वामन जयंती भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित पर्व है. हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि का अभिमान दूर करने और देवताओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए वामन रूप में अवतार लिया था. इस दिन व्रत रखने के साथ भगवान वामन की पूजा और उनकी कथा सुनने-पढ़ने की परंपरा है. आइए आचार्य मदन मोहन से जानते हैं वामन जयंती की पूजा विधि और इससे जुड़ी कथा.
ऐसे करें भगवान वामन की पूजा
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि 22 सितंबर की रात 9:44 बजे से शुरू हो गया है और यह आज 23 सितंबर की रात 10:51 बजे समाप्त होगी. उदया तिथि के अनुसार वामन जयंती का व्रत 23 सितंबर बुधवार यानी आज रखा जाएगा. इस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें. पूजा स्थल पर चौकी रखकर उस पर पीले या लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और भगवान वामन की प्रतिमा स्थापित करें. इसके बाद गंगाजल का छिड़काव करके पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजाा करें. आचार्य के अनुसार, पूजा में 52 पेड़े और 52 दक्षिणा अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है. पूजा के बाद भगवान को भोग लगाएं और ब्राह्मण को दही-चावल, चीनी और दक्षिणा दान करें.
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क्या है वामन अवतार की कथा

धार्मिक कथा के अनुसार असुरराज बलि ने अपनी शक्ति और तपस्या के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था. देवताओं को उनका अधिकार वापस दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लियाा. वे छोटे कद के ब्राह्मण के रूप में राजा बलि के पास पहुंचे और तीन पग भूमि मांगी. बलि के वचन देते ही भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर लिया. पहले कदम में पृथ्वी और दूसरे में देवलोक नाप लिया. तीसरे कदम के लिए जगह नहीं बची तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दियाा. भगवान ने उनके सिर पर तीसरा कदम रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया.
कथा पाठ के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि वामन जयंती पर भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा करने के साथ उनकी कथा का पाठ या श्रवण करनाा भी शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यताा है कि राजा बलि की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें महाबलि की उपााधि दी.
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