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28 साल पहले भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ था ऐतिहासिक फाइनल, आखिरी ओवर में थम गई थीं सांसें

IND vs PAK Historical Final Match: साल 1998 में ढाका के सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप का तीसरा फाइनल आज भी भारत-पाकिस्तान मुकाबलों के सबसे रोमांचक मैचों में गिना जाता है.

28 साल पहले भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ था ऐतिहासिक फाइनल, आखिरी ओवर में थम गई थीं सांसें
IND vs PAK Historical Final Match:

जनवरी 1998. बांग्लादेश अपनी आजादी के 25 साल पूरे होने का जश्न मना रहा था. इसी मौके पर ढाका में सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप का आयोजन हुआ, जिसमें भारत, पाकिस्तान और मेजबान बांग्लादेश ने हिस्सा लिया. उम्मीद के मुताबिक दोनों चिर प्रतिद्वंद्वी टीमें फाइनल में पहुंचीं और विजेता तय करने के लिए तीन मुकाबले खेले गए. लेकिन तीसरे फाइनल ने जो रोमांच पैदा किया, वह आज भी क्रिकेट प्रेमियों की यादों में ताजा है.

सईद अनवर के शतक से मुश्किल में पड़ा भारत

निर्णायक मुकाबले में पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 314/5 का विशाल स्कोर बनाया. सलामी बल्लेबाज सईद अनवर ने शानदार शतक जड़ते हुए भारतीय गेंदबाजों की कड़ी परीक्षा ली. उस दौर में 300 से ज्यादा रन का पीछा करना लगभग नामुमकिन माना जाता था और भारत के सामने भी पहाड़ जैसा लक्ष्य था.

खराब रोशनी ने और बढ़ा दी थी चुनौती

ढाका के स्टेडियम में फ्लडलाइट्स पर्याप्त नहीं थीं. खराब रोशनी की वजह से भारत की पारी 50 की जगह 48 ओवर की कर दी गई. डकवर्थ-लुईस नियम के तहत भारत को जीत के लिए 48 ओवर में 315 रन बनाने थे. यानी लक्ष्य वही रहा, लेकिन ओवर दो कम हो गए. इससे मुकाबला और भी मुश्किल हो गया.

गांगुली और रॉबिन सिंह ने पलटा मैच

भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही और शुरुआती झटकों ने टीम पर दबाव बढ़ा दिया. ऐसे समय में सौरव गांगुली ने जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने 124 रन की शानदार पारी खेली और पाकिस्तानी गेंदबाजों पर लगातार दबाव बनाए रखा. दूसरे छोर से रॉबिन सिंह ने बेहतरीन साथ निभाया. दोनों की साझेदारी ने भारत को मुकाबले में वापस ला खड़ा किया.

 आखिरी ओवर में थम गई थीं सांसें

मैच आखिरी ओवर तक पहुंच चुका था. भारत को जीत के लिए दो गेंदों पर तीन रन चाहिए थे. स्ट्राइक पर ऋषिकेश कनितकर थे और गेंद हाथ में थी पाकिस्तान के स्टार स्पिनर सकलैन मुश्ताक के.

तनाव चरम पर था. हर गेंद के साथ दर्शकों की धड़कनें तेज हो रही थीं. तभी कनितकर ने मिडविकेट के ऊपर से शानदार चौका जड़ दिया. गेंद सीमा रेखा के पार गई और पूरा भारतीय खेमे खुशी से झूम उठा. उसी चौके के साथ भारत ने 315 रन का लक्ष्य हासिल कर क्रिकेट इतिहास की सबसे यादगार जीतों में से एक दर्ज कर ली.

भारत-पाक मुकाबलों की सबसे यादगार जीतों में शामिल

ढाका का वह फाइनल सिर्फ एक जीत नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट के आत्मविश्वास को नई उड़ान देने वाला मुकाबला भी था. उस समय तक भारत ने इतने बड़े लक्ष्य का सफलतापूर्वक पीछा नहीं किया था. यही वजह है कि 28 साल बाद भी ऋषिकेश कनितकर का वह विजयी चौका और ढाका का वह ऐतिहासिक फाइनल क्रिकेट प्रशंसकों की यादों में आज भी उतनी ही मजबूती से दर्ज है.

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