मृत्यु जीवन का अटल सत्य है और सनातन परंपरा में अंतिम संस्कार से जुड़ी हर प्रक्रिया का अपना धार्मिक महत्व माना गया है. अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि श्मशान घाट ले जाने से पहले मृतक के शरीर के हाथ-पैर क्यों बांधे जाते हैं. गरुड़ पुराण में इस परंपरा का विस्तार से उल्लेख मिलता है और इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं का वर्णन किया गया है. आइए ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय से जानिए क्या बताता है गरुड़ पुराण.
क्या कहता है गरुड़ पुराण
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियम बताए गए हैं. इनमें मृत्यु के बाद शरीर की तैयारी, अंतिम यात्रा और संस्कार से पहले किए जाने वाले कर्मों का भी उल्लेख मिलता है. इन्हीं में शव के हाथ-पैर बांधने की परंपरा का भी वर्णन किया गया है.
हाथ-पैर बांधने की क्या है मान्यता
उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यतों में मृत्यु के बाद आत्मा कुछ समय तक अपने शरीर से जुड़ी रहती है. कहा जाता है कि वह दोबारा शरीर में प्रवेश करने का प्रयास करती है. इसलिए शव के हाथ-पैर बांधे जाते हैं और आंखें व मुंह बंद कर दिए जाते हैं. नाक और कान में रूई लगाने की भी परंपरा है.
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नकारात्मक शक्तियों से जुड़ी मान्यता
पंडित कौशल पांडेय ने आगे कहा कि गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि अंतिम संस्कार से पहले शव को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए. मान्यता है कि इस दौरान नकारात्मक शक्तियां मृत शरीर के आसपास सक्रिय हो सकती हैं. इसलिए शव के पास परिजनों का रहना और सभी धार्मिक नियमों का पालन करना शुभ माना गया है.
धार्मिक परंपरा के रूप में देखें
धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि अंतिम संस्कार तक आत्मा का अपने शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता. इसलिए ये सभी विधियां आत्मा की शांति और अंतिम यात्रा को विधिपूर्वक संपन्न कराने के उद्देश्य से की जाती हैं. हालांकि, ये मान्यताएं गरुड़ पुराण और सनातन परंपरा में वर्णित धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं.
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