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This Article is From Mar 21, 2026

कुंभ नगरी प्रयागराज के अलोपी देवी शक्तिपीठ में माता की मूर्ति नहीं, डोली की होती है पूजा, जानें क्यों

Chaitra Navratri 2026 Special: प्रयागराज का अलोपी देवी मंदिर एक अनोखा 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता की कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक लकड़ी के पालने यानी डोली की पूजा होती है.

कुंभ नगरी प्रयागराज के अलोपी देवी शक्तिपीठ में माता की मूर्ति नहीं, डोली की होती है पूजा, जानें क्यों
अलोपी देवी शक्तिपीठ मंदिर
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Alopi Devi Shaktipeeth Temple: सनातन धर्म में चैत्र नवरात्रि का खास महत्व है. हर साल यह त्योहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है.  इस साल चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से हो गई है. चैत्र नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के दौरान देशभर के माता के मंदिरों की रौनक अद्भुत होती है. देवी के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी तादाद में भीड़ देखी जाती है, जो माता के दर्शन के लिए उनके द्वार पर आते हैं. ऐसा एक यूपी के प्रयागराज में स्थित अलोपी देवी शक्तिपीठ मंदिर है. इस मंदिर की खासियत है कि यहां माता की डोली की पूजा की जाती है, जो कि अपने आप में एक अद्भुत दृश्य होता है.

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अलोपी देवी शक्तिपीठ मंदिर का महत्व

प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित अलोपी देवी मंदिर (अलोप शंकरी) एक अनोखा 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता की कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक लकड़ी के पालने यानी डोली की पूजा होती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरा और अदृश्य (अलोप) हो गया था. नवरात्रि में यहां भक्तों का सैलाब उमड़ता है और चमत्कारी कुंड के दर्शन करते हैं. नवरात्रि के समय अलोपी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी तादाद में भीड़ उमड़ती है. हालांकि, मंदिर में माता की प्रतिमा न होने के कारण यहां नवरात्रि के समय उनका श्रृंगार तो नहीं होता, लेकिन विधि के अनुसार पूरे नौ दिन उनके अलग-अलग स्वरूपों का पाठ किया जाता है.

51 शक्तिपीठों में से एक

इस मंदिर को ‘अलोपी देवी मंदिर,' 'मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर,' और 'ललिता मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है. अलोपी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अदृश्य हो गया था. इसलिए इस मंदिर को देवी अलोपशंकरी के नाम से जाना जाता है.

मंदिर में देवी का स्वरूप नहीं है, लेकिन प्रांगण के बीच में एक कुंड बना हुआ है, जिसके ऊपर चांदी का एक खास झूला या पालना बना हुआ है, जिसे लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है और उसकी पूजा की जाती है. मान्यता है कि मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी, इसलिए माता का आशीर्वाद लेने मंदिर में आए भक्त उसी कुंड से जल लेकर उनके पालने पर चढ़ाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं.

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