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Muharram 2026: मोहर्रम क्यों मनाया जाता है? जानें मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन अस की शहादत से जुड़ी पूरी दास्तान

Ndtv की खास पेशकश मोहर्रम की दास्तां में हमने आपको करबला के कुछ शहीदों के बारे में जानकारी दी... लेकिन इस बार उस शहीद का जिक्र करेंगे जिसकी वजह से मोहर्रम मनाया जाता है.. जो सबका लाशा उठा कर खेमों तक लाया लेकिन उसका लाशा उठाने वाला कोई नहीं रहा..

Muharram 2026: मोहर्रम क्यों मनाया जाता है? जानें मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन अस की शहादत से जुड़ी पूरी दास्तान
Muharram 2026: इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की अनसुनी दास्तां
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Muharram 2026 Significance: मुहर्रम का चांद जैसे ही दिखाई देता है, दुनिया भर के करोड़ों दिलों में एक दर्द जाग उठता है...काले लिबास निकल आते हैं..मजलिसों मातम की आवाज़ें गूंजने लगती हैं..हर आंख नम हो जाती है. क्योंकि यह वही महीना है जिसमें नबी के नवासे, जन्नत के जवानों के सरदार, इमाम हुसैन (Imam Hussain)को कर्बला की तपती रेत पर शहीद कर दिया गया था.. जिसमें उनके साथ 72 साथी थे. जिसमें उनका एक छह महीने का बेटा अली असग़र भी था, जो तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद हो हुआ..

आखिर मुहर्रम में ऐसा क्या हुआ था?

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61 हिजरी थी..इस्लाम का नाम तो था, लेकिन उसकी रूह को मिटाने की कोशिश की जा रही थी...

यज़ीद इब्ने माविया चाहता था कि हुसैन (अ.स.) इब्ने हजरत अली अस उसके हाथ पर बैअत कर लें..वो जैसे चाहता था उसके अनुसार ही सब हो.. वो जुमे की नमाज बुध को पढ़ने के लिए कहता था.. वही हर बुरे काम को जायज बताता था.. यानी उसका मकसद इस्लाम को बदनाम करना था.. जिससे वो हर बुरे काम करे और दुनिया ये सीधे देखे कि इस्लाम में इस तरह से गलत काम होता है, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) जानते थे कि अगर उन्होंने सिर झुका दिया यानि इसकी बात मानली तो सच हमेशा के लिए हार जाएगा..किसी भी मजलूम को हक नहीं मिलेगा.. 

इसलिए उन्होंने वह फैसला किया जिसने इतिहास बदल दिया..

उन्होंने कहा—

"मुझ पर जैसा इंसान यज़ीद जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं कर सकता."

कर्बला का वीरान मैदान

2 मुहर्रम को हुसैन (अ.स.) का काफ़िला कर्बला पहुंचा.

सिर्फ़ 72 वफ़ादार साथी...

कुछ बुज़ुर्ग...

कुछ नौजवान...

कुछ बच्चे...

और कुछ ऐसी मासूम बच्चियां जिनके हाथों में गुड़िया होनी चाहिए थी..उनके हाथों में प्यास के लिए मश्किजे थे..

दूसरी तरफ हजारों यजीद इब्ने माविया के सैनिकों की फौज खड़ी थी
लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) को अपनी जीत के लिए सेना नहीं, अल्लाह पर भरोसा था..

तीन दिन की प्यास

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7 मुहर्रम को फ़ुरात का पानी बंद कर दिया गया..

बच्चों के होंठ सूखने लगे..

सकीना (स.अ.) बार-बार पूछती थीं:

"बाबा... पानी कब मिलेगा?"

अली असग़र (अ.स.) प्यास से तड़प रहे थे.

ख़ेमों में सिर्फ एक आवाज़ सुनाई देती थी—

"अल-अतश... अल-अतश..."
(प्यास... प्यास...)

लेकिन हुसैन (अ.स.) ने फिर भी ज़ुल्म के सामने सिर नहीं झुकाया.

आशूरा की सुबह

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10 मुहर्रम की सुबह आ गई.. 

एक-एक करके इमाम हुसैन के साथी मैदान में गए..

हजरत क़ासिम गए...

हजरत अली अकबर गए...

हजरत अब्बास (Hazrat Abbas) गए... 
एक एक करके 71 साथी शहीद हो गए.. जिनमें से कुछ वो शहीद थे जो यजीद की फौज की तरफ से नमाज पढ़ते वक्त में तीरों से हमले की वजह से शहीद हो गए.. उस यजीद और उम्र इब्ने साद के हुक्म की वजह से इमाम हुसैन के ऊपर नमाज पढ़ते वक्त तक भी हमला हुआ.. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या कोई मुसलमान कभी नमाज के वक्त भी हमला रहता है..यानि इससे साफ दिखता है कि मुसलमान के नकाब के साये में इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश की जा रही थी..
इमाम हुसैन हर शहीद के लाशे पर जाते..और फिर हर बार हुसैन (अ.स.) अकेले लौटते रहे..

हर शहादत के साथ उनका दिल टूटता रहा..

लेकिन उनका सब्र नहीं टूटा.

जब अली असग़र शहीद हुए

हुसैन (अ.स.) अपने छह महीने के बेटे को गोद में लेकर दुश्मन के सामने आए.

उन्होंने कहा:

"अगर मुझसे दुश्मनी है तो इस बच्चे को पानी दे दो."

लेकिन जवाब में एक तीर चला.

और वह तीर मासूम अली असग़र (अ.स.) के गले में आकर लगा.

एक पिता की गोद में उसका बच्चा शहीद हो गया.

इतिहास में इससे बड़ा दर्द शायद ही कहीं मिलता हो.

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अब हुसैन अकेले थे

अब कोई भाई नहीं था.

कोई बेटा नहीं था.

कोई भतीजा नहीं था.

कोई साथी नहीं था.

चारों तरफ लाशें थीं.

और बीच में अकेले हुसैन (अ.स.).

उन्होंने आख़िरी बार ख़ेमों की तरफ देखा.

बेटी सकीना की याद आई.

बहन ज़ैनब की याद आई.

फिर अल्लाह की बारगाह में सिर झुका दिया.

आख़िरी सज्दा

ज़ख्मों से भरा जिस्म...

तीन दिन की प्यास...

अपनों का ग़म...

लेकिन हुसैन (अ.स.) की ज़ुबान पर शिकायत नहीं थी.

वह अपने रब के सामने सज्दे में थे.

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यही वह सज्दा था जिसने कर्बला को अमर बना दिया.. जैसे ही इमाम हुसैन मैदान में पहुंचे तो उन्होंने कहा कि तुम लोग क्यों गुमराह हो रहे हो यजीद के साथ रह कर.. क्या तुम भूल गए कि हजरत मोहम्मद साहब का मैं नवासा हूं, मैं उनके पीठ तक पर झुला हूं.. मुझे उन्होंने जन्नत का सरदार बनाया है.. तुम लोग कौन सी जन्नत में जाना चाहते हो.. तुमने मेरे सभी साथियों को शहीद कर दिया..लेकिन इमाम हुसैन की तकरीर के बाद भी उन ज़ालिम फौज पर कोई असर नहीं हुआ .. और उन पर उन्हें मारने का आदेश आ गया.. 

बस फिर क्या सभी ने इमाम हुसैन को चारो तरफ से घेर लिया.. इमाम हुसैन ने अपने बाबा को याद करते हुए अपनी जंग दिखाई... दुश्मनों ने सोचा इस तरह इमाम हुसैन नहीं शहीद हो पाएंगे इन्हें चारों तरफ से घेर कर हमला किया जाए.. 
तीन दिन के भूखे प्यासे इमाम हुसैन को चारो तरफ से घेर लिया जाता है.. कोई तलवार से हमला कर रहा है तो कोई अब तीर से.. कोई नेजा मार रहा तो कोई बरछी से.. जुल्म की इंतहा तब हो गई जिसके पास कुछ न था वो भी जमीन से उठा कर पत्थर इमाम हुसैन कर मार रहा था..

बस..तलवारें चलती रहीं.. और एक वक्त ये आया कि इमाम हुसैन पर तीरों की बारिश हो गई..इमाम हुसैन अपने घोड़े से अब जमीन पर आने वाले हैं.. लेकिन उनके बदन पर इतने तीर है कि न उनका लाशा जमीन पर था न आसमान की तरफ.. जैसे ही वो घोड़े से गिरे तो पूरे बदन के तीर जिस्म से आर पार हो गए..जब इमाम हुसैन की शिमर नाम का ज़ालिम गर्दन कांट रहा था तो वो गर्दन तकरीबन 18 बार वार करके कटी.. वो भी गर्दन के पीछे से नहर किया.. वहीं 70 कदम की दूरी पर इमाम हुसैन की बहन जनाबे ज़ैनब खड़े सब देख रही थी.. जिसे आज भी टिल्ला ए जैनबिया कहा जाता है...

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नेज़े चलते रहे...

लेकिन हुसैन (अ.स.) का संदेश नहीं मरा...

हुसैन मरकर भी ज़िंदा हैं..

आज 1400 साल से ज्यादा समय गुजर चुका है..

यज़ीद का नाम लोग नफरत से लेते हैं..

लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम सुनकर करोड़ों आंखें भर आती हैं..

क्योंकि हुसैन (अ.स.) सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि सत्य, सब्र और कुर्बानी का नाम हैं..
इसीलिए लोग उनकी याद में इराक के कर्बला जाते है ..और उस शहादत यानि 10 मोहर्रम के  40 दिन बाद चेहल्लुम इमाम हुसैन का मनाया जाता है.. जिसमें दुनिया भर से इमाम हुसैन के चाहने वाले अरबईन पर करबला आते थे..

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सलाम या हुसैन

जब भी मुहर्रम आता है, ऐसा लगता है जैसे कर्बला फिर से आंखों के सामने आ गई हो.

प्यासे बच्चे...

टूटा हुआ अलम...

अब्बास की वफ़ा...

अली अकबर की जवानी...

अली असग़र की मासूमियत...

और सज्दे में शहीद होने वाले हुसैन...

दिल से बस एक ही आवाज़ निकलती है—

"सलाम या हुसैन..."

"सलाम उस शहज़ादे पर जिसने अपना सब कुछ देकर इंसानियत को ज़िंदा कर दिया."

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