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बच्‍चों में ब्लड कैंसर व बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर सबसे ज्‍यादा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब सीध एक्‍सपर्ट से

क्या ब्लड कैंसर लौट आने के बाद भी बच्चे का इलाज संभव है? एक्सपर्ट के मुताबिक, बोन मैरो ट्रांसप्लांट कई मामलों में नई उम्मीद बन सकता है. जानिए ट्रांसप्लांट, डोनर मैचिंग, थैलेसीमिया और रिकवरी से जुड़ी जरूरी बातें.

बच्‍चों में ब्लड कैंसर व बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर सबसे ज्‍यादा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब सीध एक्‍सपर्ट से

बच्चों में ब्लड कैंसर या थैलेसीमिया का इलाज लंबा और चुनौतीपूर्ण हो सकता है. ऐसे मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) कई मरीजों के लिए जीवनरक्षक इलाज साबित होता है. खासकर जब कैंसर दोबारा लौट आए या थैलेसीमिया से स्थायी राहत की जरूरत हो. लेकिन पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी में आई नई तकनीकों ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है. आज बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) न सिर्फ दोबारा लौटे कैंसर में इलाज का अहम विकल्प बन गया है, बल्कि थैलेसीमिया से जूझ रहे बच्चों को भी हमेशा के लिए नई जिंदगी दे रहा है.

ब्लड कैंसर दोबारा होने पर बोन मैरो ट्रांसप्लांट कब किया जाता है?

अगर किसी बच्चे को ब्लड कैंसर दोबारा हो गया है, तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट उसकी जान बचाने का सबसे पक्का और असरदार जरिया है. हालांकि यह कदम उठाने से पहले कैंसर की किस्म और पहले चले इलाज के नतीजों को बहुत बारीकी से परखा जाता है. डॉ. विकास दुआ कहते हैं कि‍ ट्रांसप्लांट से ठीक पहले दवाओं और थेरेपी के जरिए कैंसर को 'रेमिशन' में लाना सबसे जरूरी होता है. इसका मतलब यह है कि ट्रांसप्लांट के वक्त शरीर में कैंसर की सक्रियता लगभग खत्म होनी चाहिए. सही वक्त पर सही मरीज का चुनाव ही इस पूरे प्रोसीजर की कामयाबी तय करता है.

100 फीसदी मैच नहीं, तब भी डोनर बन सकते हैं माता-पिता?

डॉ. विकास दुआ के मुताब‍िक, कई बार माता-पिता इस बात से मायूस हो जाते हैं कि परिवार में कोई ऐसा डोनर नहीं मिल रहा जिसका टिश्यू (HLA) बच्चे से पूरा मैच करे. अब इस बात से डरने की जरूरत नहीं है. मेडिकल साइंस की तरक्की के चलते माता-पिता आधा मैच होने पर भी अपने बच्चे को बोन मैरो या ब्लड स्टेम सेल्स दे सकते हैं.  इसे 'हैप्लोआइडेंटिकल ट्रांसप्लांट' कहा जाता है, जिसमें 50 फीसदी मैचिंग पर भी पूरी सफलता के साथ ट्रांसप्लांट किया जाता है. आधुनिक दवाएं और एडवांस इम्यूनोथेरेपी अब आधे मैच वाले ट्रांसप्लांट को भी पूरी तरह सुरक्षित बना चुकी हैं.

छोटे भाई-बहन को डोनर चुनते वक्त बरतें समझदारी

भाई-बहन का टिश्यू मैच सबसे मुफीद माना जाता है, लेकिन अगर संभावित डोनर खुद एक छोटा बच्चा है, तो उसकी सेहत और हिफाजत डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता होती है.
केवल माता-पिता की हां काफी नहीं होती, बल्कि उस छोटे बच्चे को भी उसकी उम्र के हिसाब से प्यार से समझाना जरूरी है.

किसी भी बच्चे पर डोनर बनने का कोई मानसिक या भावनात्मक दबाव नहीं होना चाहिए. डॉक्टर जब पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं कि डोनर बनने से उस बच्चे की सेहत पर कोई आंच नहीं आएगी, तभी फैसला लिया जाता है.

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थैलेसीमिया में बोन मैरो ट्रांसप्लांट कब कराना चाहिए?

डॉ. विकास दुआ कहते हैं कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को हर कुछ हफ्तों में खून चढ़वाना पड़ता है. बार-बार खून चढ़ाने से शरीर के अंदरूनी अंगों में जरूरत से ज्यादा आयरन जमा होने लगता है. ऐसे बच्चों को जिंदगी भर के इस दर्द से स्थायी मुक्ति सिर्फ बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही दिला सकता है. सबसे बेहतर नतीजे तब मिलते हैं जब ट्रांसप्लांट कम उम्र में ही करा लिया जाए, क्योंकि तब तक आयरन ने दिल और लिवर जैसे नाजुक अंगों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया होता.

ट्रांसप्लांट के बाद कैसे होती है कैंसर के खात्मे की पुष्टि?

अस्पताल से छुट्टी मिलने या ब्लड रिपोर्ट नॉर्मल आने का मतलब यह नहीं होता कि खतरा पूरी तरह टल गया है. बीमारी के खात्मे पर नजर रखने के लिए डॉक्टर समय-समय पर एमआरडी (MRD) टेस्ट और चाइमेरिज्म जांच करते हैं. एमआरडी टेस्ट शरीर में छिपे कैंसर के बहुत सूक्ष्म अंश भी पकड़ लेता है, जबकि चाइमेरिज्म टेस्ट यह बताता है कि नया खून बनाने में डोनर की सेल्स कितनी सक्रिय हैं.

इन नियमित जांचों की मदद से अगर बीमारी दोबारा लौटने की जरा भी कोशिश करे, तो डॉक्टर उसे फौरन भांपकर रोक सकते हैं. 

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दस्त, चकत्ते या पीलिया: इन लक्षणों पर तुरंत दें ध्यान

ट्रांसप्लांट के बाद अगर बच्चे को लगातार पतले दस्त लगें, पेट में मरोड़ हो, त्वचा पर लाल दाने निकल आएं या आंखें पीली पड़ें, तो इसे कतई मामूली न समझें. यह 'ग्राफ्ट वर्सेस होस्ट डिजीज' (GVHD) का इशारा हो सकता है. इसमें डोनर की नई कोशिकाएं मरीज के शरीर को बाहरी समझकर उस पर रियेक्ट करने लगती हैं.

कई बार इन्फेक्शन या दवाओं का साइड इफेक्ट भी ऐसी ही दिक्कतें पैदा करता है. इसलिए घर पर खुद से कोई दवाई देने के बजाय तुरंत अपनी ट्रांसप्लांट टीम को बताएं. समय रहते पहचान होने पर इन दिक्कतों को आसानी से काबू में कर लिया जाता है.

बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद बच्चा स्कूल कब जा सकता है?

हर बच्चे की रिकवरी की रफ्तार अलग होती है और यह पूरी तरह उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) पर निर्भर करता है. शुरुआती कुछ महीनों में इन्फेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा रहता है, इसलिए बच्चे को भीड़भाड़ और धूल-मिट्टी से दूर रखना होता है.

जैसे-जैसे इम्युनिटी मजबूत होती है, बच्चा पहले घर पर पढ़ाई और फिर धीरे-धीरे कुछ घंटों के लिए स्कूल जाना शुरू कर सकता है. खेलकूद और आउटडोर एक्टिविटी भी डॉक्टर की सलाह के बाद ही धीरे-धीरे शुरू करानी चाहिए. बच्चे को सुरक्षित माहौल देते हुए उसे वापस दोस्तों के बीच लौटाना उसकी मानसिक मजबूती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है.

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एक्‍सपर्ट के बारे में : डॉ. विकास दुआ, प्रिंसिपल डायरेक्टर एंड हेड (पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी एंड बीएमटी), फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम.

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