सावन का महीना आते ही देशभर में भगवान शिव की भक्ति का रंग चढ़ने लगता है. इसी दौरान निकलने वाली कांवड़ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भगवा वस्त्र पहनकर पवित्र नदियों से जल लाते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवड़िए ज्यादातर भगवा रंग के कपड़े ही क्यों पहनते हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय बताते हैं कि इसके पीछे सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व भी जुड़ा है.
त्याग, तपस्या और भक्ति का प्रतीक है भगवा रंग
पंडित कौशल पांडेय के अनुसार सनातन धर्म में भगवा रंग त्याग, तपस्या, सेवा और भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि साधु-संत भी इसी रंग के वस्त्र धारण करते हैं.
शिव भक्ति में पूर्ण समर्पण का संदेश
कांवड़ यात्रा के दौरान भगवा वस्त्र यह दर्शाते हैं कि श्रद्धालु कुछ समय के लिए सांसारिक मोह-माया से दूर होकर पूरी श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना में जुट गया है. यह रंग भक्ति और संकल्प का प्रतीक माना जाता है.
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ऊर्जा और सात्विकता का भी प्रतीक
मान्यता है कि भगवा रंग व्यक्ति के भीतर आत्मबल, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाता है. यात्रा के दौरान कांवड़िए संयम, ब्रह्मचर्य और सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं. जिसमें भगवा वस्त्र उनकी साधना का हिस्सा बन जाते हैं.
एकता और अनुशासन की पहचान
भगवा वस्त्र कांवड़ियों के बीच एकता, अनुशासन और सेवा की भावना को भी मजबूत करते हैं. यही वजह है कि पूरी यात्रा के दौरान श्रद्धालु एक जैसी वेशभूषा में नजर आते हैं.
इन नियमों का भी करना होता है पालन
भगवा वस्त्र धारण करने वाले कांवड़ियों को मांस-मदिरा का त्याग, झूठ से दूरी और ब्रह्मचर्य का पालन करने की सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन्हीं नियमों के साथ की गई कांवड़ यात्रा अधिक फलदायी मानी जाती है.
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