
नई दिल्ली:
टीम इंडिया के पूर्व बॉलिंग कोच और बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स के मौजूदा सहायक कोच वेंकटेश प्रसाद ने नेशनल टीम और इंडिया ए में चयन के मापदंड पर सवाल उठाए हैं। वेंकटेश प्रसाद के मुताबिक आईपीएल को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, जिसका असर चयन प्रक्रिया पर भी पड़ा है।
टीम इंडिया और इंडिया ए के लिए टीम चुनते हुए सेलेक्टर्स आईपीएल के प्रदर्शन को ध्यान में रख रहे हैं। नतीजा…मौजूदा सिस्टम से कोई भी टेस्ट क्रिकेटर या अंतराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेटर निकल कर नहीं आ रहा। वेंकटेश का बयान इस वक्त इसलिए ज्यादा अहमियत रखता है, क्योंकि आईपीएल में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी एक बार फिर अंतराष्ट्रीय स्तर पर नाकाम हुए हैं।
वेस्ट इंडीज खेलने गई इंडिया ए टीम के सितारों की पोल खुल गई और टीम तीन टेस्ट मैचों की गैर- आधिकारिक सीरीज में 2−1 से पिट गई। रोहित शर्मा ने तीन मैचों की छह पारियों में 24.16 की मामूली सी औसत के साथ 145 रन बनाए। मनोज तिवारी ने तीन मैचों की छह पारियों में 182 रन बनाए, 30.33 की औसत के साथ। आईपीएल के हीरो अंजिक्य रहाणे ने सबसे ज्यादा निराश किया। रहाणे ने इन तीन मैचों की छह पारियों में सिर्फ 62 रन बनाए। उनका औसत रहा 10.33 का।
अशोक डिंडा ने दो मैचों में 62 ओवर गेंदबाजी की, मगर विकेट मिले सिर्फ चार और औसत रहा 27.50 का। इसके विपरीत रणजी में अच्छा प्रदर्शन करने वाले चेतेश्वर पुजारा वेस्ट इंडीज में एकलौते ऐसे बल्लेबाज रहे, जिनका बल्ला विदेशी जमीन पर चला।
प्रसाद आईपीएल के साथ−साथ रणजी मैचों में प्रदर्शन को महत्व देने की बात कर रहे हैं। संदेश कहीं न कहीं सेलेक्टर्स को भी दिया जा रहा है कि अगर टेस्ट क्रिकेट को बचाना है, तो रणजी की ओर देखो। दिग्गजों का विकल्प रणजी से मिलेगा, आईपीएल से नहीं।
प्रसाद की बातें थोड़ी कड़वी जरूर हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि 2008 से लेकर अब तक आईपीएल के पांच सीजन बीत चुके हैं और आईपीएल टैलेंट हंट के नाम पर फ्लॉप शो ही रहा है। 2008 से लेकर अब 23 खिलाड़ियों को आईपीएल की वजह से वन-डे टीम में मौका मिला। इनमें से सिर्फ तीन खिलाड़ी वन−डे में अपनी जगह पक्की कर पाए विराट कोहली, आर अश्विन और रविंद्र जडेजा। इनमें से जडेजा और अश्विन को आईपीएल की खोज कहा जा सकता है, लेकिन जहां अश्विन टेस्ट में कुछ खास नहीं कर पाए, वहीं जडेजा में टेस्ट क्रिकेटर का माद्दा नजर नहीं आता।
एक कहावत है आप जो बोएंगे वहीं काटेंगे। पिछले छह सालों में बीसीसीआई का जोर टी-20 पर रहा है, टेस्ट पर नहीं, इसलिए भारत में टी-20 की धूम है, तो टेस्ट धड़ाम से गिरा है।
टीम इंडिया और इंडिया ए के लिए टीम चुनते हुए सेलेक्टर्स आईपीएल के प्रदर्शन को ध्यान में रख रहे हैं। नतीजा…मौजूदा सिस्टम से कोई भी टेस्ट क्रिकेटर या अंतराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेटर निकल कर नहीं आ रहा। वेंकटेश का बयान इस वक्त इसलिए ज्यादा अहमियत रखता है, क्योंकि आईपीएल में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी एक बार फिर अंतराष्ट्रीय स्तर पर नाकाम हुए हैं।
वेस्ट इंडीज खेलने गई इंडिया ए टीम के सितारों की पोल खुल गई और टीम तीन टेस्ट मैचों की गैर- आधिकारिक सीरीज में 2−1 से पिट गई। रोहित शर्मा ने तीन मैचों की छह पारियों में 24.16 की मामूली सी औसत के साथ 145 रन बनाए। मनोज तिवारी ने तीन मैचों की छह पारियों में 182 रन बनाए, 30.33 की औसत के साथ। आईपीएल के हीरो अंजिक्य रहाणे ने सबसे ज्यादा निराश किया। रहाणे ने इन तीन मैचों की छह पारियों में सिर्फ 62 रन बनाए। उनका औसत रहा 10.33 का।
अशोक डिंडा ने दो मैचों में 62 ओवर गेंदबाजी की, मगर विकेट मिले सिर्फ चार और औसत रहा 27.50 का। इसके विपरीत रणजी में अच्छा प्रदर्शन करने वाले चेतेश्वर पुजारा वेस्ट इंडीज में एकलौते ऐसे बल्लेबाज रहे, जिनका बल्ला विदेशी जमीन पर चला।
प्रसाद आईपीएल के साथ−साथ रणजी मैचों में प्रदर्शन को महत्व देने की बात कर रहे हैं। संदेश कहीं न कहीं सेलेक्टर्स को भी दिया जा रहा है कि अगर टेस्ट क्रिकेट को बचाना है, तो रणजी की ओर देखो। दिग्गजों का विकल्प रणजी से मिलेगा, आईपीएल से नहीं।
प्रसाद की बातें थोड़ी कड़वी जरूर हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि 2008 से लेकर अब तक आईपीएल के पांच सीजन बीत चुके हैं और आईपीएल टैलेंट हंट के नाम पर फ्लॉप शो ही रहा है। 2008 से लेकर अब 23 खिलाड़ियों को आईपीएल की वजह से वन-डे टीम में मौका मिला। इनमें से सिर्फ तीन खिलाड़ी वन−डे में अपनी जगह पक्की कर पाए विराट कोहली, आर अश्विन और रविंद्र जडेजा। इनमें से जडेजा और अश्विन को आईपीएल की खोज कहा जा सकता है, लेकिन जहां अश्विन टेस्ट में कुछ खास नहीं कर पाए, वहीं जडेजा में टेस्ट क्रिकेटर का माद्दा नजर नहीं आता।
एक कहावत है आप जो बोएंगे वहीं काटेंगे। पिछले छह सालों में बीसीसीआई का जोर टी-20 पर रहा है, टेस्ट पर नहीं, इसलिए भारत में टी-20 की धूम है, तो टेस्ट धड़ाम से गिरा है।
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