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80 किमी का पैदल सफर और 2 करोड़ जायरीन... अरबईन वॉक के बारे में आप कितना जानते हैं?

मोकिब में मुफ्त में खाना, पानी, चाय, आराम की जगह, दवाइयां और साफ-सफाई की सुविधा मिलती हैं. किसी से भी कोई पैसा नहीं लिया जाता.

80 किमी का पैदल सफर और 2 करोड़ जायरीन... अरबईन वॉक के बारे में आप कितना जानते हैं?
अरबईन वॉक हजारों की संख्या में पहुंचे लोग
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हर साल की तरह इस साल भी अरबईन के मौके पर 160 से ज्यादा देशों के नागरिकों ने  Arbaeen Walk में हिस्सा लिया और 80 किमी तक पैदल शांतिपूर्ण यात्रा की.

इराक के पवित्र शहर करबला में हर साल इमाम हुसैन के चालीसवें के मौके पर श्रद्धालु आते हैं. इस साल भी हजरत अब्बास हॉली श्राइन द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक 1 करोड़ 99 लाख 99 हजार 870 श्रद्धालु पहुंचे हैं, यानि तकरीबन 2 करोड़ (20 M) जायरीन कर्बला पहुंचे. ये आंकड़ा AI के जरिए श्राइन के आसपास आये हुए लोगों का है. यह दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक शांतिपूर्ण प्रोग्राम बन चुका है.

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हालांकि करबला के गवर्नर नासिफ जसीम अल खत्ताबी का कहना है कि इस साल तकरीबन 22 मिलियन से ज्यादा जायरीन आए हैं जिनमें 5 मिलियन से ज्यादा नॉन इराकी थे, साथ ही कोई भी भगदड़ या आतंकी हमला नहीं हुआ है. वहीं करबला में श्राइन से एसोसिएट आगा सुल्तान ने ए़नडीटीवी से खास बातचीत में कहा कि किसी को भी कोई असुविधा न हो, इसका पूरा ख्याल रखा जाता है, यहां महिला-पुरुष सभी आते हैं,सबके लिए बहुत अच्छी तरह से बंदोबस्त किया जाता है जिससे कोई भी भगदड़, कोई परेशानी न हो. कदम कदम पर मेडिकल की सुविधाएं होती हैं कि किसी भी इमरजेंसी के वक्त फौरन मरीज को इलाज मिल सके, वहीं नजफ से लेकर करबला तक मोकिबों में हर ज़व्वार के लिए सुविधाएं होती हैं.

मोकिब क्या होते हैं?

15817 मोकिब इराक में नजफ से लेकर करबला यानी 80 किमी तक लगे हुए हैं. अब आप ये सोच रहे होंगे कि आखिर ये मोकिब क्या होते हैं, तो आइए बताते हैं. अरबईन की सबसे खास बात मोकिब हैं.रास्ते में जगह-जगह टेंट और कैम्प लगाए जाते हैं, इन्हें मोकिब कहते हैं. कई इराकी अपने घरों के अंदर ही मोकिब बना देते हैं जिससे सब जायरीन आसानी से आराम, खाना पीना कर सके.

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मोकिब में मुफ्त में खाना, पानी, चाय, आराम की जगह, दवाइयां और साफ-सफाई की सुविधा मिलती हैं. किसी से भी कोई पैसा नहीं लिया जाता. इराकी और दूसरे देशों के लोग इमाम हुसैन के प्यार में ये सेवा करते हैं. हजारों मोकिब रात-दिन काम करते हैं. छोटे छोटे बच्चे आपको पानी पिलाएंगे, कोई आपका पसीना साफ करेगा तो कोई आपके पैर दबाएगा.वो आपसे विनती करेंगे कि प्लीज़ मेरे मोकिब पर आराम करें, सुकून से रहें, खाना पानी खाएं और जब आप वापस जाएंगे तो अपनी आंखें बिछा कर आपको अलविदा करेंगे.

वहीं भारत के भी इस बार कई मोकिब नजर आए जिसमें 201 पॉल पर खादिमन ए बाबुल हवाएज, 327 पॉल पर करवान ए हिन्द समेत 425,536,603,655,709,720,750,777,816,820,974,1005,1144 पॉल पर भारतीय मोकिब लगे थे. पूरे 80 किमी के दायरे में कोई ऐसी जगह नहीं होगी जहां कोई सेवा करते हुए न मिलें. इसमें ये कहें कि सेवा लेने वाले कम हो जाते बल्कि सेवा देने वाले ज्यादा.

अरबईन क्या होता है?

अरबईन का मतलब है चालीसवां दिन. इमाम हुसैन (अ.स.) अपने 72 साथियों के साथ मुहर्रम महीने की 10 तारीख को कर्बला में शहीद हुए थे. उनकी शहादत के 40 दिन बाद यानि इस्लामिक कैलेंडर के सफर महीने की 20 तारीख को अरबईन मनाया जाता है. इस साल यह 4 अगस्त 2026 को पड़ा. इस दिन लोग इमाम हुसैन की शहादत और उनपे हुए जुल्म को याद करके रोते हैं, साथ ही इमाम हुसैन की कुर्बानी, हिम्मत और सच्चाई के संदेश को याद करने का काम करते हैं..लोग कहते हैं– “हम हमेशा हक़ के साथ हैं".

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वैसे इस बार ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आरागची भी अरबईन वॉक में शामिल हुए थे. एनडीटीवी भारत का पहला ऐसा चैनल है जिसने अपने कैमरे में अब्बास आरागची को कैद किया और इस अरबईन को कवर करने इराक पहुंचा. वहीं अब्बास आरागची की टीम ने एनडीटीवी से कहा कि उनका मकसद यहां इमाम हुसैन के श्राइन की ज़ियारत करना है जिसके बाद वो श्राइन के चीफ क्लेरिक और कई अधिकारियों से भी मिलें.

अरबईन वॉक में दिखें आयतुल्लाह खामेनई के पोस्टर

28 फरवरी को आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद जहां ईरान में उनकी तदफीन हो चुकी लेकिन इराक में भी उनके चाहने वालों की जमकर तादात थी. कई लोग उनकी फोटो लिए पैदल वॉक करते हुए नजर आए, वहीं जगह जगह उनकी फोटो भी नजर आई. वहीं उनके समर्थन में भी नारे लगे तो अमेरिका इजरायल के खिलाफ भी विरोध में नारे लगते हुए नजर आए.वहीं फिलिस्तीन की याद में भी पोस्टर और मोकिब लगे हुए थे.

अरबईन का क्या है इतिहास 

करीब 1400 साल पहले कर्बला की जंग हुई थी जिसमें मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथी यजीद के अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए. इस 72 में इमाम हुसैन का छह महीने का बेटा हजरत अली असग़र भी था. 10 मोहर्रम को दुनियाभर में आशूरा मनाया जाता है. आशूरा के चालीस दिन बाद पैगंबर के साथी जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी कर्बला आए और कब्रों पर हाजिर हुए. उसी दिन से अरबईन की याद शुरू हुई और चालीसवें को अरबईन की शक्ल में मनाया गया.

वहीं सद्दाम हुसैन के जमाने में यह यह यात्रा रोक दी गई थी. तब भी बड़ी मुश्किल और जुल्म सहकर भी कुछ लोग अरबईन मानने जाते थे. लेकिन सद्दाम के बाद यानि 2003 के बाद फिरसे अरबईन यात्रा शुरू हुई और साल दर साल बढ़ती गई. अब हर साल करीब 2 करोड़ लोग आते हैं.

जायरीन कैसे आते हैं?

ज्यादातर लोग नजफ से पैदल चलकर कर्बला पहुंचते हैं.दूरी करीब 80 किलोमीटर है. गर्मी में भी बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा पैदल चलते हैं. इस बार तकरीबन 50 डिग्री तामपान था लेकिन तब भी लोगों के हौसले न रुकें और उन्होंने इमाम हुसैन की याद में अरबईन वॉक की. लोग इराक, ईरान, भारत, पाकिस्तान और दुनिया के 160 से ज्यादा देशों से यहां आते हैं. रास्ते में “लब्बैक या हुसैन” के नारे गूंजते हैं. कर्बला पहुंचकर इमाम हुसैन और हजरत अब्बास के श्राइन पर हाजिर होते हैं.

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