न्यूयॉर्क:
स्कूलों में एग्ज़ाम जोर-शोर से चल रहे हैं। ऐसे में आपका बच्चा चाहे जितना मर्जी पढ़ ले, उसे सुस्ती ज़रूर आती है। अगर आप अपने बच्चे को घर में ही पढ़ा रहे हैं, तो इस बात पर गौर करें कि कहीं आपका बच्चा ज़्यादा देर सोता तो नहीं है।
एक नए शोध से पता चला है कि नियमित स्कूल जाने वाले बच्चों की तुलना में घर में पढ़ने वाले बच्चे अधिक सोते हैं। इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने करीब 2,612 स्टूडेंट्स की नींद से संबंधित आदतों का आंकलन किया। इन स्टूडेंट्स में घर में पढ़ने वाले करीब 500 बच्चे भी शामिल थे।
अध्ययन के दौरान ज़्यादा सोने वाले और कम सोने वाले दोंनों ही कारकों का आंकलन किया गया। शोध से पता चला कि घर पर पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 44.5 प्रतिशत बच्चे नींद पूरी न होने की शिकायत रखते हैं। जबकि घर में पढ़ने वाले बच्चों का यह आंकड़ा 16.3 फीसदी है।
डेनवर के नैशनल ज्वूइश हेल्थ से इस अध्ययन की मुख्य लेखक लीसा मेल्टजर ने कहा “हमारे यहां के स्कूलों का प्रिंसिपल होता है, जिसका समय बिलकुल निश्चित होता है। कम उम्र के बच्चों का स्कूल जल्दी शुरू होता है, जाहिर सी बात है कि ऐसे में वे जल्दी उठते हैं। वहीं उम्र बढ़ने के साथ बच्चे अधिक नींद लेने लगते हैं”।
उन्होंने बताया कि “छोटे बच्चों को पूरे नौ घंटे की नींद की ज़रूरत है और अगर वे केवल सात घंटे ही सोते हैं, तो यानी वे हफ्ते में 10 घंटे की कम नींद लेते हैं। ये समय उनके कामकाज को प्रभावित करता है”। नींद की कमी स्वास्थ्य के साथ मानसिकता को भी प्रभावित करती है।
मेल्टजर ने बताया कि “नींद के अभाव से ध्यान केंद्रित करने और याद करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए शरीर और मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त और तय मात्रा में नींद लेना काफी आवश्यक है”।
यह शोध पत्रिका ‘बिहेवियरल स्लीप मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है।
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है)
एक नए शोध से पता चला है कि नियमित स्कूल जाने वाले बच्चों की तुलना में घर में पढ़ने वाले बच्चे अधिक सोते हैं। इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने करीब 2,612 स्टूडेंट्स की नींद से संबंधित आदतों का आंकलन किया। इन स्टूडेंट्स में घर में पढ़ने वाले करीब 500 बच्चे भी शामिल थे।
अध्ययन के दौरान ज़्यादा सोने वाले और कम सोने वाले दोंनों ही कारकों का आंकलन किया गया। शोध से पता चला कि घर पर पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 44.5 प्रतिशत बच्चे नींद पूरी न होने की शिकायत रखते हैं। जबकि घर में पढ़ने वाले बच्चों का यह आंकड़ा 16.3 फीसदी है।
डेनवर के नैशनल ज्वूइश हेल्थ से इस अध्ययन की मुख्य लेखक लीसा मेल्टजर ने कहा “हमारे यहां के स्कूलों का प्रिंसिपल होता है, जिसका समय बिलकुल निश्चित होता है। कम उम्र के बच्चों का स्कूल जल्दी शुरू होता है, जाहिर सी बात है कि ऐसे में वे जल्दी उठते हैं। वहीं उम्र बढ़ने के साथ बच्चे अधिक नींद लेने लगते हैं”।
उन्होंने बताया कि “छोटे बच्चों को पूरे नौ घंटे की नींद की ज़रूरत है और अगर वे केवल सात घंटे ही सोते हैं, तो यानी वे हफ्ते में 10 घंटे की कम नींद लेते हैं। ये समय उनके कामकाज को प्रभावित करता है”। नींद की कमी स्वास्थ्य के साथ मानसिकता को भी प्रभावित करती है।
मेल्टजर ने बताया कि “नींद के अभाव से ध्यान केंद्रित करने और याद करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए शरीर और मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त और तय मात्रा में नींद लेना काफी आवश्यक है”।
यह शोध पत्रिका ‘बिहेवियरल स्लीप मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है।
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है)
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