सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है. पितृपक्ष 16 दिनों तक चलता है. इस दौरान पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे. इस साल पितृपक्ष की शुरुआत आज शनिवार, 26 सितंबर से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पितरों का तर्पण करने से पहले कुछ महान ऋषि-मुनियों का तर्पण किया जाता है? बेहद कम लोगों को पता है कि श्राद्ध की शुरुआत सीधे पितरों से नहीं, बल्कि ऋषियों की पूजा से होती है.
पितृपक्ष में ऋषियों का तर्पण क्यों जरूरी?
ब्रह्मपुराण के अनुसार, पूर्वजों की पूजा करने से पहले देवताओं की पूजा करनी चाहिए और ऋषियों का स्मरण करना चाहिए. जिस तरह किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है. ऐसे ही पितृपक्ष के तर्पण की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा के दिन अगस्त्य ऋषि के पूजन और तर्पण से होती है. इस दिन ऋषि अगस्त्य के नाम से तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है.
अगस्त्य मुनि की कथा
प्राचीन काल में आतापी और वातापी नाम के दो क्रूर असुर भाई थे. आतापी के पास एक मायावी शक्ति थी, वह किसी भी मरे हुए प्राणी को आवाज देकर जीवित कर सकता था. वहीं वातापी किसी भी प्राणी का रूप धारण कर सकता था. दोनों भाइयों ने ऋषि-मुनियों को मारने के लिए तरीका निकाला. वातापी बकरे या भोजन का रूप ले लेता और आतापी किसी ऋषि को भोजन के लिए आमंत्रित करता. जैसे ही ऋषि वह भोजन खा लेते, आतापी वातापी को आवाज लगाता और वातापी ऋषि का पेट फाड़कर जीवित बाहर निकल आता. फिर दोनों असुर उस मृत ऋषि को अपना भोजन बना लेते. ऐसे ही उन्होंने सैकड़ों ऋषियों की हत्या कर दी.
इससे परेशान होकर सभी ऋषि-मुनि महर्षि अगस्त्य के पास मदद लिए पहुंचे. अगस्त्य मुनि एक दिन दोनों असुरों के पास गए. योजना के अनुसार, आतापी ने वातापी को काटकर कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और अगस्त्य मुनि को परोसे. मुनि ने सारा भोजन ग्रहण कर लिया. भोजन के बाद आतापी ने अपने भाई वातापी को आवाज लगानी शुरू की, लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ. मुनि ने तुरंत एक अंजुली जल को अभिमंत्रित करके पी लिया और कहा, "जिसे तुम आवाज दे रहे हो, वह अब कभी बाहर नहीं आएगा, क्योंकि मैंने उसे पचा लिया है. यह सुनकर आतापी डर गया और क्रोधित होकर मुनि पर हमला करने दौड़ा, लेकिन महर्षि अगस्त्य ने अपने तपोबल से उसे वहीं भस्म कर दिया. वह दिन भाद्रपद पूर्णिमा का था. दोनों असुरों के अंत के बाद से ही पितृपक्ष के पहले दिन अगस्त्य मुनि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा के नाम से तर्पण करने की परंपरा शुरू हुई.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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