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Thrissur Pooram 2026: त्रिशूर पूरम 2026 कब है? जानिए पूरम नक्षत्र तिथि और महत्व

Thrissur Pooram 2026: त्रिशूर पूरम हर साल अप्रैल‑मई के महीने में मनाया जाता है और इसका आयोजन त्रिशूर के वडक्कुनाथन मंदिर में होता है. इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं.

Thrissur Pooram 2026: त्रिशूर पूरम 2026 कब है? जानिए पूरम नक्षत्र तिथि और महत्व
Thrissur Pooram 2026
file photo

Thrissur Pooram 2026: केरल में त्रिशूर पूरम एक बहुत बड़ा और रंग‑बिरंगा त्योहार है, जिसे पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है. यह त्योहार करीब 36 घंटे तक चलता है और इसे “सभी पूरमों की जननी” कहा जाता है. त्रिशूर पूरम हर साल अप्रैल‑मई के महीने में मनाया जाता है और इसका आयोजन त्रिशूर के वडक्कुनाथन मंदिर में होता है. इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं. चलिए आपको बताते हैं इस साल त्रिशूर पूरम कब मनाया जाएगा और इसका क्या महत्व है?

त्रिशूर पूरम 2026 की तारीख

  • पूरम नक्षत्र शुरू- 26 अप्रैल 2026, रात 08:27 बजे
  • पूरम नक्षत्र समाप्त- 27 अप्रैल 2026, रात 09:18 बजे
  • मुख्य पर्व- 27 अप्रैल 2026

त्रिशूर पूरम का इतिहास

त्रिशूर पूरम की शुरुआत शक्थन थंपुरान ने की थी, जो 1790 से 1805 तक कोचीन राज्य के महाराजा थे. इस त्योहार की शुरुआत 18वीं सदी के अंत में हुई थी. मंदिर परंपराएं, पारंपरिक वाद्य संगीत, सजे‑धजे हाथी और शानदार आतिशबाजी के कारण इसे “पूरमों की जननी” कहा जाता है. समय के साथ यह त्योहार इतना प्रसिद्ध हो गया है कि आज इसमें देश‑विदेश से लोग शामिल होने आते हैं.

त्रिशूर पूरम का महत्व

त्रिशूर पूरम का मुख्य आराध्य देव वडक्कुनाथन मंदिर के भगवान शिव हैं. यह त्योहार केरल के मलयालम महीने मेदम में मनाया जाता है, जब चंद्रमा पूरम नक्षत्र के साथ आता है. यह सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि केरल में मनाया जाने वाला एक बड़ा सांस्कृतिक उत्सव भी है. इस त्योहार का सबसे खास आकर्षण यह होता है कि त्रिशूर और आसपास के कई मंदिरों के देवी‑देवताओं को एक भव्य जुलूस के रूप में वडक्कुनाथन मंदिर लाया जाता है. इस तरह भगवान वडक्कुनाथन को अन्य मंदिरों के देवताओं द्वारा सम्मान दिया जाता है.

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पूरम को केरल के लोगों के लिए बहुत खास माना जाता है. यह एक बेहद शानदार उत्सव होता है, जिसमें रात भर आतिशबाजी, रंग‑बिरंगा कुडामट्टम (सजावटी छाते) और मशहूर हाथियों की शोभायात्रा देखने को मिलती है. इस उत्सव के लिए देश के सबसे अच्छे और खूबसूरती से सजे हाथियों को त्रिशूर लाया जाता है. आखिरी दिन, पास के तिरुवंबाड़ी मंदिर से हाथियों का जुलूस वडक्कुनाथन मंदिर तक निकाला जाता है. जुलूस के सबसे आगे चलने वाला हाथी भगवान कृष्ण की मूर्ति को लेकर चलता है, जबकि समूह का नेता हाथी देवी की मूर्ति को धारण करता है. यही दृश्य त्रिशूर पूरम की पहचान और सबसे बड़ा आकर्षण माना जाता है.

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