देशभर में आज 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जा रही है. जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और रात 12 बजे कान्हा के जन्म के समय विशेष पूजा करते हैं. जन्माष्टमी से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जिनमें से एक खीरा काटने की रस्म भी बहुत खास मानी जाती है. जन्माष्टमी पर खीरा काटने को कई जगहों पर ‘नाल छेदन' कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खीरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रतीक माना जाता है और इसे काटकर उनके जन्मोत्सव की रस्म पूरी की जाती है. यह परंपरा विशेष रूप से उत्तर भारत के कई घरों में आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.
नाल छेदन का रहस्य क्या है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खीरे को मां के गर्भ और जन्म से जुड़ा प्रतीक माना जाता है. जब रात 12 बजे यानी भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होता है, तब खीरे को चीरने या काटने की रस्म निभाई जाती है. इसे प्रतीकात्मक रूप से नाल छेदन से जोड़कर देखा जाता है. खीरे का डंठल शिशु की गर्भनाल जैसा माना जाता है. रात 12 बजे जब श्रीकृष्ण का जन्म होता है, तब सिक्के या सलाई की मदद से खीरे के डंठल को अलग किया जाता है, जिसे नाल छेदन यानी गर्भनाल काटने की रस्म कहते हैं.
जन्माष्टमी पर खीरा कैसे चढ़ाएं?
इसे भगवान श्रीकृष्ण के सामने रखें और जन्म के समय पूजा की परंपरा के अनुसार काटें. डंठल अलग होते ही घंटी, शंख बजाकर और "हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की" बोलकर नंदलाल का जन्मोत्सव मनाएं. इसके साथ माखन-मिश्री, फल, मिठाई और तुलसी दल का भोग लगाएं. भगवान को नए वस्त्र पहनाएं और फूलों से सजाएं.
जन्माष्टमी की सही पूजन विधि
रात 12 बजे भागवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं. इसके बाद उन्हें साफ वस्त्र पहनाकर झूले में विराजमान करें. धूप-दीप जलाएं, मंत्रों का जाप करें और आरती करें. इसके बाद प्रसाद बांटें.
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