
अब दोनों पार्टियां कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने विधायकों को बचाने में लगी हैं.
कमलनाथ सरकार संकट में?
एनडीटीवी के संवाददाता को मिली जानकारी के मुताबिक, ''कांग्रेस विधायकों को आज जयपुर के ब्यूना विस्टा रिजॉर्ट में शिफ्ट किया जा सकता है. कांग्रेस विधायकों को हवाई अड्डे पर ले जाने के लिए भोपाल में मुख्यमंत्री के घर के अंदर तीन बसें तैयार हैं, जहां से उनके जयपुर रवाना होने की संभावना है.'' वहीं, न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक मध्य प्रदेश के भाजपा विधायकों को गुरुग्राम के आईटीसी भारत में ठहराया गया है.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को नौ मार्च को लिखे इस्तीफा पत्र में सिंधिया ने कहा कि उनके लिये आगे बढ़ने का समय आ गया है क्योंकि इस पार्टी में रहते हुए अब वह देश के लोगों की सेवा करने में अक्षम हैं. कांग्रेस पार्टी ने कहा कि उनका पत्र सोनिया गांधी के आवास पर मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर मिला. इस दिन उनके पिता और कांग्रेस नेता माधव राव सिंधिया का 75 वां जन्मदिन है.
सिंधिया के पार्टी छोड़ने के साथ ही उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफा देने से मध्य प्रदेश की कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. विधानसभा अध्यक्ष एन प्रजापति अगर 22 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लेते हैं तो कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ जाएगी. मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में दो सीटें फिलहाल रिक्त हैं. ऐसे में 228 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास मामूली बहुमत है. अगर 22 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिये जाते हैं तो विधानसभा में सदस्यों की प्रभावी संख्या महज 206 रह जाएगी. उस स्थिति में बहुमत के लिये जादुई आंकड़ा सिर्फ 104 का रह जाएगा. ऐसे में, कांग्रेस के पास सिर्फ 92 विधायक रह जाएंगे, जबकि भाजपा के 107 विधायक हैं. कांग्रेस को चार निर्दलीयों, बसपा के दो और सपा के एक विधायक का समर्थन हासिल है. उनके समर्थन के बावजूद कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से दूर हो जाएगी.
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि निर्दलीय और बसपा तथा सपा के विधायक कांग्रेस का समर्थन जारी रखेंगे या वे भी भाजपा से हाथ मिला लेंगे. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के एक शिष्टमंडल ने विधानसभा अध्यक्ष से भोपाल में मुलाकात की और कांग्रेस के 19 विधायकों का इस्तीफा सौंपा. इन विधायकों को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया है जहां भाजपा का शासन है. कांग्रेस के तीन अन्य विधायकों ने भी विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. इन विधायकों में छह मंत्री हैं. विधायकों के इस्तीफे के बाद कमलनाथ ने राज्यपाल को पत्र लिख कर उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाने की मांग की.
होली मनाने लखनऊ पहुंचे प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने कहा कि वह मध्यप्रदेश में बदलती राजनीतिक स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और इस बारे में कोई भी निर्णय भोपाल पहुंचने के बाद ही किया जाएगा . टंडन ने एक टीवी चैनल को बताया कि वह 12 मार्च तक छुट्टी पर हैं . यह पूछे जाने पर कि वह किसी पार्टी को सदन में बहुमत साबित करने के लिए बुलायेंगे, टंडन ने कहा, ‘‘मौजूदा समय में, मैं केवल एक दर्शक हूं . एक बार मैं वहां वापस लौट जाऊं उसके बाद चीजों को और उन पत्रों को जिसमें कुछ लोगों ने शिकायत की है, देखने के बाद ही इस बारे में कोई टिप्पणी करूंगा .'
सिंधिया ने कांग्रेस अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा है कि आज के घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पिछले एक साल से तैयार हो रही थी और अब उनके लिये नयी शुरुआत करना सर्वश्रेष्ठ है. सिंधिया ने अपने इस्तीफा पत्र में कहा, ‘पिछले 18 साल से कांग्रेस का प्राथमिक सदस्य रहा. अब मेरे लिये आगे बढ़ने का समय है. मैं कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूं और जैसा कि आप अच्छी तरह जानती है कि यह रास्ता पिछले एक साल से अपने आप तैयार हो रहा था.'
पार्टी का कभी उदीयमान सितारा समझे जा रहे सिंधिया और मुख्यमंत्री कमलनाथ के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही थी. दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया. हालांकि, समस्या हाल में शुरू हुई, जब सरकार में सिंधिया समर्थकों को दरकिनार किया गया और ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की उनकी महत्वाकांक्षा भी विफल कर दी गई. यह भी बताया जाता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उनकी शिकायतें सुनने को तैयार नहीं था.
इस सप्ताह के अंत में, सिंधिया और कमलनाथ मंत्रिमंडल के छह मंत्री बेंगलुरु गए और उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था. इसके बाद यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी में बगावत पनप रही है और कमलनाथ सिंधिया के वफादार छह मंत्रियों के साथ-साथ अन्य विधायकों का भी समर्थन खो देंगे.
होली के दिन चल रहे सियासी ड्रामे का असर मध्य प्रदेश के बाहर भी होगा. मध्य प्रदेश भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. मध्य प्रदेश हिंदी पट्टी के उन तीन प्रमुख राज्यों में से एक था, जहां कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया था. मध्यप्रदेश के आसन्न नुकसान के साथ, यह स्पष्ट है कि कांग्रेस नेतृत्व पार्टी को एकजुट रखने में विफल रहा है और अपने कई क्षेत्रीय नेताओं की परस्पर विरोधी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ रहा है.
निरंतर अंतर्कलह से पार्टी के और कमजोर होने की संभावना है. मध्यप्रदेश को फिर से हासिल करने से हिंदी पट्टी में भाजपा की ताकत बढ़ेगी और कांग्रेस के पास केवल पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ रह जाएगा. राजस्थान में भी पार्टी को विभिन्न खेमों के बीच टकराव का सामना करना पड़ रहा है.







