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This Article is From Nov 24, 2014

मुंबई आईआईटी के छात्रों का कमाल, अब आधा हो जाएगा डायलिसिस का खर्चा

मुंबई:

खराब गुर्दे, थकता शरीर, और हर तीसरे दिन शरीर में मोटी सुइयां चुभोकर शरीर का सारा खून डायलिसिस मशीन से गुज़ारने का दर्द मरीज़ों को जितना टीसता है, उतना ही इस इलाज का ख़र्च भी है। डेढ़ से दो हज़ार रुपये की लागत का एक डायलिसिस सेशन और महंगा हो सकता है, क्योंकि इसके अहम हिस्से विदेश से आयात किए होते हैं।

मुंबई आईआईटी की नई खोज से यह ख़र्च क़रीब आधा होने की उम्मीद है। 'डायलाइज़र' नाम के इस हिस्से की हू-ब-हू नकल से आगे बढ़कर आईआईटी के केमिस्ट्री विभाग ने इसमें और सुधार किया है। इससे डायलिसिस के साइड इफ़ेक्ट भी कम होने का दावा इसे बनाने वाली टीम ने किया है।

प्रोफेसर जयेश बेल्लारे इस परियोजना के प्रमुख हैं। एनडीटीवी से उन्होंने कहा, 'यह उत्पाद क्लिनिकल ट्रायल के लिए तैयार है। हम इसे अगले तीन से चार साल में बाज़ार में लाना चाहते हैं, लेकिन परियोजना की लागत को देखते हुए हमें अब सरकार या उद्योग जगत से मदद की उम्मीद है।'

आईआईटी ने एनडीटीवी को डायलाइज़र के वह धागे दिखाए, जो इस तकनीक का राज़ हैं। डायलिसिस दरअसल एक परिष्कृत छलनी के ज़रिये खून को छानता है। एक कांच के ट्यूब में ख़ास धागों का पुलिंदा होता है। इस ट्यूब में एक तरफ़ से अशुद्ध खून आता है, और इन धागों से गुज़रता हुआ शुद्ध होता जाता है। खून में मौजूद युरिक ऐसि़ड, क्रिएटिनीन जैसी अशुद्धियां ये धागे सोखते हुए गुर्दों का काम करते हैं।

आईआईटी ने इन्ही धागों की सामग्री पहचानी और इनमें विटामिन के पॉलिमर मिलाकर धागों को इंसानी प्रकृति के अनुकूल बनाया। इनके संपर्क में आते खून में इन्फेक्शन का ख़तरा कम होता है, इन धागों का ख़र्च विदेशी धागों से आधा है, और इनसे खून ज़्यादा तेज़ी से छनता है। पुराने डायलिसिस का एक सेशन दो से तीन घंटे चलता है, इस समय को भी कम करने का दावा आईआईटी मुंबई ने किया है।

इन्ही धागों का कारखाना भी इन छात्रों ने कैम्पस में खोल रखा है। धागों के कच्चे माल का तरल घोल एक पिचकारी के ज़रिये पतली धार में लगातार गिरता रहता है। हवा के संपर्क में आते ही यह ठोस बनता है। सेंवइयों-सा दिखता पतला धागा दूसरे छोर पर मशीन के ज़रिए लगातार लपेटा जा रहा था।

पीएचडी स्नातक रोहित तेवतिया बताते हैं, 'हम यहां एक दिन में दस किलोमीटर धागा बनाते हैं। इनका मोटापा, लचीलापन, टिकाऊपन फ़िलहाल आंका जा रहा है। हमसे कई कंपनियां पूछताछ कर रही हैं, और हम तीन से चार साल में इसका पूरा उत्पादन शुरू करना चाहते हैं।'

भारत में 2.3 लाख लोग गुर्दों की परेशानी से ग्रस्त हैं, और इन में से 90% लोग सस्ते इलाज की कमी का शिकार बनते हैं। भारत में किसी भी वक्त आठ लाख मरीज़ डायलिसिस के इंतज़ार में होते हैं, लेकिन डायलिसिस का खर्च इनमें से कई लोगों की पहुंच के बाहर है। इन हालात में आईआईटी का सस्ता, स्वदेशी डायलिसिस 'मेक इन इंडिया' के नारे का जीवनरक्षक यथार्थ बन सकता है।

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