नई दिल्ली:
पाकिस्तान के कई कैदियों को सजा पूरा करने के बावजूद अधिक समय तक भारतीय जेल में बंद रखने पर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार की खिंचाई की। उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘सरकार की ओर से पूरी तरह से निष्क्रियता और शिथिलता बरती गई है।’
शीर्ष न्यायालय में न्यायमूर्ति आरएम लोढा और न्यायमूर्ति एचएल गोखले की पीठ ने कहा, ‘हम सजा पूरा करने के बावजूद जेल में बंद रखे जाने वाले लोगों की स्वतंत्रता के बारे में अधिक चिंतित हैं।’ उन्होंने इस बात पर अफसोस व्यक्त किया कि कुछ कैदियों को बिना कोई मामला दर्ज किये हिरासत में रखा गया है।
पीठ ने कहा, ‘कृपया आप इस प्रक्रिया के बारे में बतायें जिसके तहत आपने इन्हें हिरासत में लिया और इतने अधिक समय तक कैद में रखा। हम व्यापक न्याय के प्रश्न पर चिंतित हैं।’ शीर्ष न्यायालय ने संकेत दिया कि विदेशी नागरिकों को अधिक समय तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत विदेशी नागरिकों समेत देश के सभी लोगों को प्रदत्त जीवन एवं स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
उच्चतम न्यायालय ने अतिरिक्त सालिसिटर जनरल विवेक तनखा को सरकार की नीति के बारे में जानकारी देने को कहा। इसमें विदेशी नागरिकों से निपटने के बारे में अगर कोई नीति है तो उसकी जानकारी देने को भी कहा गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि विदेशी नागरिकों के कथित तौर पर अवैध रूप से जेल में रखे जाने का मामला अदालतों में 2005 से लंबित है लेकिन सरकार ने इन्हें भेजने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने कई निर्देशों के बावजूद इस मुद्दे से निपटने में शिथिलता दिखायी। जहां इनमें से कुछ लोगों को अवैध रूप से देश में घुसने के मामले में गिरफ्तार किया गया है, वहीं कुछ अन्य को कथित विध्वंसकारी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार किया गया।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हम नहीं चाहते कि आपके नौकरशाह फाइलों को दबाये रखे और इसके बाद सो जाएं। हम सेक्शन अफिसर से कोई स्पष्टीकरण नहीं चाहते हैं। कृपया समग्र ब्यौरा दें कि क्या इस संबंध में कोई द्विपक्षीय नीति है।’ पीठ ने कहा, ‘हमें इस बात के लिए मजबूर नहीं करें कि स्पष्टीकरण के लिए वरिष्ठ अधिकारी को उपस्थित होने का समन जारी करना पड़े।’ अदालत ने कुछ कैदियों के मामले में इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन करार दिया।
उच्च्तम न्यायालय ने भारतीय जेल में कथित तौर पर अधिक समय तक कैद कर रखे गए पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिकों से संबंधित दो अलग अलग जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह बात कही।
शीर्ष न्यायालय में न्यायमूर्ति आरएम लोढा और न्यायमूर्ति एचएल गोखले की पीठ ने कहा, ‘हम सजा पूरा करने के बावजूद जेल में बंद रखे जाने वाले लोगों की स्वतंत्रता के बारे में अधिक चिंतित हैं।’ उन्होंने इस बात पर अफसोस व्यक्त किया कि कुछ कैदियों को बिना कोई मामला दर्ज किये हिरासत में रखा गया है।
पीठ ने कहा, ‘कृपया आप इस प्रक्रिया के बारे में बतायें जिसके तहत आपने इन्हें हिरासत में लिया और इतने अधिक समय तक कैद में रखा। हम व्यापक न्याय के प्रश्न पर चिंतित हैं।’ शीर्ष न्यायालय ने संकेत दिया कि विदेशी नागरिकों को अधिक समय तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत विदेशी नागरिकों समेत देश के सभी लोगों को प्रदत्त जीवन एवं स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
उच्चतम न्यायालय ने अतिरिक्त सालिसिटर जनरल विवेक तनखा को सरकार की नीति के बारे में जानकारी देने को कहा। इसमें विदेशी नागरिकों से निपटने के बारे में अगर कोई नीति है तो उसकी जानकारी देने को भी कहा गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि विदेशी नागरिकों के कथित तौर पर अवैध रूप से जेल में रखे जाने का मामला अदालतों में 2005 से लंबित है लेकिन सरकार ने इन्हें भेजने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने कई निर्देशों के बावजूद इस मुद्दे से निपटने में शिथिलता दिखायी। जहां इनमें से कुछ लोगों को अवैध रूप से देश में घुसने के मामले में गिरफ्तार किया गया है, वहीं कुछ अन्य को कथित विध्वंसकारी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार किया गया।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हम नहीं चाहते कि आपके नौकरशाह फाइलों को दबाये रखे और इसके बाद सो जाएं। हम सेक्शन अफिसर से कोई स्पष्टीकरण नहीं चाहते हैं। कृपया समग्र ब्यौरा दें कि क्या इस संबंध में कोई द्विपक्षीय नीति है।’ पीठ ने कहा, ‘हमें इस बात के लिए मजबूर नहीं करें कि स्पष्टीकरण के लिए वरिष्ठ अधिकारी को उपस्थित होने का समन जारी करना पड़े।’ अदालत ने कुछ कैदियों के मामले में इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन करार दिया।
उच्च्तम न्यायालय ने भारतीय जेल में कथित तौर पर अधिक समय तक कैद कर रखे गए पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिकों से संबंधित दो अलग अलग जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह बात कही।
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