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AI तकनीक ने एक बार फिर मारी बाजी, 2 नए सिस्टम ने मेडिकल कंडीशंस डायग्नोज करने में डॉक्टरों को भी पछाड़ा !

AI हेल्थ सेक्टर में काफी बेहतर प्रगति कर रहा है. हाल ही में AI की मदद से दो ऐसे सिस्टम तैयार किए हैं जो मरीज की बीमारी, दवाओं की जानकारी डॉक्टरों से बेहतर दे रहे हैं. हालांकि अभी इसमें और रिसर्च होनी बाकी है.

AI तकनीक ने एक बार फिर मारी बाजी, 2 नए सिस्टम ने मेडिकल कंडीशंस डायग्नोज करने में डॉक्टरों को भी पछाड़ा !
AI के नए टूल्स ने डॉक्टरों को भी पछाड़ा, लेकिन और रिसर्च की है जरूरत. ( Image NDTV)

AI ने एक बार फिर से हेल्थ केयर में एक नई उपलब्धि हासिल की है. 'नेचर' में पब्लिश अलग-अलग स्टडीज के अनुसार, हालिया में बनाए गए दो AI सिस्टम ने कई तरह के टेस्ट और इलाज से जुड़े कामों में डॉक्टर के बराबर या उनसे बेहतर प्रदर्शन किया है. हालांकि, रिसर्चर्स का कहना है कि इन AI टूल्स की मदद से इलाज करने में आसानी होगी, लेकिन इस टेक्नोलॉजी पर पूरी तरह से भरोसा कर के इंसानों पर आजमाने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.

AI हेल्थ केयर सिस्टम

AI के दो सिस्टम में से एक का नाम मीरा है, इसे जर्मनी की रिसर्च टीम द्वारा बनाया गया था.  वहीं दूसरे सिस्टम का नाम 'एमी' है, जिसे गूगल ने डेवलप किया है और यह उसके जेमिनी AI मॉडल पर काम करता है. फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नकली मरीजों की कंडीशन्स की मदद लेकर और मेडिकल प्रोफेशनल्स के साथ इन दोनों ही टूल को टेस्ट किया गया है. कई मामलों में इनके नतीजे डॉक्टरों के नतीजों के बराबर या उनसे बेहतर थे.

ये नतीजे उन बातों को सच साबित करते हैं जिनसे पता चलता है कि आम इस्तेमाल किए जाने वाले कंज्यूमर चैटबॉट्स की तुलना में, हेल्थ सपोर्ट पर बेस्ड AI मॉडल ज्यादा भरोसेमंद और सटीक सपोर्ट दे सकते हैं. हालाँकि, इस रिसर्च में शामिल वैज्ञानिकों का कहना है कि नियंत्रित माहौल में किए गए एक्सपेरिमेंट में मिली सक्सेस का मलतब यह नहीं है कि अस्पतालों और क्लीनिकों मे भी जहां भीड़-भाड़ ज्यादा होती है वहां पर भी सेम रिजल्ट मिले.

ऑटोपायलट

'मीरा' (Mira) को बनाने में मदद करने वाले TUD ड्रेस्डेन यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्चर जैकब कैथर, ने बताया कि, "हमें इस बात की झलक मिल रही है कि AI किस तरह मेडिकल के क्षेत्र में बदलाव ला सकता है."

कैथर मे AI असिस्टेंट्स को वो ऑटोपायलट बताया है जिसका इस्तेमाल एयरक्रॉफट में किया जाता है. उन्होंने बताया कि ऐसे टूल हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स काम के बोझ को कम करने में मदद कर सकते हैं, जहकि फाइनल फैसला इंसानों के हाथों में ही रहेगा.

AI ने डायग्नोसिस टेस्ट में बेहतर स्कोर किया

मीरा को इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स के साथ काम करने के लिए बनाया गया था और यह कई तरह के काम कर सकती है, जैसे टेस्ट और दवाएं बताने से लेकर मेडिकल प्रोसेस को अरेंज करने तक. रिसर्चर्स के अनुसार, इस सिस्टम के पास 85,000 से ज्यादा पॉसिबल क्लिनिकल एक्शन्स की जानकारी उपलब्ध है.

इसकी परफॉर्मेंस को जांचने के लिए, टीम ने इमरजेंसी डिपार्टमेंट के 500 से केस की जानकारी का इस्तेमाल किया. असली मरीजों से बातचीत करने के बजाय, मीरा को AI एजेंटों के साथ बातचीत से जानकारी मिली, जो मरीजो जैसा व्यवहार करते थे.

कई मेडिकल कंडीशन्स में मिली एक्यूरेसी

पैंक्रियाटिक कैंसर, निमोनिया, एपेंडिसाइटिस और पल्मोनरी एम्बोलिज्म समेत आठ मेडिकल कंडीशन्स में, मीरा ने 87.1 प्रतिशत की एक्यूरेसी हासिल की है. वहीं अलग-अलग विशेषज्ञता वाले 6 डॉक्टरों की टीम ने उन्हीं कंडीशन्स में 78.1% एक्यूरेसी पाई गई.

Google के Amie ने ट्रीटमेंट प्लानिंग में बहुत अच्छा परफॉर्म किया

Google के Amie का परीक्षण अलग तरीके से किया गया. रिसर्चर्स ने यूके की हेल्थकेयर गाइडलाइंस के आधार पर 100 मरीजों जैसी कंडीशन्स तैयार कीं और टेक्स्ट के जरिए होने वाली बातचीत में कलाकारों से मरीज का रोल प्ले करवाया. इसके बाद AI सिस्टम की तुलना 21 प्राइमरी केयर डॉक्टरों से की गई.

डॉक्टर के बराबर प्रदर्शन

स्टडी में पाया गया कि मरीज के इलाज से जुड़े फैसले लेने में 'एमी' (Amie) का प्रदर्शन डॉक्टरों के बराबर था. कई मामलों में, इसने ऐसे इलाज और जांच के प्लान तैयार किए जो क्लिनिकल गाइडलाइंस के ज्यादा करीब थे. रिसर्चर्स ने यह भी पाया कि मुश्किल मामलों में AI ने दवा से जुड़े फैसले बहुत अच्छे से लिए. अच्छे नतीजों के बावजूद, दोनों प्रोजेक्ट्स से जुड़े वैज्ञानिकों ने इनकी कई कमियों और लिमिटेशन्स की भी बात की है.

मीरा (Mira) को बनाने वाली टीम ने बताया कि यह सिस्टम कभी-कभी ऐसी देखभाल का सुझाव देता था जो आम तौर पर माने जाने वाले मेडिकल तरीकों से पूरी तरह मेल नहीं खाता था. रिसर्च करने वालों ने यह भी गौर किया कि नकली मरीजों से मिली जानकारी, असल इमरजेंसी स्थितियों में डॉक्टरों को मिलने वाली जानकारी की तुलना में ज्यादा बेहतर और पूरी थी.

गूगल के रिसर्चर्स ने भी ऐसी ही चिंताएं जाहिर कीं. उन्होंने इस स्टडी को एक अहम कदम बताया, लेकिन कहा कि टेस्टिंग का माहौल असल दुनिया में हेल्थकेयर की अनिश्चितता और जटिलता को पूरी तरह नहीं दिखा पाया. टीम के मुताबिक, 'एमी' (Amie) को असल इस्तेमाल के लिए तैयार मानने से पहले, उसमें सोचने-समझने की गलतियों को कम करने और काम को बेहतर बनाने के लिए अभी और काम करने की जरूरत है.

इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट्स ने इन स्टडीज का स्वागत किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि इनके रिजल्ट को समझते समय सावधानी बरतना बेहद जरूरी है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में मेडिकल सोशियोलॉजी की प्रोफेसर कैथरीन पोप ने कहा कि, असली हेल्थ केयर माहौल, पहले से तैयार किए गए माहौल से बिल्कुल अलग होता है. कई बार मरीज अपनी पूरी जानकारी नहीं देते हैं, अपने लक्षणों को अलग-अलग तरीकों से बताते हैं और एक साथ कई तरह की हेल्थ प्रॉबलम्स लेकर आ जाते हैं. 

रिसर्चर्स ने यह भी कहा कि Amie के अच्छे प्रदर्शन की एक वजह आधुनिक AI मॉडल्स में तेजी से हो रहा सामान्य सुधार भी हो सकता है, न कि सिर्फ हेल्थकेयर के लिए बनाए गए इस सिस्टम की खास तकनीक.

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लेखक के बारे में
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अनिता शर्मा
एसोसिएट एडिटर
अनिता शर्मा हिंदी की जानी-मानी हेल्थ जर्नलिस्ट्स में शुमार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 20 वर्षों का समृद्ध अनुभव है. साल 2006 में अपने... और पढ़ें
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