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'हम दो बजे पहुंच जाते थे', मस्जिद से भगाए गए, मोहल्ले में मिली पहचान, कुछ यूं शुरू हुई पठान की क्रिकेट कहानी

इरफान पठान ने NDTV YUVA 2026 के मंच पर बताया कि मोहल्ले में जब हम गए तब हमें एहसास हुआ कि यार हम क्रिकेट खेल सकते हैं. क्योंकि उस दौरान जो बड़े लड़के थे. वह चाहते थे कि हम दोनों उनकी टीम की तरफ से खेलें.

'हम दो बजे पहुंच जाते थे', मस्जिद से भगाए गए, मोहल्ले में मिली पहचान, कुछ यूं शुरू हुई पठान की क्रिकेट कहानी
इरफान पठान

इरफान पठान को तो आप जानते ही होंगे. मगर उन्होंने क्रिकेट की दुनिया में कदम कैसे रखा? इसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते होंगे. अगर आपको भी नहीं पता तो इसका जवाब खुद पूर्व तेज गेंदबाज ने दिया है. NDTV YUVA 2026 के मंच पर बात करते हुए पठान ने बताया, 'पहली बार बल्ला जब मैं सात या आठ साल का था, तब पकड़ा था. उस दौरान भाई के साथ क्रिकेट खेलता था. हम दोनों भाई मस्जिद में क्रिकेट खेला करते थे. वहां से हमको भगाया जाता था कि आप बाहर जाइए. यहां शोरगुल नहीं करिए. हम मोहल्ले में जाया करते थे क्रिकेट खेलने के लिए. मोहल्ले में जब हम गए तब हमें एहसास हुआ कि यार हम क्रिकेट खेल सकते हैं. क्योंकि उस दौरान जो बड़े लड़के थे. वो 14-15 के थे. वह चाहते थे कि हम दोनों उनकी टीम की तरफ से खेलें. वहां से हौसला आया. फिर बड़ौदा स्पोर्ट्स क्लब, बड़ौदा में हमने शुरू किया. वहां हमने 10 साल की उम्र में खेलना शुरू किया था. वहीं से हमारी जर्नी शुरू हुई थी.'

उन्होंने कहा, 'रब का शुक्र है कि बाद में भारत को रिप्रेजेंट करने का मौका मिला. मुझे नहीं नहीं मेरे भाई को भी. एक ही परिवार से दो भाई क्रिकेट खेले और साथ ही में वर्ल्ड कप जीते. मेरे हिसाब से ये जो सफर रहा है. वह किसी सपने से कम नहीं रहा है.'

पठान से जब सवाल किया गया कि भारत की तरफ से खेलने के लिए आपने सपने देखने कब से शुरु कर दिए थे? इसके जवाब में उन्होंने कहा, 'जब आप क्लब क्रिकेट खेलते हो और परफॉर्म करते हो तो आपको कॉन्फिडेंस मिलता है.'

उन्होंने कहा, 'मगर जब वो क्लब क्रिकेट तब्दील होता है स्टेट लेवल पर, तो वहां से हर बच्चा सपना देखने लगता है कि मैं क्लब क्रिकेट से स्टेट लेवल तक ट्रॉजसीसन कर सकता हूं तो वहां तक भी पहुंच सकता हूं. मेरे हिसाब से 13 से 14 साल की उम्र में हमने वह सपना देखना शुरू कर दिया था. जरूर इंडिया खेलेंगे. यही वजह है कि जब बाकी के सब लड़के मैदान में तीन बजे पहुंचते थे. हम दो बजे ही पहुंच जाते थे.'

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