मुंह या जबड़े का कैंसर जब ज्यादा बढ़ जाता है, तो मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टर को ट्यूमर के साथ-साथ जबड़े की हड्डी का कुछ हिस्सा भी काटकर अलग करना पड़ता है. कैंसर को खत्म करने के लिए यह कदम उठाना मजबूरी होती है, लेकिन इसके चलते चेहरे का नक्शा बिगड़ जाता है और वहां एक खाली जगह बन जाती है. पहले के दौर में लोग इसे अपनी किस्मत मानकर बैठ जाते थे, मगर आज की नई सर्जिकल तकनीकों से चेहरे की उस खाली जगह को दोबारा भरकर चेहरा पहले जैसा ठीक किया जा सकता है. इससे मरीज फिर से सामान्य जिंदगी जीने लगता है.
आखिर जबड़ा दोबारा बनाने की नौबत क्यों आती है?
इस बारे में पूरी जानकारी के लिए एनडीटीवी ने बात की मुंबई के बईइएसएसओ कैंसर अस्पताल में हेड एंड नेक कैंसर सर्जन डॉ. अमित चक्रवर्ती से. उन्होंने बताया कि जब ट्यूमर जबड़े की हड्डी तक अपनी जड़ें जमा लेता है, तो उसे जड़ से मिटाने के लिए हड्डी का खराब हिस्सा निकालना ही पड़ता है. जबड़ा हटने से मरीज के लिए न सिर्फ खाना चबाना और निगलना दूभर हो जाता है, बल्कि बोलने में भी दिक्कत आती है और चेहरा एक तरफ से टेढ़ा दिखने लगता है.
यह सर्जरी सिर्फ चेहरे की खूबसूरती लौटाने के लिए नहीं होती. जबड़े के बिना इंसान का रोजमर्रा का जीना मुहाल हो जाता है. इसलिए डॉक्टरों की पहली कोशिश यह होती है कि मरीज की जान बचने के बाद वह आराम से खा-पी सके, साफ बोल सके और बिना किसी झिझक के लोगों के सामने जा सके.
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कटी हुई हड्डी की जगह नया जबड़ा कैसे बनता है?
इस कमी को पूरा करने के लिए सबसे ज्यादा 'फ्री फ्लैप' तकनीक का सहारा लिया जाता है. आसान शब्दों में कहें तो डॉक्टर मरीज के ही पैर (निचली टांग) से एक छोटी हड्डी का टुकड़ा, खून की बारीक नसें और जरूरत पड़ने पर थोड़ा सा मांस या चमड़ी ले लेते हैं.
डॉ. अमित चक्रवर्ती बताते हैं कि पैर से ली गई इस हड्डी को बिल्कुल जबड़े के नाप के हिसाब से तराशा जाता है. फिर माइक्रोस्कोप की मदद से पैर से लाई गई नसों को गर्दन की खून की नसों से जोड़ दिया जाता है. ऐसा करने से उस नई हड्डी में खून का दौरा चालू हो जाता है और वह चेहरे में बिल्कुल असली जबड़े की तरह अपनी जगह बना लेती है. पैर से छोटी हड्डी निकालने से मरीज के चलने-फिरने पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता.
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क्या मरीज पहले की तरह बोल और खा पाता है?
मरीज कितनी जल्दी ठीक होगा, यह इस बात पर टिका होता है कि कैंसर कितना फैला हुआ था और शरीर का कितना हिस्सा काटना पड़ा. कई बार सर्जरी के बाद सिकाई (रेडिएशन) की भी जरूरत पड़ती है. पूरी तरह संभलने के लिए मरीज को नकली दांत लगवाने पड़ते हैं, साथ ही बोलने और खाना निगलने की कसरत (थेरेपी) भी कराई जाती है.
डॉ. अमित चक्रवर्ती ने बताया कि जब कैंसर का ऑपरेशन प्लान करते हैं, उसी वक्त नया जबड़ा बनाने की तैयारी भी कर लेते हैं. ऐसा नहीं होता कि पहले कैंसर का ऑपरेशन कर दिया और बाद में जबड़े की सोची. दोनों काम एक साथ तय होते हैं ताकि मरीज भविष्य में ठीक से चबा सके और खुलकर बात कर सके.
आज मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि जबड़े के कैंसर का मतलब लाचारी नहीं रह गया है. डॉक्टरों का पहला मकसद तो कैंसर को जड़ से खत्म करना ही होता है, लेकिन साथ ही वे यह भी पक्का करते हैं कि मरीज सिर्फ जिंदा न बचे, बल्कि उसका खोया हुआ चेहरा और आत्मविश्वास भी पूरी तरह लौट आए.
एक्सपर्ट के बारे में : डॉ. अमित चक्रवर्ती मुंबई के एसएसओ कैंसर अस्पताल में हेड एंड नेक कैंसर सर्जन हैं. वह सिर और गर्दन के कैंसर के सर्जिकल इलाज से जुड़े मामलों में विशेषज्ञता रखते हैं.
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