ग्राउंड रिपोर्ट: बाइक टैक्सी के हेलमेट का रियलिटी चेक, ऐप पर सेफ्टी के दावे, सिर पर 'प्लास्टिक का कटोरा'
Ola Uber Bike Taxi Safety Check: सड़कों पर दौड़ने वाली ओला उबर बाइक टैक्सियों में यात्रियों को सुरक्षा कवच के नाम पर बेहद घटिया और जानलेवा प्लास्टिक-थर्माकॉल का हेलमेट थमाया जा रहा है.
सुबह के करीब 9:00 बजे हैं. नोएडा को दिल्ली से जोड़ने वाले व्यस्त डीएनडी फ्लाईवे (DND Flyway) पर वाहन रफ्तार भर रहे हैं. इसी दौरान एक बाइक फर्राटा भरती हुई निकली. अचानक रफ्तार और हवा के तेज थपेड़े से बाइक के पीछे बैठे युवक का हेलमेट सिर से उतरकर हवा में उछला. अगले ही पल वह हेलमेट पीछे आ रही एक तेज रफ्तार कार से टकराता है. गनीमत रही कि कार पर सिर्फ एक छोटा सा स्क्रैच आया और कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ. लेकिन असली खौफनाक मंजर इसके ठीक बाद दिखा. कार के पीछे आ रहे एक पिकअप वैन का टायर जैसे ही उस हेलमेट के ऊपर से गुजरा, वह किसी मजबूत सुरक्षा कवच की तरह टिकने के बजाय, राख के ढेर की तरह बिखर गया.
पलभर में उस हेलमेट के परखच्चे उड़ चुके थे. सड़क पर पड़े मलबे को करीब से देखा, तो उसमें से सिर्फ घटिया प्लास्टिक और थर्माकॉल के सफेद टुकड़े बिखरे पड़े थे. जब बाइक राइडर को रोककर बात की गई, तो कहानी का असली और डरावना पहलू सामने आया. उसने बताया कि वह ओला (Ola), उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) जैसी कंपनियों में बाइक टैक्सी चलाता है. इसके बाद दिमाग में बस एक ही तीखा सवाल कौंध गया, आखिर यह कैसा हेलमेट है, जो एक हल्के से दबाव में ही तिनके की तरह बिखर गया? क्या हर दिन लाखों यात्रियों को थमाया जाने वाला यह सुरक्षा कवच सिर्फ एक छलावा है? हमने इसकी पड़ताल की और एक डरावनी कहानी सामने आई.
चालान से बचने का जुगाड़ बन गया है हेलमेट
भारत में बाइक पर हेलमेट पहनना अनिवार्य है. हेलमेट को 'सुरक्षा कवच' माना जाता है. लेकिन असल में यह सिर्फ 1000 रुपये के चालान से बचने का एक सस्ता और घटिया जुगाड़ है. सवाल यह भी है कि आखिर लोग जिन अरबो डॉलर की कंपनियों पर भरोसा करके बाइक बुक करते हैं, वो यात्रियों की सुरक्षा के लिए क्या कर रही हैं? कंपनियां वैसे तो सेफ्टी फर्स्ट का दावा करती हैं, लेकिन असल में उनके राइडर यात्रियों को जो हेलमेट सौंप रहे हैं, वे इतने खराब क्वालिटी के हैं, तो तेज दबाने भर से टूट जाएं.
बाइक टैक्सी किस तरह आम लोगों की जान के साथ खिलवाड़ कर रही हैं? इसकी तह तक जाने के लिए हमने अलग-अलग ऐप्स से बाइक बुक कीं. हमने लगातार 10 दिन तक बाइक बुक की और ग्राउंड रियलिटी चेक किया. हमारी इस पड़ताल में लगभग हर राइड में जो बात कॉमन निकलकर आई, वो आपको हैरान कर देगी. हर बार पैसेंजर के हाथ में जो हेलमेट थमाया गया, वह बेहद घटिया और कबाड़ क्वालिटी का था. लेकिन राइडर खुद जो हेलमेट पहने हुए थे वे ISI स्टैंडर्ड को फॉलो करने वाले थे. यानी राइडर खुद को अच्छे हेलमेट पहनते हैं, लेकिन अपने यात्रियों को सड़क किनारे 80 से 100 रुपये में मिलने वाले ये नीले-पीले बेहद हल्की और रद्दी क्वालिटी के प्लास्टिक वाले हेलमेट देते हैं.

राइडर और पैसेंजर के हेलमेट में कितना अंतर?
Photo Credit: NDTV
क्या कहते हैं बाइक राइडर्स?
जब हमने इन बाइक राइडर्स से बात की, तो इस पूरे खेल के पीछे की सच्चाई और कंपनियों की लापरवाही खुलकर सामने आई.
सिर्फ चालान से बचने का जुगाड़: नोएडा सेक्टर 62 में रहने वाले अंकित से जब हमने बेकार क्वालिटी का हेलमेट देने के पीछे की वजह पूछी तो उन्होंने ये माना कि यह हेलमेट किसी की जान बचाने के लिए है ही नहीं. अंकित ने कहा, हम तो इसे सिर्फ इसलिए साथ रखते हैं ताकि ट्रैफिक पुलिस हमारा 1000 रुपये का चालान न काट दे. पुलिस को भी बस सिर पर कुछ ढका हुआ देखना होता है, हेलमेट की क्वालिटी से उन्हें कोई मतलब नहीं.'

तस्वीरें अलग-अलग राइड के दौरान ली गई हैं
Photo Credit: NDTV
आखिर ये हेलमेट मुहैया कौन कराता है?
जब हमने राइडर्स से यह पूछा कि वे अच्छी क्वालिटी का ISI मार्क वाला हेलमेट कंपनी क्यों नहीं देती? तो इसका जवाब दिया रैपिडो में बाइक चलाने वाले राहुल झा ने. राहुल ने बताया, 'कंपनियां सिर्फ डॉक्यूमेंट लेती हैं और कुछ चार्ज वसूलती हैं. लेकिन कंपनियों की तरफ से कोई हेलमेट नहीं मिलता. पहले रैपिडो कंपनी हेलमेट देती थी, लेकिन अब उसने भी बंद कर दिया है. हमें सब कुछ खुद खरीदना पड़ता है.'

तस्वीरें अलग-अलग राइड के दौरान ली गई हैं
Photo Credit: NDTV
अगर पैसेंजर इन हेलमेट के इस्तेमाल से मना कर दें तो?
हमने कुछ बाइक राइडर्स से ISI मार्क वाला हेलमेट की मांग की. ये सवाल सुनकर कुछ राइडर्स हैरान हो गए. कुछ मुस्कुरा गए और कुछ ने दो साफ शब्दों में कह दिया कि राइड कैंसिल कर दो. उनके पास यही हेलमेट है, अगर चलना है, तो यही मिलेगा.
कंपनियों की पॉलिसी ही स्पष्ट नहीं
ओला, उबर और रैपिडो ऐप में बाइक यात्रियों की सेफ्टी के लिए कोई खास गाइडलाइन नहीं है. ऐप पर बतौर सेफ्टी बस इतना लिखा है कि आप राइडर से हेलमेट मांग सकते हैं. हेलमेट कैसा होना चाहिए, इसके लिए कोई निर्देश नहीं हैं. हमने ओला,उबर और रैपिडों तीनों ही कंपनियों के कस्टमर सपोर्ट को मेल करके इसकी जानकारी मांगी. 24 घंटे बाद भी ओला की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. रैपिडो के कस्टमर सपोर्ट ने लिखित जवाब नहीं दिया, लेकिन कॉल किया. वहीं उबर ने मेल पर ही जवाब दिया.
उबर की कस्टमर सपोर्ट आंचली ने ईमेल के जरिए बताया कि कंपनी अपने राइडर्स को कानून के अनुसार हेलमेट देने के लिए कहती है. उबर हेलमेट ISI और BSI मार्क वाले हेलमेट के इस्तेमाल का प्रोत्साहित करता है. उन्होंने ये भी बताया कि Uber सीधे हेलमेट की आपूर्ति नहीं करता. अगर किसी यात्री को खराब हेलमेट मिलता है, तो वह ऐप के जरिए इसकी शिकायत कर सकता है.

यात्री को मिला बेहद खराब क्वालिटी का हेलमेट
Photo Credit: LinkedIn
लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कर रहे शिकायत
LinkedIn पर बलराज सिंह नाम के यूजर ने भी खराब हेलमेट की शिकायत की. उन्होंने लिखा कि वो 2019 से उबर का बाइक टैक्सी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. एक बात जो मुझे बहुत परेशान करती है, वह है कुछ राइडर्स द्वारा दिए जाने वाले पैसेंजर हेलमेट की हालत. कई बार देखा है कि पैसेंजर को टूटे या खराब हेलमेट दिए जाते हैं. हेलमेट को स्टिकर, टेप या कामचलाऊ तरीकों से ठीक किया गया होता है. चिन स्ट्रैप गायब या खराब होती है. ऐसे हेलमेट का इस्तेमाल किया जाता है जो स्टैंडर्ड क्वालिटी के नहीं होते और दुर्घटना की स्थिति में शायद सही सुरक्षा न दे पाएं.
उन्होंने आगे कहा कि इस मामले को और भी चिंताजनक बात यह बनाती है कि कई कस्टमर अपनी राइड के फीडबैक और रेटिंग में खराब हेलमेट के बारे में लगातार बताते हैं. फिर भी, यह समस्या बनी हुई है.

तस्वीरें अलग-अलग राइड के दौरान ली गई हैं
Photo Credit: NDTV
हेलमेट को लेकर क्या नियम?
अब सवाल यह है कि आखिर भारत में हेलमेट को लेकर क्या नियम हैं? अगर नियम हैं भी तो उन्हें फॉलो क्यों नहीं किया जा रहा है. इसके लिए हमने डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन कोर्ट भोपाल के वकील शिवांश द्विवेदी से बात की. उन्होंने मोटर व्हीकल एक्ट और उपभोक्ता के अधिकारों पर खुलकर बात रखी.
शिवांश ने कहा, 'यह केवल उपभोक्ता अधिकारों का नहीं बल्कि सीधे-सीधे सड़क सुरक्षा और जीवन के अधिकार का मामला है. आज कई बाइक टैक्सी प्लेटफॉर्म जैसे Ola, Uber और Rapido यात्रियों को हेलमेट उपलब्ध तो कराते हैं, लेकिन कई मामलों में उनकी गुणवत्ता बेहद खराब पाई जाती है. अगर हेलमेट केवल पुलिस चालान से बचने के लिए दिया जा रहा है और दुर्घटना की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं है, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जा सकती है.'
मोटर व्हीकल एक्ट के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस एक्ट की धारा 129 के अनुसार दोपहिया वाहन चलाने वाला चालक और पीछे बैठा व्यक्ति यानी पिलियन राइडर दोनों को निर्धारित मानकों वाला सुरक्षात्मक हेलमेट पहनना जरूरी है.
हेलमेट कैसा होना चाहिए?

आखिर हेलमेट बिक्री के नियम क्या हैं?
जब देश में केवल ISI मार्क वाले हेलमेट पहने जा सकते हैं, तो ये सस्ते और खराब क्वालिटी के हेलमेट बाजार में खुले आम कैसे बिक रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए शिवांश बताते हैं, 'भारत सरकार ने गुणवत्ता नियंत्रण आदेश जारी कर यह व्यवस्था की है कि केवल BIS प्रमाणित हेलमेट ही बेचे जाएं. बिना ISI प्रमाणन वाले हेलमेट का निर्माण, भंडारण या बिक्री नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है. उन्होंने बताया कि हेलमेट न पहनने पर मोटर वाहन अधिनियम की धारा 194D के तहत 1000 रुपये तक का जुर्माना का प्रावधान है.
क्या ऐप कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है?
शिवांश ने कहा, 'जब कोई प्लेटफॉर्म प्रत्येक राइड से कमीशन प्राप्त करता है और स्वयं को सुरक्षित यात्रा का माध्यम बताता है, तब उसकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर कार्यरत राइडर्स के लिए न्यूनतम सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करे. यदि कंपनी यात्रियों को हेलमेट उपलब्ध कराने का दावा करती है, तो उसे हेलमेट की गुणवत्ता और मानक की निगरानी भी करनी चाहिए."

तस्वीरें अलग-अलग राइड के दौरान ली गई हैं
Photo Credit: NDTV
पुलिस की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी सवाल उठते हैं. शिवांश ने कहा कि अगर कोई चालक या यात्री बिना मानक हेलमेट के यात्रा कर रहा है तो यातायात पुलिस को मोटर वाहन अधिनियम के तहत कार्रवाई करने का अधिकार है. केवल हेलमेट पहन लेना पर्याप्त नहीं है, वह सुरक्षा मानकों के अनुरूप भी होना चाहिए.'
उन्होंने आगे कहा कि अगर किसी दुर्घटना में घटिया हेलमेट के कारण चोट लगती है, तो परिस्थितियों के अनुसार पीड़ित व्यक्ति चालक, प्लेटफॉर्म कंपनी तथा अन्य जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध उपभोक्ता आयोग या सक्षम न्यायालय में क्षतिपूर्ति का दावा भी कर सकता है.
हमारे कुछ सवाल भी हैं
- ओला, उबर और रैपिडो समेत ऐप कंपनियां जब हर राइड पर पैसेंजर्स से 'सेफ्टी या इंश्योरेंस फीस' वसूलते हैं, तो वह पैसा कहां जाता है?
- आखिर यात्रियों को रद्दी हेलमेट क्यों थमाया जा रहा है?
- क्या आपकी जिम्मेदारी सिर्फ ऐप पर राइड बुक कराने और अपना कमीशन काटने तक ही सीमित है?
- ग्राउंड पर यात्रियों की जान की सुरक्षा की मॉनिटरिंग का आपका क्या सिस्टम है?
- क्या कंपनियां अपने राइडर्स को फ्री में या सब्सिडी दर पर ISI मार्क वाले हेलमेट उपलब्ध नहीं करा सकतीं?
यह भी पढ़ें: डिजिटल सुरक्षा का खोखला ढांचा: ऐप कैब के 'लूपहोल्स' और हमारी बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
-
पहाड़ दरकते हैं, ग्लेशियर टूटते हैं और फिर नेपाल जैसी त्रासदी... हिमालय रीजन के डैम क्यों बन रहे खतरा?
सवाल यही है कि साफ ऊर्जा के लिए भी बनाए जा रहे प्रोजेक्ट क्या इतने जरूरी हो चुके हैं कि उसके लिए पहाड़ों की संरचना के साथ खिलावाड़ किया जाए या फिर प्रकृति को चुनौती दी जाए?
-
मैथ्स में AI अच्छा या बुरा? ऑनलाइन पोस्ट वायरल होने के बाद सबसे बेहतरीन गणितज्ञों का आया जवाब
AI से कोई प्रूफ तैयार करने में भले ही कुछ घंटे लगें, लेकिन नए नतीजों को इंसानी ज्ञान का हिस्सा बनने में सालों लग सकते हैं. इस लिहाज से, बड़ा खतरा यह नहीं है कि AI गणितज्ञों की जगह ले लेगा, बल्कि यह है कि यूनिवर्सिटीज इंसानी मेहनत को सपोर्ट करना बंद कर देंगी.
-
आरक्षण पर रार: राजभर और मांझी के बयान ने बीजेपी को कैसे दी बड़ी राहत?
अगर पिछड़े और दलित समाज की ही राजनीति करने वाले एनडीए के सहयोगी नेता बीजेपी के साथ खड़े हो जाते हैं तो पार्टी को विपक्ष के नेरेटिव को काउंटर करने में मदद मिल सकती है.
-
अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के चीफ गुप्त यात्रा पर रूस क्यों गए थे?
रैटक्लिफ की मॉस्को यात्रा से जुड़े कई पेचीदा पहलू उन दो नेताओं के बीच असाधारण रिश्तों में एक दिलचस्प नया मोड़ लाते हैं, जो एक जैसी रणनीतिक उलझन का सामना कर रहे हैं और जो उनकी विरासत तय कर सकती है.
-
'चवन्नी' बोलकर अखिलेश ने किया अपना नुकसान? पश्चिमी यूपी में जयंत-बीजेपी का चल जाएगा सिक्का
2027 के चुनाव में बात सिर्फ यह नहीं है कि जाटों का अपमान किसने किया. एक बड़ा सवाल यह भी है कि किसका नैरेटिव जनता के बीच ज्यादा असर दिखाता है?
-
नेपाल जल प्रलय: प्राकृतिक आपदा से कैसे बेहतर तरीके से लड़ें, भारत को भी भूटान से सीखने की जरूरत
वैसे तो कोई भी देश बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़े निर्माण और अच्छी सड़कें चाहता है, लेकिन भूटान इस अंधे शहरीकरण में पूरी तरह नहीं फंसा है.
-
राहुल गांधी कांग्रेस में बदलाव तो कर रहे हैं, लेकिन क्या इसकी कीमत पार्टी चुका रही है?
नए संगठन की तलाश में राहुल गांधी यह बड़ी भूल कर रहे हैं कि वे विरासत में मिली कांग्रेस को एक बोझ की तरह देख रहे हैं.
-
उसेन बोल्ट से तेज निकला चीनी रोबोट! रोबोटिक्स की दुनिया में चीन के मुकाबले कहां खड़ा भारत
अब चीन रोबोट की इस दुनिया में बादशाह इसलिए बना हुआ है क्योंकि उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके पास ऐसे ग्राहक हैं जो लगातार रोबोट्स की मांग करते हैं.
-
पूनिया का 'प्लेबुक': माइक्रो मैनेजमेंट से 'रिश्तेदारी' तक, पंजाब में BJP की नई रणनीति
सतीश पूनिया अपने राजनीतिक जीवन को लेकर राजस्थान की लंबाई-चौड़ाई को रोड बसों में घूमते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही समझ लिया था कि लोगों से कनेक्ट और उनकी नजर में आपकी रिकॉल वैल्यू कितनी महत्वपूर्ण है. इसके साथ-साथ मैनेजमेंट स्किल्स भी उतनी ही जरूरी है.
-
पाकिस्तान ने किए थे अत्याचार और तुर्किये से नाता नहीं, फिर क्यों 'इस्लामिक नाटो' में जाना चाहता है बांग्लादेश
प्रोफेसर अमित सिंह के मुताबिक बांग्लादेश भी पैक्ट में कुछ देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह एक बड़े सुरक्षा समझौते में शामिल होना चाहता है.