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क्या AI गोंडी जैसी प्राचीन आदिवासी भाषाओं को भी बचा सकता है?

Shubhranshu Choudhary
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 02, 2026 19:54 pm IST
    • Published On मार्च 02, 2026 13:38 pm IST
    • Last Updated On मार्च 02, 2026 19:54 pm IST
क्या AI गोंडी जैसी प्राचीन आदिवासी भाषाओं को भी बचा सकता है?

पिछले हफ़्ते एआई सम्मेलन में भाषा पर खूब चर्चा हुई. हमने विश्व मातृभाषा दिवस भी मनाया. इस हफ़्ते मध्य भारत में माओवादी आंदोलन के प्रमुख के सरेंडर से उस समस्या का अनौपचारिक समापन भी हुआ. आप कहेंगे एलएलएम या लार्ज लैंग्विज मॉडल तो एआई का हिस्सा हैं पर माओवादी समस्या का इससे क्या संबंध है?

एआई सम्मेलन में यह चर्चा ख़ास तौर पर हुई कि कमज़ोर भाषाएं लार्ज लैंग्विज मॉडल का फ़ायदा कैसे उठा सकती हैं. सम्मेलन ने शुरू से ही भाषा के क्षेत्र में उलट-पुलट देखा. फ़्रांसीसियों के बारे में कहा जाता है कि वे अंग्रेज़ी जानते हुए भी कभी अंग्रेज़ी में जवाब नहीं देते पर इस बार फ़्रांसीसी राष्ट्रपति ने अंग्रेज़ी में भाषण दिया. 

मातृभाषा का जोर

भारत के प्रधानमंत्री ने हिंदी में और ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने पुर्तगाली में भाषण दिया.संप्रभुता इस एआई सम्मेलन का मुख्य विषय था.जिसका लगभग हर वक्ता ने अपने हिसाब से ज़िक्र किया. फ़्रांसीसी राष्ट्रपति के साथ सफ़र कर रहे एक पत्रकार ने मुझसे कहा कि चूंकि एआई की भाषा अंग्रेज़ी है इसलिए मैक्रों ने अंग्रेज़ी में भाषण दिया. साथ ही उन्होंने पूछा 'ये भारत क्या है'? मैंने उन्हें बताया हमारे नाम का भी अंग्रेजीकरण हुआ है, जिसे सुधारने की धीमी कोशिशें हो रही हैं.भारत के प्रधानमंत्री टेलीप्रॉम्प्टर की मदद से यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि हर कोई अपनी मातृभाषा में बात कर सकता है और मशीन उसका अनुवाद कर देगी. 

अंग्रेज़ी और हिंदी जैसी बड़ी भाषाओं के लिए तो यह बात सही है पर गोंडी जैसी छोटी भाषाओं को अभी काफ़ी सफ़र तय करना बाक़ी है. पिछले 20 सालों में गोंडी माओवादी आंदोलन की मुख्य भाषा रही है. जिस लड़ाई में इन सालों में करीब पांच लाख आदिवासी जुड़े, पांच हजार की मौत हुई 17 हज़ार से अधिक जेल गए और करीब 20 हज़ार ने सरेंडर किया. 

माओवादियों की राजधानी कहां थी

माओवादियों की राजधानी का नाम अबूझमाड़ था. जंगली और पहाड़ी इलाक़ा होने के साथ वह अबूझ इसलिए भी था क्योंकि उनकी भाषा गोंडी मुख्यधारा के भारत के लिए अबूझ थी. इस हफ़्ते छत्तीसगढ़ के वित्तमंत्री ने अपना बजट भी पेश किया जिसमें उन्होंने अबूझमाड़ जैसी जगहों में एजुकेशन सिटी बनाने का ऐलान किया. पर उन्हें जब याद दिलाया गया कि दो साल पहले अपने बजट भाषण में उन्होंने गोंडी के लिए कुछ पैसे रखे थे जिससे स्कूलों में भी गोंडी में पढ़ाई हो सके पर वह पैसा आज तक रिलीज़ नहीं हुआ है तो उन्होंने कहा मैं इसके लिए पूरी कोशिश करुंगा. बस्तर का स्कूल ड्रॉप आउट दर शेष छत्तीसगढ़ से लगभग दुगुना है. 

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बस्तर में माओवादी आंदोलन के नेता बोलते थे हम गोंडी बोलते हैं और शिक्षक हिंदी. गोंडी द्रविड़ परिवार की भाषा है और गोंडी बोलने वाले बच्चे हिंदी का एक शब्द भी नहीं समझते और स्कूल छोड़ देते हैं. बस्तर का माओवादी आंदोलन मूलतः गोंडी स्कूल ड्रॉप आउट लोगों का आंदोलन था, यद्यपि उनके नेता बाहरी और मांगे सत्ता परिवर्तन की थीं. 

एआई समिट में विशेषज्ञों ने बताया कि गोंडी जैसी छोटी भाषाओं में भी अनुवाद की मशीन बनाने का काम शुरू हुआ है और सरकार ने अब आदिवाणी जैसे ऐप बनाए हैं. पर गोंडी पर काम करने वालों का कहना है सरकार गोंडी के सिर्फ़ एक ही बोली को मानक बना दे रही है, जबकि हम सालों से मिला जुला मानक गोंडी बनाने पर काम कर रहे हैं.

भाषाओं को राज्य का संरक्षण

आज चार में से तीन गोंड गोंडी नहीं बोलते पर वे इसराइल की हिब्रू भाषा का ज़िक्र करते हैं, जहां इस हफ़्ते हमारे प्रधानमंत्री गए थे जहां की हिब्रू राष्ट्रीय भाषा है. दो हज़ार साल तक हिब्रू एक मृत भाषा थी पर आज शिक्षा के माध्यम के साथ-साथ वहां की सांसद क्नेसेट की भी मुख्य भाषा हिब्रू है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस हफ़्ते वहां भाषण भी दिया. 

यद्यपि यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध होना बाक़ी है पर कुछ विशेषज्ञ यह कहते हैं कि गोंडी करीब पांच हज़ार साल पुरानी भाषा है. अन्य द्रविड़ भाषाओं जैसे तमिल आदि का विकास हुआ क्योंकि उन्हें राज्यों का संरक्षण मिला पर गोंडी बोलने वाले लोग और जगहें छह प्रदेशों में बंट गए और गोंडी को किसी राज्य से अब तक अपेक्षित मदद नहीं मिली है. 

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक गोंड आदिवासी और गोंडी बोलने वाले रहते हैं. सरेंडर करने वाले एक प्रमुख माओवादी नेता वेणुगोपाल ने इस हफ़्ते दिए एक साक्षात्कार में कहा है, ''यह ग़लत समझ है कि आदिवासी जल, जंगल, ज़मीन के कारण माओवादी बने थे. सभी लोग उनके साथ हुए अन्याय से लड़ने के लिए माओवाद से जुड़ते है.'' 

भाषाओं को कैसे बचाएगा एआई

आशा है केंद्रीय गृह मंत्रालय गोंड आदिवासियों के साथ हो रहे ऐतिहासिक भाषाई अन्याय को दूर करने में पहल करेगा. इसमें एआई मदद कर सकता है. केंद्र सरकार ने आदिवाणी ऐप बनाने की पहल की है. अब उसमें गोंडी समुदाय को भी जोड़कर एक मिला जुला मानक गोंडी में बनाने की ज़रूरत है.

छत्तीसगढ़ सरकार अबूझमाड़ जैसी जगहों पर एजुकेशन सिटी बनाने की बात कर रही है. वहां नई शिक्षा नीति के तहत भी यह सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है कि गोंड बच्चों को भी उनकी मातृभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा दी जाए और एआई फिर उन्हें अंग्रेज़ी सहित दुनिया की हर भाषा से अनुवाद करने और उन्हें सीखने में भी मदद करेगा.  

21 फ़रवरी को विश्व मातृभाषा दिवस उन पांच शहीदों की याद में मनाया जाता है जिन्होंने पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू थोपने के विरोध में 1952 में अपनी जान दी थी. बाद में यही आंदोलन बंगाली राष्ट्रवाद की तरह उभरा और 1971 में बांग्लादेश का जन्म हुआ. एक संप्रभु आधुनिक लोकतंत्र में किसी गोंडी आंदोलन की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए 

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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