Interesting facts on Puri Jagannath Rath Yatra: प्राचीन सप्तपुरियों में से एक पुरी नगरी में हर साल आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया पर सारे जगत के नाथ कहलाने वाले भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलती है. जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा के साथ तीन बड़े रथों में सवार होने के बाद अपनी मौसी गुंडिचा से मिलने के लिए निकलते हैं. रथयात्रा में निकलने वाला भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और उनकी बहन गुंडिचा के रथ की क्या खासियत होती है? इसे कौन लोग और कब तैयार करते हैं? आइए रथयात्रा के तीन प्रमुख रथों का पूरा रहस्य विस्तार से जानते हैं.
भगवान जगन्नाथ का रथ

सारे जगत के नाथ कहलाने वाले भगवान जगन्नाथ या फिर कहें भगवान श्री कृष्ण का रथ सभी रथों में बड़ा होता है. इसे नंदीघोष कहते हैं और यह 44.2 फीट ऊंचा होता है. भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिए होते हैं. लाल और पीले रंग के कपड़े से सुसज्जित इस नंदीघोष रथ में शंख, बलाहक,श्वेत, हरिदश्व नामक सफेद रंग के घोड़े लगे रहते हैं. भगवान के रथ के उपर त्रिलोक्यमोहिनी ध्वज लगा हुआ होता है. भगवान जगन्नाथ के रथ के सारथी दारुक और रक्षक स्वयं गरुण देव होते हैं. वहीं इसमें जय और विजय नाम के द्वारपाल होते हैं. रथ यात्रा में सबसे पीछे चलने वाला भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे बड़ा होता है. भगवान जगन्नाथ का रथ धर्म और विजय का प्रतीक माना जाता है.
भगवान बलभद्र का रथ

पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा में निकलने वाले भगवान बदभद्र के रथ का नाम तालध्वज है. इस रथ में कुल 14 पहिये लगे होते हैं. यह लाल और हरे रंग के कपड़ों आदि से सुसज्जित तकरीबन 44 फीट ऊंचा होता है. पुरी की रथ यात्रा में सबसे आगे भगवान बलभद्र का रथ चलता है. बलभद्र के रथ को बनाने में तकरीबन 763 लकड़ियों का प्रयोग होता है. भगवान बलभद्र के रथ में 9 सहायक देवता और सात ऋषि होते हैं. इसमें नंद और सुनंद नाम के दो द्वारपाल होते हैं. भगवान बलभद्र का रथ तालध्वज बल और शक्ति का प्रतीक माना जाता है.
देवी सुभद्रा का रथ

रथयात्रा में निकलने वाला देवी सुभद्रा के रथ को देवदलन, दर्पदलन और पद्मध्वज कहा जाता है. यह लाल और काला या फिर कहें गहरे नीले रंग के कपड़ों आदि से सुसज्जित 43 फीट ऊंचा होता है. सुभद्रा जी के रथ में 12 पहिए होते हैं, जिसमें उनके सारथी स्वयं उनके पति यानि अर्जुन होते हैं. रथ यात्रा के दौरान देवी सुभद्रा का रथ भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के रथ के बीच में चलता है. देवी सुभद्रा की रक्षक जयदुर्गा और द्वारपाल गंगा और यमुना होती हैं. सुभद्रा जी के रथ में नादम्बिका नामक ध्वज लगा रहता है. दर्पदलन नामक इस रथ में चार लाल रंग के घोड़े - रोचिका, मोचिका, जीता और अपराजिता लगे हुए रहते हैं. देवी सुभद्रा का रथ देवदलन अहंकार के दमन का प्रतीक माना जाता है.
तब ऐसे तैयार होता है रथ

रथ यात्रा के लिए इन तीनों रथों का निर्माण भगवान जगन्नाथ मंदिर के समीप 'बड़-दांड़' यानि महापथ पर किया जाता है. इन रथों को बनाने के लिए दो साल पूर्व दासापल्ला और बानापुर के जंगलों से 'साल' और 'सखुआ' की लकड़ी के 1072 टुकड़े लाए जाते हैं. यह कार्य रथोत्सव से ठीक 5 महीने पहले सरस्वती पूजा के दिन से प्रारंभ हो जाता है. रथ को बनाने का काम शिल्पकार 53 से 59 दिनों में पूरा कर लेते हैं.
रथों के खीचने का धार्मिक महत्व

हिंदू मान्यता के अनुसार पुरी में निकलने वाली रथ यात्रा में लकड़ी के तीन रथों को खींचने का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. मान्यता है कि जो कोई व्यक्ति आस्था और श्रद्धा के साथ कीर्तन करता हुआ इन रथों को खींचता है, उसे 100 यज्ञों के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है.
मान्यता यह भी है कि रथ को खींचने वाले व्यक्ति के जाने-अनजाने में किए गये सारे पाप दूर हो जाते हैं और वह अनंत सुख को प्राप्त करता है. भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा 9 दिनों तक चलती है और इसकी वापसी को बहुदा यात्रा कहते हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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