कल्पना कीजिए कि आप टाइप-2 डायबिटीज के खतरे में हैं या नहीं, ये जानने के लिए लैब, खून जांच कराने या सुई चुभवाने की जरूरत ही न पड़े. आप बस 20 सेकंड तक बोलिए और एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम आपकी आवाज का एनालायसिस करके बता दे कि आपको डायबिटीज का रिस्क है या नहीं. सुनने में ये थोड़ा आपको किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इसे हकीकत के करीब ला दिया है.
कैसे काम करता है ये AI टूल?
ऑस्ट्रेलिया की RMIT यूनिवर्सिटी और टेक्नोलॉजी कंपनी थायमिया के रिसर्चर्स ने एक ऐसा AI मॉडल विकसित किया है, जो सिर्फ 20 सेकंड की वॉयस रिकॉर्डिंग के आधार पर टाइप-2 डायबिटीज के रिस्क का आकलन कर सकता है. रिसर्चर्स का कहना है कि डायबिटीज शरीर की नसों, मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती है, जिससे आवाज में बेहद सूक्ष्म बदलाव आ सकते हैं. ये बदलाव इंसानी कानों के लिए पकड़ पाना मुश्किल होता है, लेकिन AI एल्गोरिद्म इन्हें पहचान सकता है.
AI मॉडल आवाज की पिच, बोलने की गति, सांसों के उतार-चढ़ाव और आवाज की गुणवत्ता जैसे संकेतों का विश्लेषण करता है. इन पैटर्न्स के आधार पर यह व्यक्ति में टाइप-2 डायबिटीज के संभावित खतरे का स्कोर तैयार करता है.
हजारों लोगों की आवाज पर हुई ट्रेनिंग
इस तकनीक को तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने अमेरिका और ब्रिटेन के 21,000 से अधिक लोगों की 63,000 से ज्यादा वॉइस रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किया. इसके बाद इस मॉडल का परीक्षण हजारों प्रतिभागियों पर किया गया. कुछ मामलों में प्रतिभागियों से लिखी हुई कहानी पढ़वाई गई, जबकि कुछ ने सामान्य बातचीत की रिकॉर्डिंग दी.
रिसर्च के दौरान AI ने उन लोगों को अधिक जोखिम वाला स्कोर दिया, जिन्होंने खुद बताया था कि उन्हें टाइप-2 डायबिटीज है. बाद में कुछ प्रतिभागियों के ब्लड टेस्ट परिणामों से तुलना करने पर भी मॉडल ने अच्छे नतीजे दिखाए.
क्या ये ब्लड टेस्ट की जगह ले लेगा?
हेल्थ एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि फिलहाल ये तकनीक ब्लड टेस्ट का विकल्प नहीं है. इसे एक स्क्रीनिंग टूल के रूप में विकसित किया गया है, जिसका मकसद उन लोगों की पहचान करना है जिन्हें आगे डायबिटीज की जांच की जरूरत हो सकती है. अगर AI किसी व्यक्ति में रिस्क दिखाता है, तो उसे HbA1c या अन्य ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडल ने कई मामलों में सही पहचान की, लेकिन इसमें फॉल्स पॉजिटिव यानी कुछ स्वस्थ लोगों को भी जोखिम वाला बताने की संभावना देखी गई. यही वजह है कि डॉक्टर अभी भी ब्लड टेस्ट को डायबिटीज की पुष्टि का सबसे भरोसेमंद तरीका मानते हैं.
क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है ये तकनीक?
दुनियाभर में करोड़ों लोग टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित हैं और बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें ये बीमारी होने का पता ही नहीं होता. ऐसे में मोबाइल फोन या किसी ऐप के जरिए 20 सेकंड की आवाज रिकॉर्ड कर शुरुआती स्क्रीनिंग करना स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान बना सकता है. खासतौर पर उन लोगों के लिए, जो नियमित हेल्थ चेकअप नहीं कराते या दूरदराज के इलाकों में रहते हैं.
रिसर्चर्स का मानना है कि फ्यूचर में इस तरह के AI टूल्स बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानने में मदद कर सकते हैं, जिससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सके.
अभी और रिसर्च की जरूरत
हालांकि यह तकनीक काफी उम्मीद जगाती है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे बड़े स्तर पर अपनाने से पहले और अध्ययन की जरूरत है. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार यह रिसर्च अभी शुरुआती चरण में है और इसके परिणामों को विभिन्न आबादी और स्वास्थ्य स्थितियों में परखा जाना बाकी है.
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