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रोज अश्वगंधा का सेवन कितना सही? जानिए लिवर, किडनी और इम्यूनिटी पर इसका क्या असर पड़ता है

हर दिन अश्वगंधा का सेवन करते हैं? जानिए सेहत के लिए कितना सुरक्षित है यह आयुर्वेदिक हर्ब.

रोज अश्वगंधा का सेवन कितना सही? जानिए लिवर, किडनी और इम्यूनिटी पर इसका क्या असर पड़ता है
अश्वगंधा के फायदे.
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अश्वगंधा के लंबे समय तक उपयोग करने से लिवर या किडनी को कोई नुकसान नहीं होता है. यह नतीजे एक स्टडी में सामने आएं हैं, जो "फ्रंटियर्स इन मेडिसिन" में प्रकाशित किया गया है. स्टडी के अनुसार, अश्वगंधा रूट एक्सट्रैक्ट का 24 हफ्तों तक प्रतिदिन सेवन करने वाले स्वस्थ वयस्कों में कोई समस्या नहीं हुई है. साथ ही, अश्वगंधा लेने से वैक्सीन से बनी इम्यूनिटी में किसी महत्वपूर्ण कमी का संकेत भी नहीं मिला.

सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य ने कहा कि कंट्रोल परिस्थितियों में 24 हफ्तों तक मानकीकृत अश्वगंधा रूट एक्सट्रैक्ट की सुरक्षा और सहनशीलता को लेकर यह स्टडी महत्वपूर्ण जानकारी देती है.

1200 लोगों पर किया गया ट्रायल-

शोधकर्ताओं ने एक मल्टीसेंटर, रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड, प्लेसीबो-कंट्रोल्ड क्लिनिकल ट्रायल किया, जिसमें भारत के 7 केंद्रों पर 18 से 70 वर्ष की उम्र के ऐसे 1,200 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया, जिन्हें कोविडशील्ड (CovidShield) वैक्सीन की पहली, दूसरी या बूस्टर डोज मिल चुकी थी.

प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को रोजाना 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा रूट एक्सट्रैक्ट दिया गया. यह मात्रा लगभग 4 ग्राम कच्ची अश्वगंधा जड़ के बराबर थी. दूसरे समूह को इसके समान दिखने वाला प्लेसीबो दिया गया. प्रतिभागियों को 24 हफ्तों तक यह दिया गया और इसके बाद भी उनकी निगरानी की गई. कुल 1,200 प्रतिभागियों में से 1,032 यानी करीब 86% लोगों ने स्टडी पूरी की. 

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लिवर और किडनी पर क्या असर पड़ा?

स्टडी में प्रतिभागियों के लिवर और किडनी की कार्यप्रणाली की नियमित जांच की गई. इसमें मुख्य रूप से लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया जैसे पैरामीटर को मापा गया. शोध के मुताबिक, इन जांचों में मानक संदर्भ सीमा के भीतर परिणाम रहे और अश्वगंधा के कारण लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचने का कोई सबूत नहीं मिला. अध्ययन में ऐसा कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पाया गया जिसे स्टडी में इस्तेमाल किए गए अश्वगंधा एक्सट्रैक्ट से जोड़ा जा सके. किसी प्रतिभागी ने प्रतिकूल प्रभाव की वजह से अध्ययन बीच में नहीं छोड़ा.

वैक्सीन की इम्यूनिटी अश्वगंधा से प्रभावित नहीं हुई-

शोधकर्ताओं के अनुसार, अश्वगंधा और प्लेसीबो दोनों समूहों में वायरस-न्यूट्रलाइजिंग एक्टिविटी 85% से अधिक रही. दोनों समूहों के बीच कोई सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया. यानी स्टडी में अश्वगंधा लेने से वैक्सीन से बनी इम्यूनिटी में किसी महत्वपूर्ण कमी का संकेत नहीं मिला.

अध्ययन के प्रमुख लेखक और सेंटर फॉर रूमैटिक डिज़ीज़ेज़, पुणे के निदेशक एवं चीफ रूमेटोलॉजिस्ट डॉ. अरविंद चोपड़ा के मुताबिक, पूरे अध्ययन के दौरान लिवर और किडनी की कार्यप्रणाली से जुड़े पैरामीटर सामान्य फिजियोलॉजिकल सीमा में रहे और उपचार से संबंधित लिवर या किडनी की चोट नहीं देखी गई. उन्होंने यह भी कहा कि अश्वगंधा ने वैक्सीन से बनने वाली इम्यूनिटी में हस्तक्षेप नहीं किया और दोनों समूहों में न्यूट्रलाइजिंग एक्टिविटी का लेवल हाई रहा.

45 शोधकर्ताओं ने मिलकर किया अध्ययन-

स्टडी को सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज (CCRAS), ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद, जयपुर, आयुष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट और सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी सहित कुल 9 संस्थानों के 45 शोधकर्ताओं की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने किया. इसमें आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी और कॉम्प्लिमेंट्री एवं इंटीग्रेटिव हेल्थ जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे.

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि हाई क्वालिटी वाली क्लिनिकल रिसर्च आयुर्वेद के वैज्ञानिक प्रमाणों को मजबूत करती है और आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इसके संभावित उपयोग को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है.

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