Mental Disease: भारत में युवाओं के बीच मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि समय पर इलाज और सही जानकारी की कमी इस संकट को और गंभीर बना रही है. यह बात बुधवार को इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी की 77वीं वार्षिक राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस ANCIPS 2026 में सामने आई, जहां देश के जाने-माने मेंट हेल्थ एक्सपर्ट्स ने इस विषय पर गहन चर्चा की. एक्सपर्ट्स ने बताया कि आज भारत में करीब 60 प्रतिशत मानसिक रोग 35 साल से कम उम्र के लोगों में पाए जा रहे हैं. यह आंकड़ा इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यही उम्र पढ़ाई पूरी करने, करियर बनाने और समाज में सक्रिय भूमिका निभाने की होती है. अगर इसी समय मानसिक समस्याएं शुरू हो जाएं और उनका इलाज न हो, तो इसका असर पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है.
युवाओं पर क्यों बढ़ रहा है मानसिक दबाव?
कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि कोविड-19 महामारी, आर्थिक अस्थिरता और बदलती सामाजिक संरचना ने युवाओं के तनाव को और बढ़ा दिया है. महामारी के बाद पढ़ाई, नौकरी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने चिंता और डिप्रेशन के मामलों में इजाफा किया है.
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ANCIPS दिल्ली के आयोजन सचिव डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि जब 60 प्रतिशत मानसिक रोग 35 साल से कम उम्र में ही सामने आ रहे हैं, तो यह साफ है कि भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट पहले से कहीं जल्दी शुरू हो रहा है.
डिजिटल डिवाइस भी बढ़ा रहे हैं खतरा?
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया पर बढ़ती निर्भरता आने वाले समय में मानसिक रोगों को और बढ़ा सकती है. मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान (IHBAS) के पूर्व निदेशक डॉ. निमेश जी. देसाई ने कहा कि भारत में मानसिक रोगों के बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि लोग समय पर इलाज के बारे में जागरूक नहीं हैं. उनके अनुसार, अगर मानसिक समस्याओं की पहचान शुरुआती दौर में हो जाए, तो लगभग सभी मानसिक रोगों का सफल इलाज संभव है और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है.
समय पर इलाज न हो तो आजीवन समस्या
डॉ. देसाई ने यह भी बताया कि जो मानसिक रोग युवावस्था में शुरू होते हैं, अगर उनका इलाज न किया जाए तो वे जीवनभर चलने वाली समस्या बन सकते हैं. इसका असर सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके परिवार, ऑफिस और देश की प्रोडक्टिविटी पर भी पड़ता है.
इसलिए उन्होंने जोर दिया कि भारत में मेंटल हेल्थ सेवाओं को रिएक्टिव (समस्या होने के बाद इलाज) से हटाकर प्रिवेंटिव और अर्ली-इंटरवेंशन मॉडल की ओर ले जाना होगा.

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आज के युवा किन चुनौतियों से जूझ रहे हैं?
इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि तेजी से बदलता समाज युवाओं के अनुभवों को पूरी तरह बदल चुका है. आज का युवा कड़ी एकेडमिक कंपटीशन, सोशल मीडिया पर लगातार तुलना, जुड़ाव के बावजूद अकेलापन, नौकरी और रिश्तों को लेकर अनिश्चितता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आसान, युवा-अनुकूल और बिना शर्म या डर के उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है.
आगे का रास्ता क्या है?
डॉ. रहेजा के अनुसार, स्कूल और कॉलेज लेवल पर मेंटल हेल्थ फंक्शन, समय पर पहचान मेंटल डिजीज से जुड़ी शर्म और डर को खत्म करना अब विकल्प नहीं, बल्कि देश के भविष्य की सुरक्षा के लिए जरूरी स्टेप बन चुके हैं.
भारत में युवाओं का मेंटल हेल्थ एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला मुद्दा है. अगर समय रहते जागरूकता, इलाज और सहयोग नहीं मिला, तो इसका असर सिर्फ आज नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा. इसलिए समय पर पहचान और इलाज ही सबसे बड़ा समाधान है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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