प्रणय रॉय, अरविंद सुब्रमणियन के बीच महामारी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा : पूरी वार्ता

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमणियन ने एनडीटीवी के प्रणय रॉय के साथ अर्थव्यवस्था की स्थिति और आर्थिक नीतियों पर चर्चा की

प्रणय रॉय, अरविंद सुब्रमणियन के बीच महामारी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा : पूरी वार्ता

अरविंद सुब्रमणियन और डॉ. प्रणय रॉय ने मौजूदा और कोविड के बाद के आर्थिक परिदृश्य पर चर्चा की

नई दिल्ली:

कोरोना वायरस से दूसरे सबसे ज्यादा प्रभावित देश भारत की अर्थव्यवस्था कब और कैसे दोबारा उछाल मारेगी ? बजट में ऐसे कौन से नीतिगत निर्णय किए जाने चाहिए जो इस झटके के असर को कम कर सकें ? डॉ. प्रणय रॉय (NDTV's Dr Prannoy Roy) और पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन (Former Chief Economic Advisor Dr Arvind Subramanian) ने इन्हीं मुद्दों को लेकर मौजूदा और कोविड के बाद के आर्थिक परिदृश्य पर चर्चा की.

ये है बातचीत का पूरा ब्योरा :

NDTV:भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण दौर के साथ कई कारणों से यह दशकों का सबसे अहम बजट बन गया है. आर्थिक सर्वेक्षण भी, जो एक अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन करने का मौका देता है. वायरस ने अर्थव्यवस्था को तगड़ा नुकसान पहुंचाया है. लोगों के जीवन और आजीविका पर गहरा असर पड़ा है. ऐसे में इकोनॉमी कब और कैसे बाउंसबैक करेगी. बजट में ऐसे क्या नीतिगत निर्णय होने चाहिए ?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : भारतीय अर्थव्यवस्था पर आपके साथ चर्चा करना हमेशा सुखद रहा है.

NDTV: यह बेहद महत्वपूर्ण बजट और आर्थिक सर्वेक्षण है?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : वर्ष 2015 के पूर्ण बजट के बाद यह सरकार का सबसे अहम बजट है. पहला यह कि अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंची है और हमें इससे उबरना है. लेकिन यह वक्त सरकार के लिए रास्ते को दोबारा व्यवस्थित करने का भी है. यह नीति निर्माण के रुख को दोबारा दुरुस्त करने का मौका है.

NDTV:  आपके दस्तावेजों, अध्ययनों से साफ पता चलता है कि महामारी ने अर्थव्यवस्था को कितनी भयानक क्षति पहुंचाई है.लेकिन समस्याएं पहले भी थीं. हम महामारी की ओर बढ़ने की बात कर रहे थे, कुछ चीजें ठीक नहीं थीं, है ना?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : महामारी और लॉकडाउन से आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आई. लेकिन अर्थव्यवस्था में कमजोरियां पहले ही थीं. हमने बात की थी कि कैसे विकास दर पहले ही नीचे आ रही थी. निर्यात में काफी गिरावट आई थी. लिहाजा अर्थव्यवस्था के कोविड के पहले की कमजोरियों और महामारी को लेकर हमारी प्रतिक्रिया का मिश्रित प्रभाव रहा. आईएमएफ ने कहा है कि महामारी के वर्ष 2020 में भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में होगा और जीडीपी में करीब 8 फीसदी की गिरावट देखने को मिलेगी.

NDTV: जीडीपी में 8 फीसदी की कमी विकासशील देशों में सबसे खराब प्रदर्शन होगा. वास्तव में विकासशील देशों की जीडीपी दर का औसत इससे काफी कम 2.4 फीसदी है. लेकिन अच्छी खबर है कि आईएमएफ के अनुमान के अनुसार, अगले साल भारत 11.5% के साथ सबसे तेज विकास दर वाला विकासशील देश होगा. दूसरे विकासशील देशों के मुकाबले हमारी गति दोगुनी होगी, लेकिन क्या हम सामान्य स्थिति में होंगे. लेकिन वित्त वर्ष 2020 में 8 फीसदी लुढ़कने और 2021 में 11.5 फीसदी बढ़ोतरी का आकलन 2019 के मुकाबले करें तो वृद्धि महज 2.6 फीसदी होगी. अगर आईएमएफ का अनुमान सही रहता भी है तो भी हम सामान्य परिस्थितियों के हिसाब से जीडीपी में कम से कम 8% पीछे रहेंगे.

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डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : मेरी एक ही चिंता है कि ये सारे आंकड़े अस्थिरता के साथ जुड़े हैं. लेकिन यह निश्चित है कि 2021 भारत के लिए बेहद अच्छा होगा.

NDTV: क्या जीडीपी ग्रोथ 12 या 14 फीसदी हो सकती है?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : जितना भी हो, लेकिन यह होने जा रहा है.

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NDTV: लेकिन अरविंद अगर यह अच्छा साल होने जा रहा है. तो फिर यह काफी सामान्य बजट होगा.

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : अर्थव्यवस्था 2-3 वजहों से वापस उछाल मारेगी. पहला यह है कि कोरोना की स्थिति बेहतर होने के साथ सारी बंदिशें खत्म होने पर आर्थिक गतिविधियां अपनेआप तेज हो जाएंगी. दूसरा वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी तेजी रहेगी, व्यापार बढ़ेगा और भारत को भी इसका फायदा होगा. वित्तीय स्थितियां अच्छी हैं, पूरी दुनिया में ब्याज दर बेहद कम हैं, व्यापार बढ़ेगा और स्वाभाविक तौर पर भी लंबी सुस्ती के बाद तेजी दिखेगी. इन सभी कारणों से 2021 अपेक्षाकृत अच्छा रहेगा. लेकिन दो चुनौतियां हैं, 2019 के मुकाबले 1.5 से 1.7 करोड़ लोगों का रोजगार छिना है. दूसरा यह कि आरबीआई ने कहा है कि फंसा कर्ज (एनपीए) कुल कर्ज का 7.5 से बढ़कर 13.5 फीसदी तक पहुंच सकता है.

NDTV: हालांकि आपके दस्तावेजों से पता चलता है कि भारत ने कुछ हद तक आर्थिक स्थिरता बेहतर हुई है. NDA 1 में सरकारी कर्ज 75% था, यूपीए 1 में यह 60 और यूपीए 2 में 55 फीसदी थी. मौजूदा बीजेपी सरकार में यह कम हुआ है. यानी सरकारी कर्ज में कमी आई है. हालांकि यह विकासशील देशों के औसत 52 % से थोड़ा ज्यादा है.

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : सॉरी, हम सभी को स्पष्ट करना चाहेंगे कि हम महामारी के दस्तक देने के पहले के आंकड़ों पर बात कर रहे हैं. महामारी के बाद सरकारी ऋण के आंकड़े बेहद अलग होंगे. दोबारा वो स्थिति पाना चुनौतीपूर्ण होगा.

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NDTV:आपने दिखाया है कि महंगाई नीचे आ रही है.UPA 1 में यह ऊपर गई और UPA 2 मे तो यह 10 फीसदी से ऊपर पहुंच गई. बीजेपी सरकार में यह करीब 5% है. लेकिन ये महामारी के पहले की बात है.
मौजूदा अकाउंट बैलेंस यानी कुल आयात के मुकाबले निर्यात की बात करें तो यह अच्छी स्थिति में है. यह जीडीपी का एक फीसदी है. हालांकि विकासशील देशों के औसत से कुछ अधिक. तो इन सकारात्मक बातों का कैसा असर होगा?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : भारत ने पहले आर्थिक अस्थिरता और वित्तीय संकट देखा है. हरीश दामोदरन ने कहा था कि चार चीजें फूड, फ्यूल, फॉरेन एक्सचेंज और फिस्कल (वित्तीय घाटा) हैं. जो असर डालती हैं. आप देख चुके हैं कि खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े, तेल की कीमतें बढ़ीं और हमारे पास पर्याप्त मुद्रा भंडार नहीं था. और महामारी के बाद वित्तीय घाटे की बात करें तो अस्थिति पहले के मुकाबले नियंत्रण में हैं. ये सरकार व्यापक आर्थिक स्थिरता में यकीन करती है. महंगाई कम है और विदेशी मुद्रा भंडार 600 अरब डॉलर के आसपास है. लिहाजा पहले के मुकाबले हम कम आर्थिक अस्थिरता के दौर में हैं.

NDTV: आपने बताया कि गरीबों तक सीधे पहुंचने वाली कई चीजों की बात की. महिलाओं के बैंक खाते 10 साल में 20 से बढ़कर 35% पहुंच गए हैं. 2015 से 2019 के बीच यह 60% पर पहुंच गए. एलपीजी गैस सिलेंडरों का दायरा 10 साल में 25 से 40 फीसदी पहुंचा था, लेकिन पिछले 4 साल में यह बढ़कर 60 फीसदी हो गया. बिजली की पहुंच भी एक दशक में 60 से बढ़कर 75% हुई लेकिन हालिया वर्षों में यह 95% तक पहुंच गई. अंत में टॉयलेट की बात करें तो इसकी उपलब्धता भी 10 साल में 45 से बढ़कर 60% पर पहुंची. लेकिन पिछले 4-5 सालों में यह 15% और बढ़ गई. क्या यह कल्याणकारीवाद का सबसे अच्छा तरीका है.

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : इसे मैं सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानता हूं. यह समग्र विकास है. सरकारों ने शिक्षा और स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा जैसे यूपीए के दौरान मनरेगा, पीडीएस, राइट टू एजुकेशन, राइट टू फूड, जैसे कार्य हुए हैं. लेकिन मोदी सरकार की एप्रोच अलग है. गरीबों का जीवन स्तर इनसे सुधरा है और राजनीतिक तौर पर इसका फायदा सरकार को मिला है.

NDTV: लेकिन बैंक खातों, टॉयलेट और एलजीपी गैस चूल्हों की योजनाओं में आपको नहीं लगता कि बेहतर तरीके से लागू करने की जरूरत है

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : सही है कि हम इन योजनाओं की पहुंच का आंकड़ा दे रहे हैं, उनके वास्तविक इस्तेमाल का नहीं. लिहाजा क्रियान्वयन में कमियां हैं. लेकिन चूंकि सरकार का इन चीजों पर दृढ़ विश्वास है तो वह इन्हें बेहतर तरीके से लागू करने पर ध्यान देगी 

NDTV: लेकिन बच्चों की सेहत की बात करें तो यूपीए के दौरान एनीमिया 65 से घटकर 55 फीसदी पर आया था, अब यह तेजी से बढ़ा है. बच्चों के ठिगनेपन का आंकड़ा भी 30 फीसदी पर ठहर गया है. डायरिया की स्थिति 14 साल पुराने स्तर पर पहुंच गई है.

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : यह माना जाता है कि आय और खर्च करने की क्षमता बढ़ने के साथ सेहत और शिक्षा में भी सुधार आता है, लेकिन क्या देश में उतने आर्थिक अवसर हैं, जो सही मायने में गरीब बच्चों और महिलाओं के शिक्षा और स्वास्थ्य स्तर में सुधार लाते हों

NDTV: भारत को निर्यात आधारित आर्थिक विकास वाला देश बनना चाहिए. भारत की निर्यात के मामले में वृद्धि दर तीसरी सबसे ज्यादा है. वियतनाम 16%, चीन 15.5 और भारत की 13.4% , जबकि वैश्विक औसत 6.9%. क्या इससे जीडीपी को फायदा मिला है

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : जब निर्यात अच्छा होता है तो अर्थव्यवस्था बेहतर होती है. हमने सेवा क्षेत्र के साथ मैन्युफैक्चरिंग निर्यात में भी बेहतर प्रदर्शन किया है. हमने हाई स्किल मैन्युफैक्चरिंग में बेहतर किया है, लेकिन अनस्किल्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे टेक्सटाइल, क्लाथिंग, लेदर, फुटवियर, खिलौनों पर ध्यान देना होगा

NDTV: आप इस बजट में क्या देखना चाहेंगे  ?

डॉ. अरविंद सुब्रमणियन : पहला हम अभी महामारी से उबरे नहीं हैं तो मनरेगा, पीडीएस, कैश ट्रांसफर जैसी चीजें जारी रहनी चाहिए. दूसरा कि बजट में नए चौंकाने वाली बातें रहती हैं, लेकिन मुझे लगता है कि टैरिफ बढ़ाने जैसे आश्चर्यचकित करने वाली बातों से सरकार दूर रहेगी. मुझे लगता है कि टैक्स के दायरे से बहुत से लोगों को बाहर करने की नीति में सरकार कदम कुछ वापस खींच सकती है. वापस इसका दायरा बढ़ सकता है.

लेकिन सबसे अहम है कि बजट पारदर्शी होना चाहिए. आंकड़े विश्वसनीय होने चाहिए. वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए गंभीर योजना हो. कृषि हो या जीएसटी , नीति निर्माण में सामान्यतया कुछ सहयोगात्मक रुख होना चाहिए. 


NDTV: क्या आपको लगता है कि बजट घाटे को लेकर चिंतित होना चाहिए.

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डॉ. अरविंद सुब्रमणियन  :अभी सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत है. सरकार को खर्च बढ़ाने के कई साधन खोजने होंगे, जैसे निजीकरण की तेज मुहिम. अगर अगले साल अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन बेहतर रहता है तो कर्ज खुदबखुद कम हो जाएगा. अस्थायी तौर पर अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए ज्यादा खर्ज की जरूरत है.