Home-Cooked vs Restaurant Food: अक्सर हम सबके घरों में एक ही सवाल उठता है घर में इतना अच्छा, ताजा और पौष्टिक खाना बना है, फिर भी बाहर का खाना इतना क्यों भाता है? मां के हाथ का खाना सेहत के लिए बेहतर माना जाता है, फिर भी पिज्जा, बर्गर, चाउमीन या कोल्ड ड्रिंक का नाम सुनते ही मन ललचा जाता है. यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे दिमाग और आदतों से जुड़ा एक पूरा साइकोलॉजिकल खेल छिपा है. हाल ही में NDTV आदिकास्ट में इसी अहम सवाल पर चर्चा की गई. इसमें फूड वॉरियर उर्वशी ने बताया कि बाहर का खाना अच्छा लगने की असली वजह स्वाद नहीं, बल्कि उसे इस तरह डिज़ाइन किया जाना है कि वह हमारे दिमाग को तुरंत खुशी दे.
स्वाद नहीं, ब्लिस पॉइंट का कमाल
उर्वशी बताती हैं कि बाहर के खाने में शुगर, नमक और फैट का ऐसा संतुलन रखा जाता है, जिसे ब्लिस पॉइंट कहा जाता है. यह वो बिंदु होता है, जहां खाना खाते ही दिमाग को ज्यादा से ज्यादा संतुष्टि मिलती है. यही वजह है कि चिप्स, बर्गर या मिठाइयां खाते ही मन और चाहिए कहने लगता है, जबकि घर का सादा खाना जल्दी बोर कर देता है.

दिमाग को खुश करने की पूरी प्लानिंग
बाहर का खाना सिर्फ पकाया नहीं जाता, बल्कि इंजीनियर किया जाता है. सॉफ्ट ड्रिंक में कितनी फ़िज होगी, चिप्स कितने कुरकुरे होंगे, बर्गर में सॉस कितना टपकेगा. इन सब पर रिसर्च होती है ताकि खाने का पहला ही निवाला दिमाग को झटका दे और खुशी का एहसास कराए.
मार्केटिंग और माहौल भी जिम्मेदार
बाहर का खाना सिर्फ ज़ुबान नहीं, आंख और दिमाग को भी लुभाता है. रंग-बिरंगे पैकेट, बड़ी-बड़ी होर्डिंग, दोस्तों के साथ खाने का माहौल. ये सब मिलकर खाने को एक इमोशनल एक्सपीरियंस बना देते हैं. धीरे-धीरे हमारी स्वाद की आदत बदल जाती है और घर का साधारण खाना फीका लगने लगता है.
सेहत पर पड़ता है असर:
इस तरह का खाना लंबे समय में मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाता है. साथ ही, खाने के साथ भावनात्मक निर्भरता भी बन जाती है तनाव हो तो बाहर का खाना, खुशी हो तो बाहर का खाना.
घर का खाना बुरा नहीं होता, बल्कि हमारा दिमाग बाहर के खाने का आदी बना दिया गया है. अगर हम यह समझ लें कि स्वाद नहीं, बल्कि ब्लिस पॉइंट हमें फंसा रहा है, तो धीरे-धीरे अपनी आदतें बदल सकते हैं.
(रिपोर्ट : आदित्य झा)
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