टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर हर आए दूसरे दिन चर्चा में रहते हैं. पद ऐसा कांटों का ताज है कि कभी ट्रोलर्स का भला-बुरा सुनते हैं, तो कभी तारीफ होती है. अब जब आज गंभीर पर हैदराबाद में टीम इंडिया की 3-1 से सीरीज सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, तो वहीं पूर्व लेफ्टी बल्लेबाज आज अपना 44वां जन्मदिन मना रहे हैं. गंभीर टीम इंडिया के लिए एक दशक से ज्यादा चले करियर के दौरान अच्छी क्रिकेट खेले, उन्होंने बतौर खिलाड़ी और मेन्टॉर के रूप में भी खासा असर छोड़ा. चलिए टीम इंडिया हेड कोच के जीवन से जुड़ी 10 अहम बातें जान लीजिए:
1. सेना थी पहला प्यार
गौतम गंभीर का असली पहला प्यार क्रिकेट नहीं बल्कि भारतीय सेना में जाना था.और अगर गौतम सिर्फ 12वीं क्लास में ही रणजी ट्ऱॉफी न खेल रहे होते, तो वह पक्का सेना ज्वाइन करते. एक इंटरव्यू में गौतम ने यह गंभीर बात बताई थी कि यदि वे 12वीं कक्षा के दौरान रणजी ट्रॉफी न खेल रहे होते, तो वे निश्चित रूप से एनडीए (NDA) के जरिए सेना में शामिल हो जाते. बहरहाल, आज भी सेना के प्रति उनका भाव और लगाव देखने को मिलता है. और वह देश के कई शहीद शहीद जवानों के बच्चों की पढ़ाई और उनके भरण-पोषण का पूरा खर्च उठाते हैं.
2. कभी कॉलेज नहीं गए गंभीर
दिल्ली के प्रसिद्ध मॉडर्न स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद गंभीर ने कभी किसी कॉलेज की औपचारिक शिक्षा नहीं ली. उनका पूरा ध्यान और समर्पण सिर्फ और सिर्फ अपने क्रिकेट करियर की तरफ था. उन्होंने बहुत कम उम्र में ही घरेलू क्रिकेट में अपनी गहरी छाप छोड़नी शुरू कर दी थी. इस वजह से उन्हें पढ़ाई के लिए समय नहीं मिला. गंभीर ने बिना किसी कॉलेज की डिग्री के अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर दुनिया भर में नाम कमाया.
3. जब आफरीदी के साथ हुआ जबर्दस्त टकराव
यह साल ल 2007 था, जब कानपुर वनडे के दौरान रन लेते वक्त पाकिस्तानी खिलाड़ी शाहिद अफरीदी उनका रास्ता रोकने के लिए बीच में आ गए थे. इस घटना के दौरान दोनों खिलाड़ियों के बीच मैदान पर बेहद तीखी बहस और तनातनी देखने को मिली थी. दरअसल गुस्से में गंभीर ने दौड़ते हुए उन्हें कोहनी मार दी थी. और फिर यह क्रिकेट इतिहास के सबसे चर्चित चैप्टरों में शामिल हो गया. इस घटना के लिए मैच रेफरी ने दोनों खिलाड़ियों पर कड़ा जुर्माना भी लगाया था.
4. समाज सेवा के लिए धरा किन्नर रूप
सितंबर 2018 में समाज में उपेक्षित किन्नर (थर्ड जेंडर) समुदाय के अधिकारों और उनके सम्मान के समर्थन में गंभीर ने एक अनूठी मिसाल पेश की थी. उन्होंने 'हिजड़ा हब्बा' कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में खुद माथे पर बिंदी लगाकर और दुपट्टा ओढ़कर शिरकत की थी. उनका यह कदम समाज की रूढ़िवादी सोच को बदलने और इस शोषित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के लिए था. इस बड़े फैसले से उन्होंने यह साबित किया कि एक सेलिब्रिटी होने के नाते समाज के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारियां हैं. गौतम को इस संवेदनशील और साहसी कदम की देश भर से सराहना मिली.
5. विश्व कप फाइनल की ऐतिहासिक पारी और त्याग
भारत को 2011 का वनडे विश्व कप जिताने में एमएस धोनी के विजयी छक्के के अलावा गौतम गंभीर की 97 रनों की पारी का सबसे बड़ा योगदान था. जब शुरुआती झटकों के बाद टीम दबाव में थी, तब गंभीर ने संकटमोचन की भूमिका निभाते हुए शानदार पारी खेली थी. वे दुर्भाग्यवश अपने ऐतिहासिक शतक से सिर्फ 3 रन दूर रह गए थे और आउट हो गए थे. व्यक्तिगत मील के पत्थर के बजाय उन्होंने हमेशा टीम की जीत को प्राथमिकता दी. संकट के समय खेली गई उनकी यह पारी भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में जमा हो गई
6. राजनीति में धमाकेदार एंट्री
रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास लेने के तुरंत बाद साल 2019 के आम चुनावों में उन्होंने राजनीति के मैदान में कदम रखा. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर उन्होंने भारी मतों से शानदार जीत दर्ज की थी. सांसद बनने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास के लिए कई बड़े और महत्वपूर्ण कार्य किए. उन्होंने जनहित के मुद्दों को संसद में पूरी बेबाकी के साथ उठाया.
7. राजनीति से अचानक किनारा कोचिंग की जिम्मेदारी
सक्रिय राजनीति और सांसद के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने साल 2024 में राजनीति से पूरी तरह से किनारा कर लिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपना पूरा ध्यान केवल और केवल क्रिकेट और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों पर केंद्रित करना चाहते हैं. इसके तुरंत बाद उन्हें भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया गया, जो उनके करियर का एक नया मोड़ था. कोच के रूप में उन्होंने खिलाड़ियों में वही पुरानी आक्रामकता और जिताने का जज्बा भरने की कोशिश की है, जिसके लिए वह जाने जाते हैं.
8. फौजी परिवार से ताल्लुक और अनुशासित परवरिश
गंभीर के परिवार की पृष्ठभूमि बेहद अनुशासित और संस्कारों से परिपूर्ण रही है. हालांकि उनके पिता दीपक गंभीर का एक सफल बिजनेस था, लेकिन उनके जीवन पर उनके दादा और पारिवारिक सैन्य व सामाजिक मूल्यों का बहुत गहरा प्रभाव रहा. इसी अनुशासित माहौल के कारण उनके स्वभाव में हमेशा से एक बेबाक और लड़ाकू तेवर देखने को मिला है. वे कभी भी गलत बात को बर्दाश्त नहीं करते और अपनी बात को स्पष्ट रूप से रखना पसंद करते हैं. उनके जीवन के इन नैतिक मूल्यों ने उन्हें मैदान पर और मैदान के बाहर एक मजबूत इंसान बनाया है.
9. बातों को बेबाकी से रखने वाला व्यक्तित्व
गौतम गंभीर चाहे मैदान पर हों, कमेंट्री बॉक्स में हों या फिर डगआउट में, वे कभी भी अपनी राय रखने से पीछे नहीं हटते. उनके इसी अड़ियल और स्पष्टवादी रवैये के कारण कई बार वे विवादों में भी घिर जाते हैं. वे कूटनीतिक बातें करने के बजाय हमेशा सच और तार्किक बातें सीधे तौर पर कहना पसंद करते हैं. उनके इस बेबाक अंदाज के कारण क्रिकेट जगत में उनके चाहने वालों के साथ-साथ आलोचकों की भी कमी नहीं है, लेकिन वे इन सबकी परवाह किए बिना हमेशा अपने उसूलों से जुड़े रहते हैं
10. अपने फाउंडेशन के जरिए लगातार सामाजिक कार्य
वे केवल मैदान पर आक्रामक और सख्त स्वभाव के नहीं हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के मामले में बेहद नरम और मददगार हैं. उनके द्वारा संचालित 'गौतम गंभीर फाउंडेशन' दिल्ली-एनसीआर में गरीबों के लिए बेहद कम दाम में 'जन रसोई' का संचालन करता है. यह फाउंडेशन गरीब और जरूरतमंद बच्चों की स्कूल की फीस और उनकी शिक्षा का पूरा भार उठाता है. इसके अलावा कोविड महामारी और अन्य आपदाओं के दौरान भी उन्होंने खुलकर लोगों की आर्थिक और चिकित्सकीय मदद की थी.
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