- दिल्ली के सदर बाजार में होली के दिन लगी आग में दो मजदूरों की पहचान करना परिवार के लिए संभव नहीं हो पाया.
- मृतकों राम प्रवेश और धुरखली के शव पूरी तरह जल चुके हैं, जिससे डीएनए टेस्ट के बिना पहचान कठिन हो गई है.
- पुलिस ने मृतकों के दांत और परिजनों के ब्लड सैंपल लेकर लैब में डीएनए जांच के लिए भेज दिए हैं.
दिल्ली का दिल कहे जाने वाले और एशिया के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में से एक सदर बाजार में होली के दिन खुशियों की जगह मातम पसर गया, जब पूरा शहर रंगों के खुमार में डूबा था, तब सदर बाजार की संकरी गलियों में स्थित एक पांच मंजिला इमारत (नंबर 2919) आग की लपटों से घिर गई. इस भीषण अग्निकांड में दो जिंदगियां इस कदर खाक हो गईं कि अब उनकी पहचान करना भी उनके अपने परिवारों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है.
सदर बाजार अग्निकांड का का सबसे दर्दनाक पहलू तब सामने आया जब बिहार से आए मृतकों के परिजन मोर्चरी पहुंचे. आग इतनी विकराल थी कि दोनों मृतकों के शरीर पूरी तरह जल चुके थे. सीतामढ़ी निवासी राम प्रवेश (35 वर्ष) की पत्नी ममता अपने 10 साल के मासूम बेटे के साथ जब बिहार से दिल्ली पहुंची तो अपने पति के शव को देखकर पत्थर बन गई. वहीं खगड़िया निवासी धुरखली उर्फ शंकर (60 वर्ष) का बेटा अखिलेश भी अपने पिता की पहचान करने में नाकाम रहा.
पुलिस के सामने अब एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई है. शिनाख्त के लिए अब केवल डीएनए टेस्ट ही एकमात्र रास्ता बचा है. पुलिस ने दोनों शवों के दांतों के सैंपल लिए हैं. राम प्रवेश व धुरखली उर्फ शंकर के बेटों के ब्लड सैंपल लेकर लैब भेज दिए हैं. जब तक रिपोर्ट नहीं आती है, ये परिवार अपने अपनों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पाएंगे.
फर्ज और जिम्मेदारी की बलि चढ़ गई जिंदगी
प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो यह मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि अपनों के प्रति जिम्मेदारी का परिणाम थी. राम प्रवेश पिछले 15 सालों से अनिल अग्रवाल के यहां खिलौने की दुकान में काम करता था. आग लगी तो वह भागने के बजाय पानी की बाल्टी लेकर आग बुझाने की कोशिश करने लगा, जिससे अपने मालिक का नुकसान बचा सके. वहीं बुजुर्ग धुरखली उर्फ शंकर अपनी जीवन भर की जमापूंजी बचाने के लिए नीचे की मंजिल की ओर भागे, लेकिन लपटों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया.
खाकी का शौर्य, मस्जिद के रास्ते बचाई 5 जान
भले ही दमकल की 22 गाड़ियों को आग बुझाने में 10 घंटे लगे, लेकिन स्थानीय सदर थाना पुलिस ने जो जांबाजी दिखाई, उसकी हर कोई तारीफ कर रहा है. दमकल के पहुंचने से पहले ही हवलदार प्रदीप डागर और सिपाही संदीप चौधरी धधकती इमारत पर चढ़ गए. उन्होंने लोहे का जाल तोड़कर बालकनी में फंसे 5 लोगों को पास की मस्जिद के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाला. अगर पुलिस की तत्परता न होती तो मरने वालों का आंकड़ा और बढ़ सकता था.
सदर बाजार की संकरी गलियां एक बार फिर बड़े हादसे की गवाह बनीं, जहां एक तरफ पुलिस की जांबाजी ने कई घर उजड़ने से बचा लिए तो वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक खामियों और संकरे रास्तों ने दो गरीब परिवारों को जीवन भर का जख्म दे दिया. अब इन परिवारों की आंखें लैब की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिनके बाद इन्हें अपनों के अंतिम अवशेष सौंपे जाएंगे.
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