Childhood Cancer Cases: बचपन को मासूमियत, खेल और सपनों से जोड़ा जाता है. लेकिन, आज एक ऐसी गंभीर बीमारी है जो हजारों परिवारों की खुशियों पर भारी पड़ रही है कैंसर. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, दुनिया भर में हर साल 2 लाख से ज्यादा बच्चे कैंसर से प्रभावित होते हैं. अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या 21 मिलियन डायग्नोसिस तक पहुंच सकती है. भारत में भी यह स्थिति चिंताजनक है. नेशनल कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के मुताबिक, 0-14 साल में बचपन के कैंसर कुल कैंसर मामलों का लगभग 4% हिस्सा हैं. यह प्रतिशत छोटा लग सकता है, लेकिन जब इसे देश की विशाल आबादी के संदर्भ में देखें, तो यह हजारों बच्चों की जिंदगी से जुड़ा सवाल बन जाता है.
क्यों बढ़ रहे हैं बच्चों में कैंसर के मामले?
भारत में बचपन के कैंसर के बढ़ते मामले एक ग्लोबल ट्रेंड को दर्शाते हैं. हालांकि इसके सटीक कारणों को पूरी तरह समझना अभी बाकी है, लेकिन कुछ संभावित फैक्टर्स सामने आए हैं:
- पर्यावरणीय कारण: प्रदूषण, कीटनाशक और रासायनिक संपर्क.
- जेनेटिक फैक्टर्स: परिवार में कैंसर का इतिहास.
- लाइफस्टाइल और पोषण: गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य और शुरुआती पोषण.
- संक्रमण और कमजोर इम्यून सिस्टम.
इन कारणों पर भारत में बड़े लेवल पर रिसर्च अभी सीमित है, जिससे सटीक रोकथाम रणनीति बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

सबसे बड़ी चुनौती देर से पहचान और इलाज:
भारत में बच्चों के कैंसर की सबसे बड़ी समस्या है देर से डायग्नोसिस. ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टर और आधुनिक जांच सुविधाएं कम हैं.
- ग्रामीण हेल्थकेयर तक सीमित पहुंच.
- आर्थिक तंगी के कारण इलाज में देरी.
- कैंसर के शुरुआती लक्षणों के बारे में जागरूकता की कमी.
कई परिवार आर्थिक और सामाजिक कारणों से इलाज अधूरा छोड़ देते हैं. इससे बच्चों की रिकवरी की संभावना कम हो जाती है.
क्या है नीति और सिस्टम की स्थिति?
हालांकि भारत सरकार ने कैंसर कंट्रोल के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन बचपन के कैंसर के लिए अलग से कोई स्पष्ट और समर्पित राष्ट्रीय नीति नहीं है.
- इससे डेटा संग्रह में कमी रहती है.
- विशेष बाल ऑन्कोलॉजी केंद्रों की संख्या सीमित है.
- प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की कमी बनी रहती है.
आगे क्या करना जरूरी है?
इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए मल्टी लेवल स्ट्रेटजी की जरूरत है:
- जन-जागरूकता अभियान: स्कूलों और समुदाय स्तर पर कैंसर के शुरुआती लक्षणों की जानकारी.
- बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर: ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ सुविधाएं.
- रिसर्च में निवेश: जेनेटिक और पर्यावरणीय कारणों पर अध्ययन.
- कम्युनिटी-बेस्ड स्क्रीनिंग: शुरुआती पहचान के लिए नियमित जांच.
- सरकार और NGO सहयोग: आर्थिक सहायता और सपोर्ट सिस्टम.
बचपन का कैंसर केवल एक मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है. यह समय है कि हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, पॉलिसीमेकर्स, रिसर्चर्स और आम जनता मिलकर काम करें.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं