देश के स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी एक ऐसी खबर आई है जो सीधे तौर पर अस्पतालों और क्लिनिकों को बड़ी राहत देती है, लेकिन इसका असर आम मरीजों पर भी पड़ेगा. केंद्र सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 में एक बड़ा संशोधन किया है. जन विश्वास अधिनियम, 2026 के तहत किए गए इस सुधार का आसान मतलब ये है कि अब अस्पतालों, डॉक्टरों या छोटे क्लिनिकों से होने वाली छोटी और कागजी (प्रक्रियात्मक) गलतियों पर जेल की सजा नहीं होगी. सरकार ने ऐसी चूकों के लिए अब सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर जुर्माना यानी पेनल्टी लगाने का फैसला किया है. इस कदम का उद्देश्य स्वास्थ्य क्षेत्र में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' यानी काम करने की सहूलियत को बढ़ाना और अदालती चक्करों को कम करना है. हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि इससे मरीजों के इलाज और उनकी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा.
पांच प्रमुख धाराओं में हुआ महत्वपूर्ण बदलाव
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस कानून को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए इसकी पांच प्रमुख धाराओं—40, 41, 43, 44 और 46 में बड़े बदलाव किए हैं. नए संशोधनों के तहत एक्ट की धारा 40,43 और 46 में से "जुर्माना" (Fine) शब्द को हटाकर उसकी जगह "प्रशासनिक दंड" (Administrative Penalty) शब्द को शामिल किया गया है.
गलतियों की गंभीरता के आधार पर तय होगी पेनल्टी
अस्पतालों और क्लिनिकों को बड़ी राहत देते हुए कानून की धारा 44 में भी बड़ा संशोधन किया गया है. इसके अंतर्गत अब नियमों के उल्लंघन पर सीधे एक जैसी कार्रवाई करने के बजाय, उल्लंघन की गंभीरता को परखा जाएगा. नए नियमों के तहत अब नियमों के उल्लंघन के स्तर और उसकी गंभीरता के अनुसार अलग-अलग पेनल्टी तय की जाएगी. इस व्यवस्था से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अब छोटी और बड़ी गलतियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा, जिससे किसी भी संस्थान पर उसकी छोटी मानवीय या प्रक्रियात्मक चूक के लिए कोई अनुचित या अत्यधिक भारी कार्रवाई नहीं थोपी जा सकेगी.
निर्णय प्राधिकारी की शक्तियों में विस्तार और पारदर्शिता
इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, तेज और जवाबदेह बनाने के लिए सरकार ने धारा 41 के तहत काम करने वाले निर्णय प्राधिकारी (Adjudicating Authority) की शक्तियों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. अब यह प्राधिकारी धारा 40,43 और 44 से जुड़े सभी मामलों की सीधे सुनवाई कर सकेगा.
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मुकदमेबाजी से मुक्ति और मरीजों की सुरक्षा का संतुलन
सरकार का मानना है कि इस ऐतिहासिक संशोधन से स्वास्थ्य क्षेत्र में अनावश्यक मुकदमेबाजी और अदालती चक्करों में भारी कमी आएगी. जब डर के बजाय प्रशासनिक सहूलियत होगी, तो चिकित्सा संस्थान स्वैच्छिक रूप से नियमों का पालन करने के लिए आगे आएंगे. हालांकि, इस पूरे नीतिगत बदलाव के बीच मरीजों के हितों की अनदेखी नहीं की गई है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से आश्वस्त किया है कि यह ढील सिर्फ कागजी और प्रक्रियात्मक नियमों के लिए है. मरीजों के इलाज, उनकी सुरक्षा, देखभाल के मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं की ओवरऑल क्वालिटी से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा और चिकित्सा मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित रहेगा.
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