आज यानी 12 जून को भगवान भोलेनाथ को समर्पित प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. हिंदू धर्म में शिव आराधना के लिए प्रदोष व्रत का विशेष महत्व माना जाता है. यह व्रत हर महीने में दो बार आता है- एक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को और दूसरा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को. आज जून महीने का पहला प्रदोष व्रत है, शुक्रवार के दिन पड़ने पर इसे 'शुक्र प्रदोष व्रत' कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
प्रदोष काल का शुभ समय
प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है. मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है. आज, 12 जून को प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 36 मिनट से रात 9 बजकर 40 मिनट तक रहेगा. यानी भक्तों को पूजा-अर्चना के लिए कुल 1 घंटा 44 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा. इस दौरान भगवान शिव का जलाभिषेक करें, बेलपत्र अर्पित करें और माता पार्वती का पूजन करें. प्रदोष व्रत की पूजा में कथा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना गया है.
यहां पढ़ें प्रदोष व्रत की कथापौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मणी अपने छोटे पुत्र के साथ रहती थी. पति के निधन के बाद वह भिक्षा मांगकर अपना जीवन चला रही थी. एक दिन उसे रास्ते में एक घायल युवक मिला. दयालु स्वभाव की ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई और पूरी निष्ठा से उसकी सेवा करने लगी.
वह युवक असल में विदर्भ राज्य का राजकुमार धर्मगुप्त था. शत्रुओं ने उसके पिता को बंदी बनाकर राज्य छीन लिया था, जिसके कारण वह भटकता हुआ वहां पहुंचा था. हालांकि, ब्राह्मणी को इस बात का ज्ञात नहीं था. ब्राह्मणी ने धर्मगुप्त को भी अपने बेटे की तरह ही प्यार दिया और समय के साथ दोनों पुत्र बड़े हो गए.
एक दिन ब्राह्मणी दोनों बच्चों को लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुंची. ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि वह बालक विदर्भ का राजकुमार है. उन्होंने ब्राह्मणी को भगवान शिव की भक्ति करने और प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी.
कुछ समय बाद अंशुमति नाम की गंधर्व कन्या की नजर राजकुमार पर पड़ी और उसने अपने माता-पिता को उससे मिलवाया. उसी दौरान अंशुमति के माता-पिता को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर दोनों का विवाह कराने का आदेश दिया. उन्होंने शिवजी की आज्ञा का पालन करते हुए राजकुमार और अंशुमति का विवाह संपन्न कराया.
उधर, ब्राह्मणी पूरी श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत रखती और भगवान शिव की पूजा करती रही. समय के साथ भगवान शिव की कृपा से उनके जीवन में अच्छे बदलाव आने लगे. गंधर्वों की सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने अपने शत्रुओं को हराकर अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त कर लिया. यह सब कुछ उस प्रदोष व्रत का ही फल था जो ब्राह्मणी ने पूरी निष्ठा से किया था.
मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा, सेवा भाव और भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास से कठिन से कठिन परिस्थितियां भी बदल जाती हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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