
गांधी विकल्पहीन हैं या यूं कहें कि गांधी का विकल्प ही नहीं है. यह बात राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश ने वाराणसी में 'गांधी कल आज और कल' नामक एक संगोष्ठी में कही. यह संगोष्ठी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 12 वीं पुण्यतिथि पर वाराणसी के काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन सभागार में हुई.
चंद्रशेखर को याद करते हुए हरिवंश ने कहा कि चंद्रशेखर उस पीढ़ी के राजनीति के वाहक थे जो पूरी तरह से गांधी के विचारों से ओतप्रोत थी. चंद्रशेखर ने किसी भी परिस्थिति में अपने विचारों से समझौता नहीं किया और कई बार तो अकेले ही गलत बात पर सबके सामने डटे रहे. प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे देश हित के लिए अपने विचारों पर अडिग रहे. इसलिए कहा गया कि वे असुविधाजनक सफल प्रधानमंत्री थे. तमाम विरोधाभाष के बाद भी वे सहमति की राजनीति करते थे. हरिवंश ने जोर देकर कहा कि आज विश्व जिस संकट से गुजर रहा है उसका समाधान किसी और के पास नहीं बल्कि गांधी के पास ही मौजूद है. उपभोक्तावाद पर आधारित आर्थिक मॉडल में अनेकों कमियां हैं जिसका उपाय गांधीवादी अर्थव्यस्था में मिलता नज़र आता है.
उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में पर्यावरण के संरक्षण को लेकर गंभीर चर्चा हो रही है. आज पृथ्वी पर सात बिलियन लोगों का भार है जबकि इसके प्राकृतिक संसाधन दो बिलियन लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही हैं. संसाधनों का जबरदस्त दोहन हमारे सभी नेचुरल भंडारण को ख़त्म कर देगा. गांधी जी ने कहा है कि प्रकृति सबकी ज़रूरत पूरा करती है पर हमें इस पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन अफ़सोस हम इसका लगातार अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं. लिहाजा गांधी यहां भी प्रासंगिक हैं. आज पूरी दुनिया गांधी के इन विचारों को पढ़ रही है और उस पर अमल भी शुरू कर दिया है.
हरिवंश ने कहा कि विकास का यूरोपीय मॉडल हिन्दुस्तान के लिए उचित नहीं है, यह बात गांधी जी ने नेहरू से उस वक्त कही थी जब देश आज़ाद हुआ था और नेहरू का यूरोपीय मॉडल की तरफ रुझान था. साफ़ है कि गांधी कल और आज जितने प्रासंगिक थे उतने ही वे आने वाले कल में भी रहेंगे.
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