गुड़गांव:
भारत में इस वक्त हेपेटाइटिस वायरस से करीब चार करोड़ लोग संक्रमित हैं और इस वजह से हर साल 1000 से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। इतना ही नहीं, हेपेटाइटिस वायरस से बचा जा सकता है,लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से हम तमाम सुविधाएं होते हुए भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। विश्व हेपेटाइटिस दिवस की पूर्व संध्या पर यह बात मेदांता अस्पताल के इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव एंड हेपाटोबिलिरी साइंसेज विभाग के वाइस चेयरमैन डॉ.गौरदास चौधरी ने कही।
डॉ.चौधरी ने कहा कि गंभीर बीमारी की भयावहता को समझने में हमारी विफलता हेपेटाइटिस के राक्षस को लगातार विकराल किए जा रही है। उन्होंने हेपेटाइटिस के बारे में आसान शब्दों में बताते हुए कहा, आम आदमी की भाषा में हेपेटाइटिस यकृत में होने वाली सूजन का नाम है। चिकित्सीय भाषा में ऐसी सूजन के सामान्य कारणों में हेपेटाइटिस वायरस ए,बी,सी,डी और ई को दोषी माना जाता है, जो यकृत पर हमला कर यकृत कोशिकाओं को खत्म कर देते हैं।
उल्लेखनीय है कि हेपेटाइटिस बी वायरस को सबसे ज्यादा संक्रमणकारी माना जाता है और माना जाता है कि यह एचआईवी वायरस से 50 से 100 गुना ज्यादा संक्रमण करता है। डॉ. चौधरी ने कहा, विडंबना यह है कि हेपेटाइटिस बी पर भी आसानी से काबू पाया जा सकता है और इसके टीके 1982 के बाद से बाजार में उपलब्ध हैं। लेकिन, फिर भी इससे प्रभावित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
डॉ.चौधरी ने मीडिया से आग्रह करते हुए कहा कि विश्व हेपेटाइटिस दिवस का अवसर लोगों को इस गंभीर बीमारी के बारे में अवगत कराने का है। उन्होंने कहा, जागरुकता की कमी का आलम यह है कि भारत का पढ़ा-लिखा वर्ग भी हेपेटाइटिस की गंभीरता और उसकी भयावहता को नहीं समझता। सिर्फ जागरुकता से 80 फीसदी मामले ठीक हो सकते हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि अभी हमने इस वायरस को गंभीरता से लिया ही नहीं है।
डॉ.चौधरी ने कहा कि गंभीर बीमारी की भयावहता को समझने में हमारी विफलता हेपेटाइटिस के राक्षस को लगातार विकराल किए जा रही है। उन्होंने हेपेटाइटिस के बारे में आसान शब्दों में बताते हुए कहा, आम आदमी की भाषा में हेपेटाइटिस यकृत में होने वाली सूजन का नाम है। चिकित्सीय भाषा में ऐसी सूजन के सामान्य कारणों में हेपेटाइटिस वायरस ए,बी,सी,डी और ई को दोषी माना जाता है, जो यकृत पर हमला कर यकृत कोशिकाओं को खत्म कर देते हैं।
उल्लेखनीय है कि हेपेटाइटिस बी वायरस को सबसे ज्यादा संक्रमणकारी माना जाता है और माना जाता है कि यह एचआईवी वायरस से 50 से 100 गुना ज्यादा संक्रमण करता है। डॉ. चौधरी ने कहा, विडंबना यह है कि हेपेटाइटिस बी पर भी आसानी से काबू पाया जा सकता है और इसके टीके 1982 के बाद से बाजार में उपलब्ध हैं। लेकिन, फिर भी इससे प्रभावित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
डॉ.चौधरी ने मीडिया से आग्रह करते हुए कहा कि विश्व हेपेटाइटिस दिवस का अवसर लोगों को इस गंभीर बीमारी के बारे में अवगत कराने का है। उन्होंने कहा, जागरुकता की कमी का आलम यह है कि भारत का पढ़ा-लिखा वर्ग भी हेपेटाइटिस की गंभीरता और उसकी भयावहता को नहीं समझता। सिर्फ जागरुकता से 80 फीसदी मामले ठीक हो सकते हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि अभी हमने इस वायरस को गंभीरता से लिया ही नहीं है।
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