Truth and inner strength: सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप, जिस हिरदे में सांच है, ता हिरदै हरि आप. अर्थात् सत्य की तुलना में दूसरा कोई तप नहीं और झूठ के बराबर दूसरा पाप नहीं. जिसके हृदय में सत्य रम गया, वहां हरि का वास सदा रहेगा. संत कबीरदासजी ने इन दो पंक्तियों में जीवन की कड़वी सच्चाई को बखूबी बयां किया है. जीवन में सच कहने का साहस रखना अपने आप में एक महत्वपूर्ण और मानवीय मूल्य है. यह एक ऐसा गुण है जिसे अपनाने से अनेक सद्गुणों की लाइन लग जाती है. जिन लोगों ने सच्चाई के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति, परिस्थिति और प्रकृति के आगे भी घुटने नहीं टेके हैं वही आगे चलकर देवात्मा, धर्मात्मा, पुण्यात्मा और महात्मा कहलाए. ये बात अलग है कि इसकी उन्हें कड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है.
क्या होते हैं जीवन में सत्य के मायने?
जीवन में सच्चाई का मार्ग कांटों भरे रास्ते के समान है. लेकिन जो इस रास्ते में चुभने वाले कांटों के दर्द को सहन करते हुए सदा आगे बढ़ता जाता है, एक दिन उसे इस दर्द के बदले जीवन में आत्म संतोष, आत्म संतुष्टि और आत्मसम्मान की अनुभूति होती है. इसका वर्णन उस मार्ग का राही ही बता सकता है, क्योंकि उसने उन पलों को जिया होता है.
वर्तमान परिवेश में हम देखें तो हर कोई चाहता है कि उसके आसपास के लोग सच्चाई सम्मत व्यवहार करें. उसके अपने नेक राह पर चलें, लेकिन जब यही बात खुद पर आती है तो नकार दिया जाता है.
हम चाहते हैं कि समाज से भ्रष्टाचार, घूसखोरी खत्म हो पर शुरुआत पड़ोसी के घर से हो? हमें हर व्यक्ति राजा हरिश्चंद्र की तरह मिले, पर हम खुद नहीं बनना चाहते? बच्चों को सिखाते हैं सदा सच बोलो, पर हम ही उनके सामने झूठ बोलते हैं? हम चाहते हैं देश और समाज में भगत सिंह जैसे वीर पुरुष और हरिश्चंद्र जैसा ईमानदार बालक पैदा हो, पर पड़ोसी के घर में. हम सभी को ये सोच बदलना होगी. सच्चाई के रास्ते पर आप एक कदम बढ़ाइए कारवां अपने आप बनता जाएगा.
कांटों भरा होता है सत्य का मार्ग
हाल ही की एक घटना है जो सच्चाई के मूल्य को बखूबी बयां करती है. एक मल्टीनेशनल कंपनी में एक कर्मचारी पिछले ३५ साल से अपनी सेवाएं दे रहा था. जब उसने कंपनी में अपनी सेवाएं देना शुरू की थी उस समय वह छोटे रूप में थी और अपनी आंखों के सामने कंपनी को नई ऊंचाइयों के शिखर पर पहुंचते देखा. उस कर्मचारी का कंपनी के प्रति समर्पण भाव, ईमानदारी और सच्चाई इस हद तक थी कि एक रुपए भी व्यर्थ खर्च होने से बचाता. बिना घंटे देखे दिन-रात अपनी सेवाएं देता.
एक दिन उसे कंपनी के किसी बड़े अधिकारी पर गड़बड़ी के आरोप लगाने के आरोप में लिप्त पाया जाना बताकर सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं. मामला प्रबंधन के पास पहुंचता है और रफा-दफा कर दिया जाता है. ये बात अलग है कि प्रबंधन को मामले की तह तक पहुंचना था ताकि सच्चाई सामने आ सके. हो सकता है वह कर्मचारी सही हो. ये भी हो सकता है कि आरोप झूठे हों. पर एक संतुलित न्याय व्यवस्था के तहत सच्चाई को बिना जांचे-परखे कोई ठप्पा नहीं लगाया जा सकता है. हालांकि समय के साथ ईश्वर की अदालत में उसे न्याय मिलता है.
हमेशा कमजोर होती है झूठ के इमारत की नींव
इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो सच्चाई की आवाज उठाने वालों को हर समय में तमाम विरोधों का सामना करना पड़ा है. यदि आप किसी तंत्र का हिस्सा हैं और सच्चाई की आवाज उठाते हैं तो यह जरूरी नहीं है कि आपकी बात आसानी से मान ली जाएगी. जिसने सिद्धांतों पर रहते हुए जीवन मूल्यों के साथ नेक रास्ते का वरण किया है उसे सच्चाई की कीमत चुकानी ही पड़ी है.
कहते भी हैं सच की नाव हिलती-डुलती है पर डूबती नहीं है. यही वो पल या घड़ी होती है जब हमारे निश्चय, दृढ़ संकल्प और आत्म विश्वास की परीक्षा होती है. यदि जीवन में सच की नींव है तो कितना भी बड़ा भवन हो, उसे कोई भी आंधी-तूफान गिरा नहीं सकता है. वहीं झूठ की इमारत बाहर से कितनी भी सुंदर बनी हो उसकी नींव हमेशा कमजोर ही रहती है. वह हवा के एक झोकें में पत्तों की तरह बिखर जाती है.
खुद के प्रति और खुदा के प्रति भी बनें सच्चे...
जीवन में खुद के प्रति भी सच्चे बनना जरूरी है. जब हमारे विचारों में, सोच में सच्चाई-सफाई और ईमानदारी की झलक होगी तो स्वाभाविक रूप से कर्मों में भी सच्चाई दिखेगी. वहीं खुदा, परमात्मा के प्रति, उनकी शिक्षाओं और श्रीमत के प्रति भी सच्चाई का भाव होना जरूरी है. परमात्मा भी कहते हैं मुझे होशियार नहीं सच्चे बच्चे ज्यादा पसंद हैं. जीवन का मूल्य तभी है जब हमारे विचारों और कर्मों में कहीं न कहीं सच्चाई की झलक हो.
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बिना मूल्यों के जीवन पशु के समान है. यदि आपने कोई विशेष गुण अपनाने या धारण करने का संकल्प किया है तो उस पर अडिग बने रहें, दृढ़ निश्चय के साथ प्रभु पिता को साथी बनाकर बढ़ते जाएं. विघ्न, बांधाएं, परिस्थितियां रास्ते में रोड़े बनकर आएंगी, लोग मजाक बनाएंगे पर एक दिन वह भी आता है जब सच की रोशनी में झूठ का अंधकार विलीन हो जाता है. फिर ऐसे बच्चों पर परमात्मा को भी नाज होता है... वाह मेरे बच्चे... वाह.
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