सोमवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अंतिम बार राष्ट्र को संबोधित किया
नई दिल्ली:
- प्रणब मुखर्जी ने कहा, 'मैं अपने दायित्वों को निभाने में कितना सफल रहा, इसकी परख इतिहास के कठोर मानदंड द्वारा ही हो पाएगी.'
- जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं हैं.
- भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है, भारत की संसद मेरा मंदिर रहा है और भारत की जनता की सेवा मेरी अभिलाषा.
- विकास को वास्तविक बनाने के लिए, देश के सबसे गरीब को यह महसूस होना चाहिए कि वह राष्ट्र का एक भाग है.
- हम प्रतिदिन अपने आसपास बढ़ती हुई हिंसा देखते हैं, इस हिंसा की जड़ में अज्ञानता, भय और अविश्वास है.
- हमें अपने जन संवाद को शारीरिक और मौखिक, सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा.
- एक अहिंसक समाज ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों, विशेषकर पिछड़ों और वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है.
- प्रकृति हमारे प्रति पूरी तरह उदार रही है. परंतु जब लालच आवश्यकताओं की सीमा को पार कर जाता है तो प्रकृति अपना प्रकोप दिखाती है.
- जलवायु परिवर्तन से कृषि क्षेत्र पर भीषण असर पड़ा है. वैज्ञानिकों को मिट्टी की सेहत सुधारने, जलस्तर की गिरावट को रोकने और पर्यावरण संतुलन के लिए किसानों और श्रमिकों के साथ कार्य करना होगा.
- हम सबको मिलकर कार्य करना होगा क्योंकि भविष्य में हमें दूसरा मौका नहीं मिलेगा.
वीडियो: विदाई भाषण में क्या बोले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
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