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'उसने एक बार मेरे साथ बुरा किया, मैंने 30 साल खुद के साथ', बहन बीके शिवानी ने बताया मेडिटेशन से कैसे बदली लाइफ

BK शिवानी ने एक महिला की कहानी शेयर की, जिसने 30 साल पुराने दर्द को मेडिटेशन और सही सोच की मदद से पीछे छोड़कर अपनी जिंदगी बदल दी.

'उसने एक बार मेरे साथ बुरा किया, मैंने 30 साल खुद के साथ', बहन बीके शिवानी ने बताया मेडिटेशन से कैसे बदली लाइफ
बीके शिवानी ने सुनाई एक महिला की दिल छू लेने वाली कहानी

कभी-कभी हमारी जिंदगी को कोई एक घटना नहीं, बल्कि उस घटना के बारे में हमारी सोच सालों तक प्रभावित करती रहती है. बीके शिवानी ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें उन्होंने एक महिला की कहानी शेयर की, जिसने बचपन के एक दर्दनाक अनुभव का बोझ लगभग 30 साल तक अपने साथ ढोया. बहन बीके शिवानी ने वीडियो में बताया कि एक बहन हमारे सेंटर पर आई थी. जब वह 5 साल की बच्ची थी, तो उसके साथ बुरा बर्ताव हुआ था. 5 साल की उम्र में उसने इसके लिए अपने माता-पिता को दोषी ठहराया. उसने कहा कि उन्होंने मुझे उनके पास छोड़ दिया था. वे उस शाम बाहर गए हुए थे. एक 5 साल की बच्ची के तौर पर, उसकी आत्मा ने यह बात दर्ज कर ली कि मेरे साथ जो हुआ, उसके लिए मेरे माता-पिता जिम्मेदार हैं.

बीके शिवानी ने शेयर किया किस्सा

बीके शिवानी ने अपनी वीडियो में बताया कि महिला जब सिर्फ 5 साल की थी, तब उसके साथ एक बुरा अनुभव हुआ. उस मासूम उम्र में उसने मन ही मन यह मान लिया कि जो कुछ हुआ, उसके लिए उसके माता-पिता जिम्मेदार हैं क्योंकि वे उस समय घर पर नहीं थे. धीरे-धीरे उसके अंदर लोगों के प्रति अविश्वास, गुस्सा और कड़वाहट भर गई. उसने रिश्तों से दूरी बना ली और यह मान लिया कि उसकी जिंदगी अब हमेशा ऐसी ही रहेगी. कई बार हम भी ऐसा ही करते हैं. कोई पुरानी चोट, किसी का व्यवहार या कोई दर्दनाक याद हमारे मन में इतनी गहराई से बैठ जाती है कि वह हमारी पहचान का हिस्सा बन जाती है. हम आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन अतीत हमें बार-बार पीछे खींच लेता है.

मेडिटेशन ने बदली जिंदगी

बीके शिवानी के अनुसार, उस महिला के जीवन में बदलाव तब आया जब उसने ध्यान और आत्मचिंतन के दौरान अपनी सोच को नए नजरिए से देखना शुरू किया. उसे एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति ने उसके साथ गलत किया था, उसने तो एक बार उसे चोट पहुंचाई थी, लेकिन वह खुद उस दर्द को 30 साल तक अपने भीतर दोहराती रही. यही समझ उसके लिए टर्निंग पॉइंट बनी. उसने फैसला किया कि अब वह उस बोझ को छोड़ देगी. इसके बाद उसने अपने माता-पिता से दोबारा बात की, रिश्तों को मौका दिया और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना शुरू किया.

दरअसल, माफ करना हमेशा दूसरे व्यक्ति के लिए नहीं होता, कई बार यह खुद को आजाद करने का रास्ता होता है. जब हम पुराने दर्द को पकड़कर रखते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होता है, लेकिन जैसे ही हम उसे छोड़ने का साहस जुटाते हैं, मन हल्का होने लगता है और जिंदगी फिर से नई लगने लगती है.

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