भगवान श्रीकृष्ण की छवि सामने आते ही सिर पर सजा मोरपंख और हाथ में बांसुरी याद आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कृष्ण के मुकुट में मोरपंख को इतना खास स्थान क्यों मिला. धार्मिक परंपराओं में इसे सिर्फ श्रृंगार नहीं, बल्कि प्रेम, प्रकृति, सादगी और विनम्रता से जुड़ा प्रतीक माना गया है.
कृष्ण के जीवन से जुड़ा है मोरपंख
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि मोरपंख भगवान कृष्ण के प्रकृति प्रेम और सरल व्यक्तित्व का प्रतीक मााना जाता है. ब्रज की प्रचलित मान्यताओं में कहा जाता है कि कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर मोर नाचते थे और उनके पंख गिरने पर कृष्ण उन्हें अपने मुकुट में धारण कर लेते थे.
सादगी और विनम्रता का संदेश
उन्होंने आगे बताया कि कृष्ण के मुकुट में सोने या किसी महंगे रत्न के बजाय मोरपंख दिखाई देता है. धार्मिक व्याख्याओं में इसे इस बात का संकेत माना जाता है कि सुंदरता और महानता केवल बाहरी वैभव में नहीं होती. मोरपंख सादगी के सााथ विनम्र रहने का संदेश देता है.
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प्रेम और प्रकृति का प्रतीक
मोरपंख को कृष्ण और ब्रज की प्रकृति के संबंध से भी जोड़ा जाता है. कुछ ब्रज परंपराओं में इसे राधा-कृष्ण के प्रेम की याद और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. हालांकि इसके पीछे अलग-अलग लोक मान्यताएं प्रचलित हैं, इसलिए इन्हें धार्मिक परंपरा के रूप में ही समझना चाहिए.
मोरपंख का क्या है असली संदेश
पंडित कौशल पांडे ने बताया कि मोरपंख का महत्व केवल इसे घर में रखने या किसी विशेष लाभ से जोड़ने तक सीमित नहीं है. इसका बड़ा संदेश है कि इंसान जीवन में प्रेम, प्रकृति से जुड़ाव, सादगी और अहंकार से दूरी को अपनाए. यही कृष्ण के मोरपंख का सबसे सुंदर आध्यात्मिक अर्थ माना जाता है.
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