- जमीन से गायब है विपक्षी एकता
- राह इतनी भी नहीं आसान
- आपसी स्वार्थ और महत्वाकांक्षाएं रोड़ा
बीते साल दिसंबर में जब कोलकाता में टीएमसी नेता ममता बनर्जी की अगुवाई में विपक्ष की एक रैली हुई थी तो मंच पर 21 नेता मौजूद थे और जिसमें कांग्रेस की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे और अभिषेक मनु सिंघवी मौजूद थे. लेकिन मंच पर ममता के हावभाव से लग रहा था कि वह खुद विपक्ष की नेता के तौर पर देख रही हैं और राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार नहीं करना चाहती हैं. इससे पहले भी वह दिल्ली में वह जब भी आई तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ज्यादा भाव नहीं दिया और यहां तक पश्चिम बंगाल तक में कांग्रेस का टीएमसी के साथ गठबंधन नहीं हो पाया और ममता का अपने धुर विरोधी वामदलों के साथ गठबंधन हो नहीं सकता क्योंकि उन्हीं की वजह से पश्चिम बंगाल में वामदलों का सफाया हो गया. ऐसा ही कुछ हाल उत्तर प्रदेश का भी जहां सपा और बसपा में गठबंधन तो कांग्रेस की बेइज्जती करने पर उतारू हो गई. अखिलेश यादव के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन पर उसका अभी तक नुकसान नहीं हुआ है वह देश में भी कहीं गठबंधन नहीं करेंगी. हालांकि दोनों यह भी फैसला किया कि रायबरेली में सोनिया गांधी और अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारे जाएंगे. लेकिन कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति बदलती हुए सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है. अब अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में थोड़ी भी मजबूती होती है तो त्रिशंकु लड़ाई में बीजेपी को ही फायदा होगा. वहीं बीएसपी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन से इनकार कर दिया है. इन दोनों ही राज्यों में कई सीटें ऐसी थीं जहां का थोड़ा भी स्विंग बीजेपी के लिए खतरा हो सकता था.
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दूसरी ओर बात करें बिहार की तो आरजेडी के साथ कांग्रेस, आरएलएसपी, हम और वीआईपी पार्टी और सीपीआई हैं. इसमें 20 सीटों पर आरजेडी, कांग्रेस 9 सीट, आरएलएसपी 5 सीट, वीआईपी 3 सीट और सीपीआई 1 सीट पर चुनाव लड़ेगी. लेकिन खबरें थीं कि बिहार कांग्रेस के नेता 9 ही सीटें मिलने से नाराज थे. दूसरी ओर आरजेडी के अंदर ही तेज को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है. वहीं बिहार में इस समय सबसे चर्चित सीट बेगूसराय में आरजेडी ने सीपीआई के प्रत्याशी कन्हैया कुमार को समर्थन नहीं दिया है और अपने प्रत्याशी तनवीर हसन को उतार दिया है जबकि बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को उतारा है. आरजेडी की दलील है कि इस सीट पर तनवीर हसन को पिछली बार बहुत वोटें मिली थीं इसलिए स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं का खयाल रखा गया है. लेकिन यहां गौर करनी वाली बात यह है कि अगर आरजेडी ने कन्हैया कुमार का समर्थन किया होता तो गिरिराज सिंह की राह कठिन हो जाती.
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वहीं एनडीए से बगावत करने के बाद ऐसा लग रहा था कि टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस के साथ आ जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बात करें केरल की तो वायनाड से राहुल गांधी के पर्चा भरने से सीपीएम के नेता नाराज हो गए हैं. प्रकाश करात का कहना है कि ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अब बीजेपी से लड़ते-लड़ते वामदलों से भी लड़ना चाहती है. वामदल खुद को बीजेपी का सबसे बड़ा विरोधी मानते हैं लेकिन दूसरे सबसे बड़े विरोधी पार्टी कांग्रेस के साथ न तो केरल में कोई गठबंधन हो पाया और न ही पश्चिम बंगाल में. इतना ही नहीं कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के संयुक्त उम्मीदवार वीरप्पा मोइली के खिलाफ अपना प्रत्याशी उतार दिया है. कर्नाटक में बीजेपी और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सीधी टक्कर है ऐसे में कोई तीसरा प्रत्याशी वोट काटकर बीजेपी को फायदा पहुंचाएगा.
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बात करें दिल्ली की तो यहां भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच कभी हां और कभी न वाले हालात हैं. ताजा खबर है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए शर्त रखते हुए कहा है कि पार्टी तभी चुनावी गठबंधन करेगी जब हरियाणा और चंडीगढ़ में भी दोनों दल मिल कर चुनाव लड़ें. फिलहाल अभी तक कोई निर्णय नहीं हो पाया है. पंजाब, हरियाणा और गोवा में आम आदमी पार्टी की अच्छी-खासी पैठ बन चुकी है और कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकती है. कुल मिलाकर देखें तो कर्नाटक में जीडीएस के साथ और महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ, तमिलनाडु में डीएमके साथ कांग्रेस का गठबंधन है. लेकिन केंद्र में सरकार बनाने के लिए उसे और सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ममता बनर्जी जहां खुद को पीएम पद का सबसे योग्य उम्मीदवार बता रही थीं तो बीएसपी सुप्रीमो मायावती भी पीएम पद की इच्छा जाहिर कर चुकी हैं. विशाखापत्तनम में उन्होंने कहा, ' मैं चार बार सीएम रह चुकी हूं, मेरे पास अनुभव है. यह मेरे लिए कोई नई बात नहीं होगी.' दूसरी ओर जेडीएस भी अपने बुजुर्ग नेता एचडी देवगौड़ा को पीएम बनता देखना चाहती है वह पहले भी देश की बागडोर संभाल चुके हैं. कुल मिलाकर चुनाव के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अगर सरकार बनाने के लिए बहुमत की जरूरत पड़ी तो राह आसान नहीं होगी. फिलहाल तो उनके सामने सीटें जीतने की बड़ी चुनौती है.
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