कांकेर से सुकमा तक बस्तर में उबाल, अपनी जमीन पर सुरक्षाबल का कैंप लगाने से हजारों ग्रामीण खफा, विरोध पर उतरे

बस्तर फिर उबल रहा है, सुकमा ज़िले के सिलगेर गांव में लगभग महीनेभर से हज़ारों ग्रामीण आंदोलनरत हैं. ये ग्रामीण, जानकारी दिए बिना उनकी ज़मीन पर सुरक्षाबल के कैंप लगाए जाने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं.

कांकेर से सुकमा तक बस्तर में उबाल, अपनी जमीन पर सुरक्षाबल का कैंप लगाने से हजारों ग्रामीण खफा, विरोध पर उतरे

Chhatisgarh:बिना जानकारी कैंप लगने पर सुकमा जिले में ग्रामीण आंदोलनरत (प्रतीकात्‍मक फोटो)

खास बातें

  • ग्रामीणों का आरोप, फायरिंग में हमारे तीन की मौत हुई
  • बारिश आंधी के बावजूद आंदोलन पर डटे हैं आदिवासी
  • कहा, हमारे बीच माओवादियों के होने का पुलिस का आरोप गलत

छत्तीसगढ़ का नक्सल प्रभावित इलाका बस्तर (Chhattisgarh Naxal areas) फिर उबल रहा है, सुकमा ज़िले के सिलगेर गांव में लगभग महीनेभर से हज़ारों ग्रामीण आंदोलनरत हैं. ये ग्रामीण, जानकारी दिए बिना उनकी ज़मीन पर सुरक्षाबल के कैंप (CRPF Camp) लगाए जाने के छत्‍तीसगढ़ सरकार के निर्णय का विरोध कर रहे हैं. नौबत यहां तक आई कि इन ग्रामीणों को पीछे धकेलने के लिए गोलियां चलीं जिसमें कथित तौर पर तीन ग्रामीणों की मौत हुई है. उधर,बस्तर के कांकेर (Bastar region) में भी पुलिस पर नक्सलियों के नाम पर नाबालिग को जबरन सरेंडर कराने के आरोप लगे हैं. सुकमा के सिलगेर गांव में 17 मई को एक कैंप के विरोध में उतरे आदिवासियों पर कथित तौर पर सुरक्षाबलों ने फायरिंग कर दी गई, घटना में तीन ग्रामीणों की जान चली गई और लगभग 18 लोग घायल हुए हैं.

ग्रामीण हूंगा पूनेम कहते हैं, 'पुलिस की गोलीबारी में मेरे भाई की मौत हो गई है, जिनका शव लेने के लिए हम यहां आए हैं. मेरे गांव के कई लोगों को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया है और कलेक्टर ने कहा है कि अगर गांव वाले आंदोलन से अपने-अपने घर चले जाते हैं, तभी उनके घर वालों को छोड़ा जाएगा.' हालांकि 3 हफ्ते हो गए हैं और बारिश-आंधी के बावजूद ये आदिवासी यहीं डटे हैं. दिल्ली की सीमाओं पर जुटे किसानों की तरह इन आदिवासियों के पास टेंट नहीं हैं, 
लेकिन कंटीली बाड़ के पीछे प्लास्टिक की पन्नी थामे ये 'जंगल-जमीन' की लड़ाई लड़ रहे हैं.उनके सामने सुरक्षाबलों का कैंप है, 100 मीटर पर नुकीली बाड़ के पीछेवे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं.

 दूसरी ओर, हजारों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण खड़े हैं, हाथ में थमे बैनर में गोंडी में लिखा है, ‘सिलगेर सीआरपीएफ कैंप तुन वापस ओयना मैदे धरना प्रदर्शन.' इसका मतलब है कि सीआरपीएफ कैंप हटाने के लिए धरना प्रदर्शन. एक ग्रामीण लखमा कहते हैं, 'अभी-अभी जो नया कैंप लगा है, हम इसका विरोध कर रहे हैं तो हमें लाठियों से पीटा जा रहा है, 17 मई को तो हम पर गोली भी चला दी गई, जिसमें हमारे तीन साथी मारे गए. पुलिस कहती है कि हमारे बीच माओवादी हैं, जो पूरी तरह से गलत बात है. इस आंदोलन में सिर्फ और सिर्फ ग्रामीण आदिवासी ही शामिल हैं.' एक अन्‍य ग्रामीण आयतु का कहना है, 'ग्रामीणों को सड़क चाहिए लेकिन कैंप नहीं चाहिए. वे भी अपने गांव में विकास चाहते हैं लेकिन जिस तरह से सरकार चाहती है, वैसा नहीं.'

जिस गांव में कैंप का विरोध है, वहां आजादी के 73 साल बाद भी बिजली के तार नहीं पहुंचे हैं. गांव की 1,200 की आबादी हैं जिसमें गोंड, मुरिया प्रमुख हैं. ये वनोपज से जीवन चलाते हैं. जिस सड़क को बनाने के लिए सिलगेर में कैंप स्थापित किया जा रहा है वो जगरगुंडा को बीजापुर के आवापल्ली से जोड़ती है. सलवा जुडूम से पहले सब ठीक था लेकिन फिर सब ठहर सा गया. वैसे भीड़ में कुछ आवाजें जुदा भी हैं. सरसिला 12वीं में हैं, बॉयोलोजी पढ़ती है और विरोध में आई हैं लेकिन असमंजस में है. कोरोना का भी डर है. सरसिला कहती है, 'यहां सुविधा नहीं है.कोरोना फैल जाएगा तो दिक्कत होगी. गांव की ही सरिता मड़काम कहती हैं, 'हम लोगों को अस्पताल चाहिए, नर्स-डॉक्टर चाहिए. स्कूल और हॉस्पिटल चाहिए.

हालांकि अंदोलन को लेकर पुलिस का कुछ और ही कहना है. पुलिस ने कहा भीड़ में जनमिलिशिया सदस्य भी थे, जिन्होंने जवानों से हथियार और वायरलेस सेट छीनने की कोशिश की, 19 जवान इस दौरान घायल हुए. हालांकि प्रशासन की मंशा पर सवाल उठे क्योंकि सोनी सोरी, बेला भाटिया जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को बार बार रोका गया, सिलगेर पहुंचने में उन्हें हफ्तों लग गए. इन लोगों की मांग है कि ऐसे कैंप लगने से पहले बातचीत हो. सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी कहती हैं, 'इस तरह का आंदोलन लंबा चलता है. इससे बेहतर है कि कमेटी बने. उसको बिना बताये यदि कैंप लगाए जाएंगे तो लड़ाई होगी. बेला भाटिया ने भी कहा, 'पहली बार 19 को चेरामंगी में रोका गया. पहली बार शीर्ष अधिकारी ने कहा एसपी के परमिशन से जा सकते हैं, फिर चेरपाल में रोका गया फिर कहा डीएम आ रहे हैं. यह स्थिति थी'


नाराज़गी एक बात से नहीं, अब कांकेर से समझिये बस्तर क्यों उबल रहा है. 11 मई को कांकेर के आलदंड की रहने वाली लक्ष्मी पद्दा को पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने मेढ़की लोकल ऑर्गनाइजेशन स्क्वॉड का इनामी माओवादी बताया. बयान जारी कर दावा किया कि नक्सली अर्जुन ताती और लक्ष्मी पद्दा पति-पत्नी हैं और जंगल से भाग कर पुलिस के सामने सरेंडर किया है. बस्‍तर के आईजी पी सुंदरराज, बस्तर ने कहा, 'माओवादी दंपति लक्ष्मी और अर्जुन सक्रिय रूप से काम कर रहे थे. मेडिकल परीक्षण में दोनों कोविड पॉजिटिव पाये गये. दोनों ने स्वास्थ्य लाभ लेने के लिये संगठन छोड़ दिया जिसका हम स्वागत करते हैं.' उधर, लक्ष्मी पद्दा के परिजनों का कहना है कि वो अभी नाबालिग है, उसकी शादी नहीं हुई है. अपनी बात के प्रमाण में वे बाकायदा आधार कार्ड दिखाते हैं. परिजन कहते हैं, 'वो (लक्ष्‍मी) तेंदूपत्ता तोड़ने गई थी. 
सरपंच, गांववाले सब इसकी तस्दीक कर रहे हैं.

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लक्ष्‍मी के भाई मंगू राम कहते हैं, 'भाई की जानकारी के बगैर वह कैसे शादी करेगी, उस दिन मामाघर भेजे थे.' ग्राम पटेल नवलु राम धुर्वा भी कहते हैं, 'ये गलत है.वो बच्ची है लड़की है, 16 साल की थी नाबालिग है.' कंदाड़ी के सरपंचमैनी कचलाम कहते हैं, 'झूठ कह रहे हैं उसे नक्सलवादी बोलकर. वो गांव की ही है, घर में रहती थी] गोटुल में नाचगाना करती थी.' बहरहाल सिलगेर पर सरकार का बयान नहीं आया है, एक टीम जरूर बन गई है जो ग्रामीणों से मुलाकात करेगी और इस पूरे मामले से जुड़े तथ्य जुटाएगी. बस्तर का एक विरोधाभास है. आप जिसकी बात सुनते हैं वो सही लगता है. सुरक्षाबलों की अपनी दलील है, आदिवासियों की अपनी वहीं माओवादियों के अपने तर्क है. वैसे, सब कहते हैं हिंसा हल नहीं लेकिन बस्तर में बारूद की बू आती रहती है.