिंबल?
तृणमूल कांग्रेस पर छाए संकट के बाद और गहरा सकते हैं. संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि टीएमसी के 50 विधायक ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं. 12 टीएमसी सांसदों ने भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी कर ली है. इसके अलावा दल बदलने की तैयारी कर रहे सांसदों की लिस्ट में 5 से 6 नाम और हैं. इससे पहले 100 से ज्यादा टीएमसी पार्षद पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं. हालांकि, ये नहीं बताया गया कि ये सांसद कौन होंगे और कब तक दल बदल की योजना बना रहे हैं. राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो पार्टी 2 भागों में बंट जाएगी. इसके बाद असली टीएमसी कौन का सवाल खड़ा होगा? ऐसे में ममता बनर्जी से पार्टी का नाम और सिंबल भी छिन सकता है. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ ऐसा होते हुए हम देख चुके हैं.
कौन हैं ऋतब्रत बंदोपाध्याय?
46 वर्षीय ऋतब्रत एक अलग राजनीतिक विचारधारा से आते हैं. ऋतब्रत के लिए पार्टी से निष्कासन कोई नई बात नहीं है. ऐसा तब भी हुआ था, जब वे वामपंथी दल में थे. पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के करीबी माने जाने वाले इस युवा राजनेता को 2014 में सीपीआई (एम) ने राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनीत किया था. उनका कार्यकाल 2020 तक निर्धारित था. हालांकि, 2017 में विभिन्न आरोपों और पार्टी लाइन के विरुद्ध उनके व्यवहार के कारण सीपीआई (एम) ने उन्हें निष्कासित कर दिया. अगले तीन वर्षों तक उन्होंने राज्यसभा में निर्दलीय सदस्य के रूप में कार्य किया. आर.जी. कर अस्पताल विवाद के बाद, जब जवाहर सरकार ने अपने कार्यकाल के मध्य में राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया, तो ऋतब्रत ने तृणमूल के टिकट पर डेढ़ साल के लिए राज्यसभा में एंट्री ली थी. बाद में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी, ऋतब्रत को विधानसभा में लाए और उन्हें राज्य विधानसभा के लिए उम्मीदवार बनाया.
संदीपान साहा कौन हैं?
संदीपान साहा, टीएमसी की पूर्व विधायक स्वर्णकला साहा के पुत्र हैं. संदीपान पहले कोलकाता नगर पालिका में पार्षद रह चुके हैं. उन्हें टीएमसी के टिकट पर कोलकाता के एंटाली से चुनाव लड़ने का टिकट मिला था. हमें बताया जा रहा है कि टीएमसी द्वारा दोनों नेताओं को निष्कासित करने के बाद, अब वे समर्थन जुटाने के लिए 50 से अधिक विधायकों के संपर्क में हैं. इनमें से कई विधायकों ने कोलकाता के पूर्वी महानगरपालिका बाईपास के पास एक होटल में ऋतब्रत से मुलाकात की.
ममता के खिलाफ बन रही रणनीति?
ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने हाल ही में विधानसभा से जुड़े कथित 'सिग्नेचर स्कैंडल' को सार्वजनिक किया था. इस कार्रवाई को पार्टी अनुशासन से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे असंतोष की आवाज दबाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, रविवार को कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर बुलाई गई बैठक में लगभग 80 विधायकों में से सिर्फ 20 पहुंचे. इतनी बड़ी संख्या में विधायकों की अनुपस्थिति ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. माना जा रहा है कि अनुपस्थित विधायकों में से कम से कम 10 विधायक हाल के दिनों में कोलकाता में अलग बैठकें कर चुके हैं.
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इस बीच टीएमसी द्वारा नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी सोभोंदेब चट्टोपाध्याय को आगे बढ़ाया गया है. लेकिन पार्टी के भीतर जारी विरोध और वैकल्पिक नेतृत्व की मांग के कारण उनकी नियुक्ति भी संकट में घिरती दिखाई दे रही है. बंगाल की राजनीति में इस समय टीएमसी का आंतरिक संघर्ष सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व नाराज विधायकों को मनाने में सफल होता है या फिर यह विवाद किसी बड़े राजनीतिक विस्फोट का रूप लेता है.
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