जनरल वीके सिंह
नई दिल्ली:
केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने राज्यसभा में उनके बयान पर शोर मचाने वालों के लिए अपने फेसबुक पेज पर लंबा जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि दलित बच्चों की दुखद हत्या पर कही उनकी बात को छोटे बच्चे भी आसानी से समझ जाते, लेकिन उनके बयान से "विभाजक राजनीति के उपासक और सुपारी पत्रकारिता करने वाले" अचानक जागृत हो गए।
जनरल सिंह ने लिखा कि मेरा हमेशा से विश्वास था कि हमारे देश की ऊपरी प्रतिनिधि सभा में ज्ञान, अनुभव, विवेक का महासमागम होता होगा और देश के प्रतिनिधि भारत के जटिल मुद्दों पर तर्क वितर्क कर के समाधान ढूंढ़ते होंगे। अल्पमानसिकता से दूषित राजनीति से परे, राज्य सभा में राष्ट्रहित के सर्वोपरि होने की अपेक्षा की थी मैंने। परन्तु मेरा यह विश्वास भीषण रूप से तब आहत हुआ जब मैंने राज्य सभा के सदस्यों को राजनीति के चूहे बिल्ली वाले तुच्छ खेल में लिप्त पाया जिसका वर्णन करना भी मेरे लिए पीड़ादायी है। यह मेरे विश्वास के परे था कि वहां राज्य सभा में कुछ सदस्य उन्हीं तत्वों के प्रकार प्रतीत हो रहे थे, जिनसे हमें बचपन से सावधान रहना सिखाया जाता है।
मैंने कुछ दिन पहले एक टिप्पणी में कहा था कि कानून व्यवस्था राज्य सरकार का जिम्मा होती है, और एक उपमा दे कर यह समझाने का प्रयास किया था कि हर दुर्घटना का दोषारोपण केंद्र सरकार पर करना अनुचित है। स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे इस उपमा को सही समझ जाते, परन्तु जिन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य इस सरकार को असली मुद्दों से विमुख कर के काल्पनिक मुद्दों से जुझाना बना लिया है, उनके लिए यह एक सुनहरा अवसर था। सुपारी पत्रकारिता और विभाजक राजनीति के उपासक यकायक जागृत हो उठे। वैसे यह भी प्रतीत हो रहा था कि शहज़ादे वास्तविकता से कट चुके हैं। सरकार ने मेहनत से कम समय में वह सब संभव कर दिखाया जो भारत इतिहास में अभूतपूर्व है। एक लोकप्रिय सरकार अपने प्रदर्शन से जनता में और ज़्यादा प्रिय हो गई थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो इनका नम्बर नहीं आने वाला।
हमारे देश का आम आदमी बेशक "उन किराये के गुण्डों जितना शोर" न मचाता हो, भले ही वह आपके इस नाटक के प्रति सहनशील हो, मगर उसे बुद्धू समझने की भूल मत करिये। वह सब जानता, और सब समझता है। और आप मुझे निशाना बना कर कहते हैं कि मैं देश को धर्म और जाति के नाम पर बांट रहा हूं? "मेरे सिद्धांत वहां गढ़े गए हैं जहां देश के लिए जान दी जाती है। भगवान का शुक्र मनाइये कि भारतीय सेना इन घटिया बातों में न कभी पड़ी है, और न कभी पड़ेगी।" हम सिर्फ देशभक्त हैं, और बस यही रहना चाहते हैं। बाकी और कुछ हमारे जज़्बे का अपमान है। मैं कोई ऐसा नहीं हूं जिसे राजनैतिक पद विरासत में मिल गया है, और न ही कोई ऐसा जिसकी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा है। मैं अभी भी बस एक सैनिक हूं जो देश की सेवा में सब कुछ अर्पण करने का दम रखता है। मुझे बस एक आशा है कि मेरे देशवासी मुझे इस तरह जानते हैं, और साथ ही आपके राजनैतिक नाटक को भी। जय हिंद...!!!
जनरल सिंह ने लिखा कि मेरा हमेशा से विश्वास था कि हमारे देश की ऊपरी प्रतिनिधि सभा में ज्ञान, अनुभव, विवेक का महासमागम होता होगा और देश के प्रतिनिधि भारत के जटिल मुद्दों पर तर्क वितर्क कर के समाधान ढूंढ़ते होंगे। अल्पमानसिकता से दूषित राजनीति से परे, राज्य सभा में राष्ट्रहित के सर्वोपरि होने की अपेक्षा की थी मैंने। परन्तु मेरा यह विश्वास भीषण रूप से तब आहत हुआ जब मैंने राज्य सभा के सदस्यों को राजनीति के चूहे बिल्ली वाले तुच्छ खेल में लिप्त पाया जिसका वर्णन करना भी मेरे लिए पीड़ादायी है। यह मेरे विश्वास के परे था कि वहां राज्य सभा में कुछ सदस्य उन्हीं तत्वों के प्रकार प्रतीत हो रहे थे, जिनसे हमें बचपन से सावधान रहना सिखाया जाता है।
मैंने कुछ दिन पहले एक टिप्पणी में कहा था कि कानून व्यवस्था राज्य सरकार का जिम्मा होती है, और एक उपमा दे कर यह समझाने का प्रयास किया था कि हर दुर्घटना का दोषारोपण केंद्र सरकार पर करना अनुचित है। स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे इस उपमा को सही समझ जाते, परन्तु जिन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य इस सरकार को असली मुद्दों से विमुख कर के काल्पनिक मुद्दों से जुझाना बना लिया है, उनके लिए यह एक सुनहरा अवसर था। सुपारी पत्रकारिता और विभाजक राजनीति के उपासक यकायक जागृत हो उठे। वैसे यह भी प्रतीत हो रहा था कि शहज़ादे वास्तविकता से कट चुके हैं। सरकार ने मेहनत से कम समय में वह सब संभव कर दिखाया जो भारत इतिहास में अभूतपूर्व है। एक लोकप्रिय सरकार अपने प्रदर्शन से जनता में और ज़्यादा प्रिय हो गई थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो इनका नम्बर नहीं आने वाला।
हमारे देश का आम आदमी बेशक "उन किराये के गुण्डों जितना शोर" न मचाता हो, भले ही वह आपके इस नाटक के प्रति सहनशील हो, मगर उसे बुद्धू समझने की भूल मत करिये। वह सब जानता, और सब समझता है। और आप मुझे निशाना बना कर कहते हैं कि मैं देश को धर्म और जाति के नाम पर बांट रहा हूं? "मेरे सिद्धांत वहां गढ़े गए हैं जहां देश के लिए जान दी जाती है। भगवान का शुक्र मनाइये कि भारतीय सेना इन घटिया बातों में न कभी पड़ी है, और न कभी पड़ेगी।" हम सिर्फ देशभक्त हैं, और बस यही रहना चाहते हैं। बाकी और कुछ हमारे जज़्बे का अपमान है। मैं कोई ऐसा नहीं हूं जिसे राजनैतिक पद विरासत में मिल गया है, और न ही कोई ऐसा जिसकी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा है। मैं अभी भी बस एक सैनिक हूं जो देश की सेवा में सब कुछ अर्पण करने का दम रखता है। मुझे बस एक आशा है कि मेरे देशवासी मुझे इस तरह जानते हैं, और साथ ही आपके राजनैतिक नाटक को भी। जय हिंद...!!!
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