श्रावण में भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है. सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी तथा आराधना का परम प्रतीक है. हमारे मनीषी ऋषियों ने भगवान शिव की सभी अर्चन विधि तथा कामनाएं रुद्राभिषेक में समाहित कर दी हैं. समस्त कामनाओं की संपूर्ति करने में भगवान सदाशिव ही सर्व समर्थ और सक्षम हैं. वैदिक विधि से लेकर लोक परम्पराओं में शिवार्चन सृष्टि के लिये सदा-सर्वदा कल्याणकारी है.
समस्त चतुर्मास में शिव-शिवा का खुला रहता है आराधना द्वार
भगवान भास्कर के दक्षिणायन काल में सभी सामाजिक मंगल कार्यों का अवकाश रहता है. तब समस्त चतुर्मास में शिव-शिवा का आराधना द्वार सदा खुला रहता है. विशेषकर शिवार्चन के लिए श्रावण सर्वश्रेष्ठ माना गया है. वैसे तो शिवार्चन सदा ही कल्याणकारी है किंतु श्रावण का महत्व सदा विशिष्ट माना गया है. इसलिए भारत के प्रत्येक क्षेत्र में निर्मित शिवालयों में शिवार्चन करने के लिए शिव भक्त अतिशय उत्साह पूर्वक अपनी रूचि के अनुसार शिर्वाचन, शिव-अभिषेक करते-कराते हैं.
वैदिक परम्परा के अनुसार, गंगाजल तथा तीर्थों का जल लाकर विभिन्न स्थलों पर शिवलिंग पर अभिषेक करने का विशेष महत्व माना गया है.
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सावन में रुद्राभिषेक के लिए सबसे शुभ तिथियां
प्रतिपदा तिथि- सुखद
चतुर्थी तिथि- सुखप्रद
पंचमी तिथि- अभीष्टसिद्धि
अष्टमी तिथि- सुखप्रद
एकादशी तिथि- सुखप्रद
द्वादशी तिथि- अभीष्टसिद्धि
चतुर्दशी तिथि- शुभयोग
अमावस्या तिथि- सुखप्रद
शुक्ल पक्ष में रुद्राभिषेक की उत्तम तिथियां
द्वितीया तिथि- सुखप्रद
पंचमी तिथि- सुखप्रद
षष्ठी तिथि- अभीष्टसिद्धि
द्वादशी तिथि- सुखप्रद
त्रयोदशी तिथि- अभीष्टसिद्धि
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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