रेगुलेटरी नियमों में बड़ा बदलाव के चलते, भारत ने सिरप बेस्ड मेडिसिन्स को उन दवाओं की लिस्ट से हटा दिया है, जिनको पहले बिना किसी शर्तों के बेचा जा सकता था. इसका मतलब है कि अब बिना डॉक्टर के पर्चे के कोई भी कफ सिरप और लिक्विड दवाएं नहीं खरीद सकते. 'ड्रग्स रूल्स 1945 ' में बदलाव करते हुए इस बड़े फैसले को लिया गया है. ये कदम भारत और विदेश में बच्चों की मौत से जुड़े कफ सीरप के मामलों के बाद लिया है. यह कदम भारतीय फ़ार्मास्युटिकल सेक्टर की कड़ी जांच-पड़ताल के बीच उठाया गया है.
यह कदम हाल ही के सालों में भारतीय रेगुलेटर्स द्वारा दवा-सुरक्षा के लिए उठाए गए सबसे मजबूत कदमों में से एक है. हालाँकि कफ सिरप को लंबे समय से आम घरेलू इलाज के तौर पर देखा जाता रहा है, और ये अक्सर छोटे कस्बों और गाँवों में बिना फार्मेसी वाली दुकानों पर भी आसानी से मिल जाया करती थी. लेकिन अब रेगुलेटर्स का कहना है कि लोगों की सेहत की सुरक्षा के लिए इन पर सख्त निगरानी रखना जरूरी है.
इस बदलाव का मकसद खुद से दवा लेने (सेल्फ-मेडिकेशन) की आदत पर रोक लगाना, दवाओं के डिस्ट्रीब्यूशन में जवाबदेही बढ़ाना और भारत के फार्मास्युटिकल उद्योग में भरोसे को फिर से बनाने के लिए उठाया गया है, जो कि दुनियाभर में दवाओं की सप्लाई करता है. 'ड्रग्स रूल्स 1945 ' में बदलाव के बाद इन समस्याओं को रोकने में मदद मिल सकती है.
भारत ने क्यों बदले नियम?
इसकी एक मुख्य वजह थी भारत में बनी कफ सीरप में मिलावट की वजह से हुई घटनाएं. 2022 से, भारत में बनी सिरप दवाओं को अफ्रीका और मध्य एशिया में हुई140 से ज्यादा बच्चों की मौत से जोड़ा गया है. इसकी वजह से इंटरनेशनल लेवल पर भी चिंता बढ़ी और "दुनिया की फ़ार्मेसी" के तौर पर भारत की साख को भी नुकसान पहुँचा है.
2022 में एक घटना गाम्बिया में हुई थी, जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बच्चों के कई सिरप की जांच की जिसमें डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) की खतरनाक मात्रा पाई गई. ये जहरीले इंडस्ट्रियल केमिकल किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसके साथ ही इनकी वजह से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा होने और मौत का कारण भी बन सकते हैं. इससे सबसे ज्यादा खतरा छोटे बच्चों को होता है. इसके बाद WHO ने एक मेडिकल प्रोडक्ट एडवाइजरी भी जारी की.
इसके कुछ ही समय बाद, WHO ने उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत से जुड़ी संक्रमित कफ सिरप के बारे में एक और अलर्ट जारी किया. लैब में हुई जांच में भारत में बनी सिरप में फिर से खतरनाक लेवल पर DEG और EG पाए गए.
भारत में भी हुई घटनाएं
इंटरनेशनल लेवल पर आई इस तरह की घटनाएं खूब चर्चा में रहीं, लेकिन भारत में भी इन दूषित कफ सीरप से जुड़ी मौतों की खबर आने के बाद चिंताएं और बढ़ गईं.
साल 2025 में, मध्य प्रदेश में कई बच्चों की मौत की जांच हुई जिसमें अधिकारियों ने की बताया कि इन बच्चों ने दूषित कफ सिरप पी थी जिसमें जहरीले लेवल का डाइएथिलीन ग्लाइकॉल पाया गया था. इसके बाद WHO ने दूषित ओरल लिक्विड दवाओं को लेकर अलर्ट जारी किया और दुनिया भर के रेगुलेटर्स से सिरप-बेस्ड दवाओं की निगरानी बढ़ाने को कहा.
इस घटना के बाद मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल और मार्केट में आने के बाद की निगरानी (पोस्ट-मार्केट सर्विलांस) में होने वाली कमियों को सामने लाया. एक्सपर्ट की कहना है कि DEG और EG का कंटैमिनेशन (मिलावट) अक्सर तब होता है जब ग्लिसरीन जैसे फार्मास्यूटिकल-ग्रेड सॉल्वेंट्स की ठीक से जांच नहीं की जाती या उनकी जगह खराब क्वालिटी वाले इंग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल किया जाता है. बच्चों के लिए इनकी थोड़ी सी मात्रा भी जानलेवा हो सकती है क्योंकि ये केमिकल किडनी और नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाते हैं.
शेड्यूल K क्या है और ये क्यों जरूरी है?
हालिया हुए बदलाव 'ड्रग्स रूल्स, 1945' के शेड्यूल K से जुड़ा है.
कई दशकों से, घरेलू इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं को उनकी सेल और डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े कुछ नियमों से छूट मिली हुई थी. इस छूट की वजह से सिरप वाली दवाएं (जिनमें खांसी की कई दवाएं भी शामिल थीं) सीमित लाइसेंस वाले वेंडर्स के जरिए बेची जा सकती थीं, खासकर गांवों और दूर-दराज के इलाकों में, जहां पर कोई सही तरीके की फार्मेसी नहीं होती थी.
नए संशोधन के तहत, सिरप को इस छूट वाले दायरे से हटा दिया गया है. जिसके परिणाम स्वरूप, अब सिरप वाली दवाएं लाइसेंस-प्राप्त फार्मेसियों से ही दी जा सकती हैं और आम तौर पर इनके लिए रजिस्टर्ड डॉक्टर के पर्चे की जरूरत होती है. इसके अलावा गोलियां, टैबलेट और लोजेंज अभी भी छूट वाली लिस्ट में शामिल हैं.
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि इस बदलाव से पूरी सप्लाई चेन में जवाबदेही मजबूत होगी और यह कंफर्म होगा कि दवाएं रेगुलेटेड चैनलों के जरिए ही बेची जाएं.
सेल्फ-मेडिकेशन को लेकर चिंता
दवाओं को लेकर किया गया ये बदलाव सिर्फ मिलावट के बारे में नहीं है. डॉक्टर लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि भारत में खांसी की सिरप से खुद इलाज करने का चलन लोगों के बीच बहुत ज्यादा है. कई लोग बिना किसी हेल्थकेयर प्रोफेशनल की सलाह के सिरप खरीदते हैं और अक्सर पुरानी खांसी, एलर्जी, सांस के संक्रमण या ऐसे लक्षणों के लिए बार-बार इनका इस्तेमाल करते हैं, जिनके लिए आगे मेडिकल जांच की जरूरत हो सकती है.
कुछ खांसी की सिरप में एंटीहिस्टामाइन, ब्रोंकोडायलेटर या कोडीन जैसे तत्व हो सकते हैं, जिनसे कई तरह के साइड इफेक्ट हो सकते हैं, दूसरी दवाओं के साथ रिएक्शन हो सकता है या उनका गलत इस्तेमाल हो सकता है. पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि मेडिकल देखरेख की जरूरत होने से इनके गलत इस्तेमाल को कम करने में मदद मिल सकती है और साथ ही यह भी पक्का किया जा सकता है कि असल बीमारी का सही पता चल सके.
दवाओं की क्वालिटी को लेकर भारत की सख्त कार्रवाई
डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत, नियमों को सख्त करने की एक बड़ी कोशिश का सिर्फ एक हिस्सा है. भारत के ड्रग रेगुलेटर के मुताबिक, खांसी की दवा (कफ सिरप) में मिलावट की आशंका के बाद लगभग 90 प्रतिशत मैन्युफैक्चरर्स की जांच की गई है और नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है. अधिकारियों ने दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम को बेहतर बनाने और पूरे फार्मा सेक्टर में क्वालिटी-कंट्रोल के नियमों को और सख्त करने का भी आदेश दिया है.
WHO ने कई देशों में ओरल लिक्विड दवाओं में मिलावट की घटनाएं सामने आने के कारण, राष्ट्रीय रेगुलेटर्स से इनकी निगरानी मजबूत करने की बार-बार अपील की है. संगठन ने चेतावनी दी है कि मिलावटी उत्पाद औपचारिक और अनौपचारिक सप्लाई चेन के जरिए फैल सकते हैं, इसलिए इनकी कड़ी निगरानी करनी जरूरी है.
सिरप वाली दवाओं की बिना प्रिस्क्रिप्शन (डॉक्टर की पर्ची) के बिक्री बंद करने का भारत का फैसला दवाओं के नियमन में एक बड़ा बदलाव है. हालांकि, इस कदम से उन ग्राहकों को परेशानी हो सकती है जो बिना प्रिस्क्रिप्शन के कफ सिरप खरीदने के आदी हैं, लेकिन रेगुलेटर्स का तर्क है कि इसके फायदे नुकसान से कहीं ज्यादा हैं.
यह पॉलिसी उन दुखद घटनाओं से मिले सबक पर बेस्ड है जिनमें भारत और विदेशों में बच्चों की जान चली गई थी. मैन्युफैक्चरिंग में बड़े सुधारों और सख्त जांच के साथ-साथ, इस बदलाव का मकसद दवाओं की सुरक्षा को बेहतर बनाना, सेल्फ-मेडिकेशन की आदत को कम करना और भारतीय दवाओं की क्वालिटी पर भरोसा फिर से कायम करना है.
मरीजों के लिए संदेश: कफ सिरप भले ही नुकसान न पहुँचाने वाले लगें, लेकिन वे भी दवाएँ ही हैं और उनके लिए भी उतनी ही निगरानी और सावधानी की जरूरत है जितनी किसी दूसरी दवा के लिए होती है.
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