रक्षाबंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कलाई पर धागा बांधने की यह परंपरा आखिर शुरू कहां से हुई. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि राखी की परंपरा को समझने के लिए रक्षासूत्र यानी रक्षा के धागे की प्राचीन परंपरा को समझना जरूरी है.
वैदिक परंपरा से जुड़ा है रक्षासूत्र
पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि सनातन परंपरा में पूजा-पाठ के बाद कलाई पर बांधा जाने वाला मौली या कलावा भी रक्षासूत्र ही है. मंत्रों के साथ बांधा जाने वाला यह धागा संकटों से रक्षा, लंबी उम्र, शक्ति और शुभ संकल्प की कामना का प्रतीक माना गया है. अथर्ववेद में राजा शतानीक के लिए आयु, बल और दीर्घ जीवन की कामना से स्वर्ण बांधने का उल्लेख मिलता है.
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बलि की कथा से भी जुड़ा है रक्षा सूत्र
उन्होंने आगे बताया कि पौराणिक मान्यता में रक्षासूत्र की एक प्रसिद्ध कथा राजा बलि से जुड़ी है. ऐसी मान्यता है कि देवी लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था. इसी प्रसंग से जुड़े मंत्र में कहा जाता है कि 'येन बद्धो बली राजा'. यानी रक्षा का यह धागा व्यक्ति को अपने संकल्प और जिम्मेदारी की याद दिलाता है.
धागा सिर्फ रक्षा नहीं संकल्प का है प्रतीक
पंडित कौशल पांडेय ने बताया कि रक्षासूत्र का मतलब केवल किसी संकट से बचाव नहीं है. यह व्यक्ति को धर्म, मर्यादा और अपने दायित्व से जोड़ने का प्रतीक भी है. पहले गुरु-शिष्य, राजा और योद्धाओं को भी रक्षासूत्र बांधने की परंपरा रही है. आज भाई की कलाई पर बंधने वाली राखी इसी पुरानी परंपरा का नया सामाजिक रूप मानी जा सकती है.
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