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टूटी नाक, बह रहा था खून, सामने थे वकार युनुस, फिर भी सचिन ने नहीं छोड़ी क्रीज, सिद्धू ने सुनाया वो किस्सा

साल 1989 के पाकिस्तान दौरे पर खेली गई सियालकोट टेस्ट की यह घटना आज भी सचिन तेंदुलकर के करियर के सबसे हिम्मत वाले पलों में गिनी जाती है.

टूटी नाक, बह रहा था खून, सामने थे वकार युनुस, फिर भी सचिन ने नहीं छोड़ी क्रीज, सिद्धू ने सुनाया वो किस्सा
नाक से बह रहा था खून, सामने थे वकार यूनुस

क्रिकेट के मैदान से चोटिल खिलाड़ियों की कहानी वैसे तो बहुत आम है लेकिन कई बार कुछ कहानियां किरदारों की वजह से बहुत खास और अमर हो जाती हैं, कुछ ऐसी ही कहानी है क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर की और इस कहानी को करीब 37 साल हो गए जो 9 दिसंबर 1989 को भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गए चौथे टेस्ट मैच के दौरान घटी थी और तब सचिन मात्र 16 साल के थे. इस कहानी को भारतीय टीम के पूर्व दिग्गज नवजोत सिद्धू ने सुनाया जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत ही वायरल है. सिद्धू ने बताया था की कैसे सियालकोट में सचिन ने टूटी नाक के साथ पाकिस्तान के तब के सबसे तेज और घातक गेंदबाजी लाइनअप की धज्जियां उड़ाई थी.

भारतीय क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर की महानता सिर्फ उनके रिकॉर्डों से नहीं मापी जाती. 100 अंतरराष्ट्रीय शतक, 34 हजार से ज्यादा रन और दो दशक से अधिक लंबा करियर अपनी जगह है, लेकिन कुछ किस्से ऐसे हैं जिन्होंने उन्हें करोड़ों लोगों के लिए "महान" बनाया. सिद्धू ने 1989 के पाकिस्तान दौरे को याद करते हुए बताया कि उस समय भारतीय टीम में एक नया चेहरा आया था, जिसने अभी-अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था. सामने इमरान खान, वसीम अकरम और वकार यूनुस जैसे दिग्गज तेज गेंदबाज थे. पाकिस्तान की धरती पर बल्लेबाजी करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं था.

सियालकोट टेस्ट के दौरान वकार यूनुस की एक तेज बाउंसर सीधे सचिन तेंदुलकर की नाक पर जा लगी. गेंद इतनी जोर से लगी कि उनकी नाक से खून निकलने लगा. पूरा मैदान कुछ पलों के लिए शांत हो गया. भारतीय ड्रेसिंग रूम में भी चिंता का माहौल था. सभी को लगा कि सचिन मैदान छोड़ देंगे. फिजियो मैदान पर पहुंचे और सचिन से बाहर जाने को कहा, लेकिन उनका जवाब साफ था, "मैं खेलूंगा."

नाक पर पट्टी बांधी गई. चेहरा खून से सना हुआ था. दर्द भी साफ नजर आ रहा था, लेकिन सचिन वापस क्रीज पर खड़े हो गए. दूसरी ओर वकार यूनुस पूरी रफ्तार के साथ गेंदबाजी कर रहे थे. पाकिस्तान के गेंदबाज लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सचिन ने हार नहीं मानी.

सिद्धू ने बताया कि उस दिन सचिन सिर्फ अपनी विकेट नहीं बचा रहे थे, बल्कि भारत की उम्मीदों को भी थामे हुए थे. चोट लगने के बाद वह और ज्यादा निडर होकर खेले. उन्होंने गेंद को शरीर पर भी झेला, मुश्किल हालात का सामना किया और पाकिस्तान को यह एहसास करा दिया कि यह बल्लेबाज दबाव में टूटने वाला नहीं है.

उस पारी में सचिन ने 57 रन बनाए. स्कोर देखने पर यह सिर्फ एक अर्धशतक लगता है, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उस पारी की अहमियत उससे कहीं ज्यादा है. उस दिन उन्होंने मैच में भारत की लड़ाई को जिंदा रखा और हार को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सिद्धू ने कहा था कि उसी पल उन्हें महसूस हो गया था कि यह खिलाड़ी साधारण नहीं है. दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों के सामने जिस तरह सचिन खड़े रहे, उसने उनके भीतर की मजबूती को दिखा दिया था.

यही वजह है कि जब दुनिया सचिन तेंदुलकर को महानतम क्रिकेटरों में गिनती है, तो सिर्फ उनके आंकड़े नहीं देखे जाते. सियालकोट की वह पारी आज भी इस बात का सबसे बड़ा सबूत मानी जाती है कि सचिन तेंदुलकर आखिर भारतीय क्रिकेट के लिए क्यों इतने खास रहे.

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