
फाइल फोटो
नई दिल्ली:
वामपंथी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ इतिहासकार रोमिला थापर सहित पांच लोगों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करवाई है. रोमिला थापर सहित पांच लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर प्रोफेसर सुधा भारद्वाज, वामपंथी विचारक वरवर राव, वकील अरुण फरेरा, मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और वेरनन गोंजाल्विस की गिरफ्तारियों को चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पांचों एक्टीविस्ट को नजरबंद किया गया है. आपको बता दें कि महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को ऐलगार परिषद के बाद कोरेगांव-भीमा गांव में हुयी हिंसा के सिलसिले में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर इन सभी को 28 अगस्त को गिरफ्तार किया था. सुप्रीम कोर्ट ने 29 अगस्त को इन कार्यकर्ताओं को छह सितंबर तक अपने घरों में ही नजरबंद करने का आदेश देते हुये कहा था, ‘‘लोकतंत्र में असहमति सेफ्टी वाल्व है.’’ इसके बाद इस नजरबंदी की अवधि आज तक के लिये बढ़ा दी गयी थी.
वामपंथी विचारकों की गिरफ्तारी पर महाराष्ट्र पुलिस का दावा- बरामद चिट्ठियों में ग्रेनेड लॉन्चर से लेकर, 'राजीव गांधी जैसी घटना' की बात
केंद्र सरकार की ओर से दलील
महाराष्ट्र सरकार की दलील
याचिकाकर्ता की दलील
अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुलिस की आपत्ति इस कविता पर है
'जब ज़ुल्म हो तो बगावत होनी चाहिए शहर में
अगर बगावत न हो तो सुबह होने से पहले ये शहर खाक होना चाहिए.
जानें, क्यों विवादास्पद है UAPA कानून, जिसके तहत गिरफ्तार हुए वाम विचारक
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से क्या कहा
वामपंथी विचारकों की गिरफ्तारी पर महाराष्ट्र पुलिस का दावा- बरामद चिट्ठियों में ग्रेनेड लॉन्चर से लेकर, 'राजीव गांधी जैसी घटना' की बात
केंद्र सरकार की ओर से दलील
- केंद्र सरकार ने इस तरह की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट के दखल का विरोध किया है. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने कहा की ओर से दलील गई
- नक्सलवाद की समस्या एक गंभीर मामला है जो देशभर में फैल रहा है.
- इस तरह की याचिकाओं को सुना जाएगा तो ये एक खतरनाक उदाहरण बन जाएगा.
- क्या संबंधित अदालत इस तरह एक मामलों को नहीं देख सकती. हर मामले को सुप्रीम कोर्ट में क्यों आते हैं?
- ये काम निचली अदालत का है और ये कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए.
- क्या ये संदेश नहीं दिया जा रहा है कि निचली अदालत ऐसे आपराधिक मामलों में फैसला करने के काबिल नहीं है.
महाराष्ट्र सरकार की दलील
- महाराष्ट्र सरकार की ओर से ASG तुषार मेहता ने कहा आरोपी सुप्रीम कोर्ट में नहीं हैं.
- पुलिस के पास उनके खिलाफ पर्याप्त मैटेरियल है.
- ये गिरफ्तारी उनकी असहमति की वजह से नहीं हुई है.
- उनके लेपटॉप, हार्ड डिस्क आदि से सबूत मिले हैं.
- सरकार की तरफ से कहा गया कि जो भी दस्तावेज मिले हैं उनकी बकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग हुई है.
- आरोपी संबंधित हाईकोर्ट गए हैं, ये याचिका वापस ली जानी चाहिए.
याचिकाकर्ता की दलील
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी की दलील दी गई है कि इस केस में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी से जांच होगी तभी सच्चाई सामने आ जाएगी.
- दोनों FIR में पांचों का नाम नहीं है
- उन्होंने सम्मेलन में भाग नहीं लिया था
- उसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व जज ने हिस्सा लिया
- वरवर पर 25 मामले दर्ज हुए जिसमें सभी में वो बरी हो गए
- गोंजाल्विस पर 18 मामले हुए जिनमें 17 में वो बरी हुए. एक मामले में सजा हुई जिसमें अपील लंबित है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुलिस की आपत्ति इस कविता पर है
'जब ज़ुल्म हो तो बगावत होनी चाहिए शहर में
अगर बगावत न हो तो सुबह होने से पहले ये शहर खाक होना चाहिए.
जानें, क्यों विवादास्पद है UAPA कानून, जिसके तहत गिरफ्तार हुए वाम विचारक
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से क्या कहा
- हमने इस मामले में लिबर्टी के मूल के कारण सुनवाई की
- निष्पक्ष जांच जैसे मुद्दे बाद में आएंगे.
- पहले आरोपियों को निचली अदालत से राहत मांगने दीजिए.
- तब तक हाउस अरेस्ट रखने का हमारा अंतरिम आदेश जारी रह सकता है. लेकिन सिंघवी ने इसका विरोध किया और कहा कि कोर्ट को उनकी बात सुननी चाहिए.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं